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एड्स की पहचान को हुए 31 साल
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 01 Dec 2012 09:49 AM IST
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आज से 31 साल पहले एड्स का पता चला था। अमेरिका के लॉस एंजेल्स शहर के डॉक्टर माइकल गॉटलिएब ने 1981 में एक अजीब किस्म की बीमारी के पांच मामले देखे जिनमें निमोनिया और त्वचा के कैंसर के मिले जुले लक्षण थे। दो साल बाद एचआइवी वायरस की पहचान हुई जिससे एड्स रोग होता है।
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क्या है एचआईवी-एड्स
एचआइवी (हयूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस) के संक्रमण के कारण होने वाली बीमारी को एड्स कहा जाता है। जब एचआइवी वायरस पूरे शरीर में फैल जाता है, तो शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता खत्म हो जाती है। यह एचआइवी संक्रमण का अंतिम चरण होता हैं जिसे एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएन्सी सिन्ड्रोम) कहते हैं।
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शरीर को कैसे प्रभावित करता है
एचआईवी वायरस शरीर की सबसे महत्वपूर्ण रोग प्रतिरोधक ग्रंथि टी-शैल को प्रभावित करता है, जिससे शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता खत्म होने लगती हैं। इसके लक्षण रोगी में तुरंत दिखाई नहीं देते, इसमें कुछ समय लगता है।
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इसलिए नहीं चल पाता एड्स का पता
एचआईवी वायरस कई सालों तक मरीज के शरीर में बिना कोई हरकत किए पड़ा रहता है। एचआइवी हमारे जींस में जुड़ जाता है और प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम में छुपा रहता है। जब तक एचआइवी वायरस सक्रिय नहीं होता तब तक कोई भी दवाई इसके खिलाफ काम नहीं कर पाती। लेकिन जब ये सक्रिय होता है तो बेकाबू हो जाता है।
सिर्फ यौन संबंध नहीं हैं एड्स के लिए जिम्मेदार
एड्स सिर्फ असुरक्षित यौन संबंध से ही नहीं फैलता। मरीजों के इलाज के दौरान लगाए जाने वाले इंजेक्शनों और अन्य उपकरणों से भी संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। इसके अलावा खून चढ़ाते समय सावधानी न बरतने पर भी मरीज के एचआईवी संक्रमण की चपेट में आने की संभावना बनी रहती है।
एड्स से लड़ाई में स्टेम सेल हैं कारगर
स्टेम कोशिकाओं में जेनेटिक तौर पर इस तरह बदलाव किया जा सकता है कि वे एक जीवित प्राणी में एचआईवी इंफेक्टेड कोशिकाओं को खोज सकें और और उनका खात्मा कर सकें। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में हुए शोध में पाया गया कि ऐसे सेल तैयार किए जा सकते हैं जो उन टिश्यूज को निशाना बनाएंगी जिनमें एचआईवी वायरस छुपे रहते हैं और बढ़ते जाते हैं। वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग में चूहों का इस्तेमाल किया। चूहे में इंसानों की तर्ज पर ही एचआईवी फैलता है।
बच्चों में जागरूकता जरूरी
स्कूलों में दी जाने वाली एड्स की शिक्षा का बहुत अहम रोल होता है। किशोरावस्था में बच्चों को इसकी जानकारी देने से यह फायदा होता है कि जब वे यौवनावस्था में पहुंचते हैं, तो वे इसके खतरे से खुद को बचा सकते हैं।