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न शादी करती हैं, न संबंध बनाती हैं लेकिन दूसरों के स्पर्म से मां क्यों बन रही हैं महिलाएं?

Mon, 13 Aug 2018 04:29 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Mon, 13 Aug 2018 04:29 PM IST
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Know Why becoming single mothers by sperm donation is in trend
दुनिया भर में वैसी महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है जो स्पर्म खरीद कर मां बन रही हैं। ऐसी महिलाएं शादी नहीं कर रही हैं और आईवीएफ का सहारा लेकर बिना यौन संबंध बनाए मां बन रही हैं। पॉली केर भी उन्हीं महिलाओं में से हैं जो किसी और के स्पर्म से मां बनी हैं।
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ऑक्सफोर्ड की 39 साल की पॉली ने एक गुमनाम स्पर्म डोनर के स्पर्म से पिछले साल गर्भ धारण किया था और इस साल की शुरुआत में उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया।इस प्रक्रिया में स्पर्म को एक प्रयोगशाला में गर्भाधान कराया जाता है। आईवीएफ को वैसे कपल भी आजमाते हैं जो किन्हीं वजहों से मां या पिता बनने में समर्थ नहीं होते हैं।
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पॉली ने कहा, ''मैं बिल्कुल तैयार थी और जानती थी कि अगर मैं मां बनना चाहती हूं तो आईवीएफ को ही अपनाना होगा। जब मैं 36 या 37 साल की थी तो इसके बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया। मैं कभी रिलेशनशिप में नहीं रही। ऐसे में अगर मैं आईवीएफ को नहीं अपनाती तो मां कभी नहीं बन पाती।''उन्होंने कहा, ''मैं हैरान थी कि मेरे परिवार वालों ने इसे बड़ी सहजता से स्वीकार किया।'' ब्रिटेन में सरकार के आंकड़ों के मुताबिक सिंगल वुमन बनने का चलन बढ़ा है। 2014 से तो ब्रिटेन में इसमें 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ऑक्सफोर्ड फर्टिलिटी के मेडिकल निदेशक का कहना है कि उन्होंने 20 से ज़्यादा सिंगल महिलाओं का इलाज किया है। उनका कहना है कि जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ेगी वैसे-वैस सिंगल वुमन का चलन भी बढ़ेगा।
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ऑक्सफोर्ड फर्टिलिटी का कहना कि लोग अब बच्चे को बिल्कुल अकेले जन्म देना चाहते हैं। लोग या तो स्पर्म खरीद ले रहे हैं या फिर अंडाणु खरीद ले रहे हैं। भारत में ये ट्रेंड हाल के दिनों में देखने को मिला है। पिछले साल ही फिल्मकार करण जौहर और तुषार कपूर ने ऐसा किया था। हालांकि आईवीएफ महंगा पड़ता है। ब्रिटेन में लगभग सात लाख रुपए तक खर्च हो जाते हैं। आईवीएफ सफल रहेगा या नहीं यह महिलाओं के अंडाणु पर निर्भर करता है और साथ ही स्पर्म की गुणवत्ता पर। ऑक्सफ़ोर्ड फर्टिलिटी में आईवीएफ की कामयाबी दर 30 से 50 फीसदी के बीच है।

अंडे कैसे लिए जाते हैं?

भारत में भी स्पर्म और अंडाणु बेचने का चलन बढ़ा है। इसकी कई वजह बताई जा रही है। एक तो यह कि जो ज़्यादा उम्र में शादी कर रहे हैं उनके लिए मां या बाप बनने में काफी दिक़्कतें होती हैं। ऐसे में आईवीएफ एकमात्र सहारा होता है। स्पर्म की तरह अंडाणु डोनेट करना आसान नहीं होता है। यह काफी जटिल प्रक्रिया है और इसमें 15 दिन लगते हैं।भारत में नियम के मुताबिक उन महिलाओं से अंडे लिए जाते हैं जो मां बन चुकी हैं ताकि उन्हें फिर से मां बनने में कोई दिक्कत नहीं हो। अंडे को महिला के शरीर से इंजेक्शन के जरिए बाहर निकाला जाता है। इन अंडों से जिस पुरुष को बच्चा पैदा करना है उसके स्पर्म से मिलाया जाता है।

स्पर्म और अंडे को मिलाकर बेबी (एंब्रियो) बनाया जाता है। एंब्रियो को उस महिला के गर्भ में डालने के लिए कोई सर्जरी नहीं करनी पड़ती है।बस एक लाइन बनाकर महिला के शरीर में डाल दिया जाता है।15 दिनों के भीतर पता चल जाता है कि गर्भ ठहर गया है। सरोगेट और डोनर को लेकर गोपनीयता का कॉन्ट्रैक्ट होता है। पिछले साल मोदी सरकार ने एक बिल पेश किया था जिसमें अब कोई सिंगल पेरेंट नहीं बन सकता है। अब सरोगेसी के जरिए वही पैरेंट बने सकते हैं जिन्होंने भारतीय कानून के मुताबिक शादी की है।

यह बिल अभी संसदीय समिति के पास है। इस बिल के ड्राफ्ट होने के बाद से ही सिंगल पैरेंट को लेकर आईवीएफ सेंटर सतर्क हो गए हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि यदि किसी को सिंगल पैरेंट बनना है तो वह बच्चों को गोद ले न कि इस सुविधा को शौक के रूप में इस्तेमाल किया जाए।
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