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कभी कबाब में, तो कभी करी में ‘पसंदा’, जानें इसके बारे में सब कुछ

Mon, 26 Nov 2018 07:47 AM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Mon, 26 Nov 2018 07:47 AM IST
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Know everything about Pasanda
pasanda - फोटो : file photo
दिल्ली के पारंपरिक मांसाहारी दस्तरखान में ‘पसंदों’ का खास स्थान है। ‘अकबरी’ रान और ‘जहांगीरी-नूरजहांनी’ कोरमों से विदेशी पर्यटकों को ललचाने वाले व्यावसायिक बावर्चियों की कमी नहीं, जो खुद को मुगल बादशाहों के शाही खिदमतगारों का वारिस घोषित करते हैं। पर पुरानी दिल्ली के बाशिंदे बिना इतिहास की डिग्रियां जुटाए यह जानते हैं कि ‘शाहजहांनाबाद’ शहर इन हस्तियों के गुजरने के बाद बसा और जल्द ही उजड़ गया। मुगलिया समझे और पहचाने जाने वाले व्यंजन बहुत बाद में 19वीं सदी में ही ईजाद हुए हैं, वह भी ज्यादातर दिल्ली से बाहर की रियासतों में। उन्हें ‘अपनी’ चीजें अधिक पसंद हैं, जिनमें एक ‘पसंदा’ है। जानकारों के अनुसार, स्थानीय शौकीनों का पसंदीदा व्यंजन होने के कारण इसे ‘दिलपसंद’ नाम दिया गया, जो समय के साथ संक्षिप्त हो गया। दिल्ली की कायस्थ रसोई में भी ‘पसंदे’ की खास जगह है।
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‘पसंदा’ यानी मांस का हड्डी रहित भाग, जिसके रान वाले हिस्से को पीट-पीटकर गलने में आसान और मसालों का जायका भीतर तक ग्रहण करने लायक बनाया जाता है। कुशल कसाई पीटने के अलावा चाकू की तेज धार से धैर्य से ‘पसंदे’ की सतह पर दोनों तरफ ‘क्रॉस’ के निशान बनाता है एवं मांस से चरबी तथा मांसपेशियों के अवशेषों को जतन से अलग करता है। अर्थात खाने वाले के मुंह में सिर्फ ‘चांप’ जैसा मांस प्रवेश कर आनंद देता है। ‘पसंदा’ वही चीज है, जिसे पश्चिम में ‘फिले’ कहा जाता है। उसी तरह का मांस-अमेरिकीयों की जुबान में ‘बोनलेस स्टेक’ होता है। अवध में जहां मुर्ग ज्यादा इस्तेमाल होता है, इसलिए इसे मुर्ग के सीने वाले भाग से भी बनाते हैं और ‘पसंदे’ को ‘पार्चा’ नाम देते हैं। 
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पता नहीं कैसे यह पारसी खानपान में ‘फार्चा’ बन बैठा! ‘पसंदे’ का मजा आप नायाब कबाब के रूप में भी ले सकते हैं और ‘करी’ की शक्ल में भी। गलावट लगाकर और भी नर्म बिहारी कबाब या हांडी कबाब ‘पसंदों’ से ही तैयार होता है। वहीं, एक मित्र ‘पसंदे’ को ‘ताश कबाब’ के रूप में बेहतरीन ढंग से पेश करते हैं। ‘पसंदों’ को परत दर परत ताश के पत्तों की गड्डी की तरह वह तश्तरी में सजाते और परोसते हैं। दिल्ली में ‘बादाम पसंदे’ लोकप्रिय हैं, जो निश्चय ही गरिष्ठ तथा स्वादिष्ट होते हैं, पर यह बिना बादाम के भी कम मजेदार नहीं होते। 
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‘पसंदे’ बनाना आसान है, बस धीरज की दरकार है। ‘पसंदों’ को जरा दही, लहसुन-अदरक के पेस्ट के साथ पिसी प्याज और हरी मिर्च मिलाकर रात भर या कम से कम कुछ घंटे अलग रख दें। फिर घी/तेल गर्म कर धीमी आंच पर ढककर पकने छोड़ दें। बीच-बीच में चलाएं। बर्तन के तले में लगने न दें। जरूरत पड़े तो पानी के छींटे मारें। जिस बात को याद रखना बेहद जरूरी है, वह यह कि हल्दी और गरम मसालानुमा मिश्रणों से परहेज करें। घी गरम करते वक्त खड़ेे मसाले- तेजपत्ता, लौंग, काली मिर्च, हरी-छोटी इलायची, दालचीनी काफी हैं। हां, अपनी पसंद के अनुसार, धनिया और लाल मिर्च का पाउडर डाल सकते हैं। तरी पतली नहीं होनी चाहिए। गोश्त जो घी और तेल छोड़ता है, वही काफी होता है। पसंदे की दोस्ती रोटी के साथ अटूट है। यह न भूलें कि गोश्तखोर भी दाल से परहेज नहीं करते और न ही मौसमी सब्जियों से। अगर साथ में पुलाव या बिरयानी हो, तब वैसे भी पतली तरी गैरजरूरी है। आजकल ‘पसंदों’ का चलन कम हुआ है, तो सिर्फ इसलिए की ज्यादातर व्यस्त कसाई यह झंझट नहीं पालना चाहते। ‘करी कट मिकस्ड मटन’ या ‘बोनलेस’ बोटी खरीदिए और अपनी राह पकड़िए! 
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