मैं लेस्बियन हूं और मेरी मां ये जानती हैं
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तुम्हें ये बता दूं कि जितनी बार मेरी नजर मेज पर रखी तुम्हारी तस्वीर पर पड़ती है, मैं तुमसे इश्क कर बैठती हूं। मुझे अपनी ज़िंदगी यूं ही तुमसे इश्क़ करते हुए बितानी है। जाहिरा के नाम लिखी ये मेरी आखिरी चिट्ठी थी। मैं उससे मेडिकल कॉलेज में मिली थी और वहीं हम दोस्त बने थे। समय के साथ ये दोस्ती कब प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला। मैंने उसे बता दिया था कि मुझे लड़के नहीं, लड़कियां पसंद हैं। जाहिरा ने मेरी बात को बड़ी संजीदगी से समझा। हम अच्छे दोस्त बने रहे। एक दिन मैं जाहिरा के बॉयफ़्रेंड से मिली। हॉस्टल आकर मैं बहुत रोई। ऐसा नहीं है कि मैंने लड़कों को डेट करने की कोशिश नहीं की।
एक लड़के के साथ मेरा रिश्ता भी रहा और शायद उसी के बाद मुझे एहसास हो गया कि मैं किसी पुरुष से कभी भावनात्मक या शारीरिक तौर पर नहीं जुड़ पाऊंगी। मां को पता नहीं कैसे ये पता चल गया।मुझसे तो कुछ कहा लेकिन एक दिन अचानक शादी की बातें करने लगीं। मैंने मां की खुशी के लिए शादी करने का मन बना भी लिया था पर फिर मुझे लगा कि मैं अपने साथ ग़लत कर रही हूं इसलिए मैंने उनसे साफ कह दिया कि मैं किसी भी लड़के से शादी नहीं कर सकती। आज मैं 26 साल की हूं।
लड़कों में मेरी दिलचस्पी हो, मां इसके लिए नित नए उपाय ढ़ूंढती रहती हैं। पापा को अभी तक मेरे सेक्शुअल ओरिएंटेशन के बारे में नहीं पता। आने वाले वक़्त में वो भी मुझ पर शादी का दबाव डालने लगेंगे। मगर मैंने फ़ैसला कर लिया है। मुझे अपनी सेक्शुएलिटी पर गर्व है।