सबके साथ रहने में उतना मजा कहां, जितना अकेले रहने में है
“सबके साथ रहने में उतना मजा कहां, जितना अकेले रहने में है। अकेले में पैसे भी बच जाते हैं और मन का खाओ, पियो और रहो। कोई रोक-टोक नहीं, दो-चार बातें सुनाकर जाएंगें, तो कोई कभी आएगा भी नहीं, फिर हम दो बस हम दो।” बहुत देर से राजीव नीता की बकवास सुन रहा था।
मां-बाप और परिवार को छोड़कर उसे अकेले गृहस्थी बसाने में रुचि नहीं थी, लेकिन नीता की रोज की बातों से वह परेशान हो चुका था। इसलिए उसने नीता से कहा कि वह अकेले जाकर रह ले, मौज करे और जरूरत की चीजें और पैसे वह समय से भेज दिया करेगा। नीता स्तब्ध थी कि जो आदमी रोज मेरी बातें सुनता था, वह आज उल्टा जवाब दे रहा है। नीता कुछ बोल पाती उससे पहले ही राजीव ने किराए के घर की चाबी उसे थमा दी। वह बोला, "सामान पैक कर लो। कल सुबह तुम अपने नए घर में जा रही हो, आराम से रहने अकेले, सुकून से।"
राजीव दूसरी ओर करवट लेकर सो गया, लेकिन नीता को रात भर नींद नहीं आई। आखिर वह दिन भर अकेले करेगी भी क्या? पड़ी-पड़ी खाएगी भी कितना, राजीव साथ रहता तो ठीक था, लेकिन बिल्कुल अकेले, नहीं।
सुबह राजीव ने नीता से चलने को कहा तो नीता सिर झुकाए खड़ी रही। जोर जबरदस्ती की तो नीता ने साफ मना कर दिया कि वह कहीं नहीं जाएगी। राजीव ने बोला भी कि एक ही बात फिर कहोगी तो नीता ने कहा कि मुझे माफ कर दो, नहीं कहूंगी। मैं तो तुम्हारे साथ चलने की बात कर रही थी, अकेले नहीं रहूंगी कहीं। मुझे माफ कर दो।
उस दिन के बाद नीता ने कभी अलग रहने की जिद नहीं की।