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यूनानी फूड में काफी दिलचस्पी ले रहे हैं भारतीय, जानें इससे जुड़ी दिलचस्प बातें
Mon, 11 Feb 2019 12:09 AM IST
मोना नारंग
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत
Published by: मोना नारंग
Updated Mon, 11 Feb 2019 12:09 AM IST
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unani food
यूनानी भोजन में पनीर, जैतून का तेल, सलाद और सब्जियों को अहमियत दी जाती है, शायद इसी कारण हम भी अब यूनानी खानपान में दिलचस्पी ले रहे हैं।
मौर्य राजवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त के समय में एक प्रतापी यूनानी शासक अपने दिग्विजयी अभियान पर भारत पहुंचा था। हालांकि गंगा तक पहुंचने में वह असमर्थ रहा और सिंधु नदी के तटवर्ती राज्यों को ही वह अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाने में सफल हो सका। इस आक्रमण के स्थाई प्रभाव उपमहाद्वीप पर पड़े। मूर्तिकला की ‘गांधार शैली’, नाटकों के मंच पर ‘यवनिका’ तथा ‘यूनानी’ चिकित्सा विज्ञान एवं दर्शन से भारत का साक्षात्कार हुआ।
यूनान भारत के लिए यूरोपीय जगत का प्रवेश द्वार न सही झरोखा जरूर बन सका। यह घटनाक्रम ईसा के जन्म के पहले वाली चौथी सदी का है। दिलचस्प बात है कि सिकंदर की वापसी के बाद भी कुछ यूनानी उत्तर पश्चिमी सीमांत पर बसे रहे और एक छोटा यूनान वहां फलता-फूलता रहा। यह सुझाना तर्कसंगत है कि भारतीय यूनानी खानपान से कभी भी अपरिचित नहीं रहे हैं।
हाल के दिनों में यूनानी खाने में हमारी दिलचस्पी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। यह भूमध्यसागरीय भोजन की एक शाखा है, जिसे निर्विवाद रूप से सेहत के लिए सर्वश्रेष्ठ करार दिया जा चुका है। यूनानी भोजन में दही (योगर्ट), पनीर (विशेषकर बकरी के दूध से बना पनीर), जैतून का तेल, ताजा सब्जियों का सलाद, हरी पत्तियां, मछलियां तथा समुद्री जीव-जंतुओं को प्रमुख स्थान दिया जाता है। खाने के साथ मदिरा पान का चलन है। अंगूर और अन्य मौसमी तथा सूखे फल अनेक व्यंजनों की बुनियाद हैं।
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मांस में बकरे का चलन है, जिसके कीमे से बनाया जाने वाला ‘मुसाका’ हमारे ‘ताश कबाब’ की तरह होता है। कीमे के साथ इसमें बैंगन की तली कतली भी रहती है, जिसे मुंह में डालते ही बंगाल के ‘बेगुन भाजा’ की याद दिलाता है। अंगूर की पत्तियों में लपेटकर नन्हे चीनी ‘स्प्रिंग रोल्स’ सरीखे दिखने वाले ‘डोल्मा’ स्वादिष्ट चावलों से भरे रहते हैं। अवध के भरवां परवल ‘दुलमा’ या बंगाल के ‘दोलमा’ इन्हीं की संतान नजर आते हैं।
मसालों के नाम पर ग्रीक अर्थात यूनानी खानपान में ताजा पुदीने, धनिए (सिलैंट्रो) या सूखी वनस्पतियों (ओरेगैनो जैसी हर्ब्स) का चलन है या काली मिर्च औेर लौंग के साथ जावित्री तथा जायफल। जबसे दक्षिणी अमेरिका से टमाटर तथा आलू का आयात हुआ, तभी से इसका इस्तेमाल भी खुले हाथ से होता रहा है। सब्जियों में भिंडी, बीन, शिमला मिर्च चाव से खाई जाती हैं।
मिठास के लिए शहद तथा खटास के लिए कागजी नींबू का इस्तेमाल आम है। जाहिर है कि यूनानी खाने के जायके भारतीय जुबान पर चढ़ेे जायकों से बहुत भिन्न नहीं। शायद यही कारण है कि इस देश में यह अपनी अलग पहचान बनाने में असमर्थ सिद्ध हुआ। हमें विदेशी विजेताओं के ‘अनोखे’ खाने ने अधिक आकर्षित किया। दास सुलभ मानसिकता ने उसे ही अनुकरणीय समझा।
सभ्य-सुसंस्कृत यूनानियों को बर्बर रोमनों ने हराया और बाद में इन्हें हूणों ने पराजित किया। बाद की सदियों में मंगोलों, मुसलमान अरबों के साम्राज्य का विस्तार स्पेन तक हुआ। संक्षेप में जैसे-जैसे ‘नए’ खानपान के प्रभाव की परतें चढ़ीं, भूमिगत आधार विस्मृत होता गया। तले ने भुने को पीछे धकेल दिया और ‘दबंग’ मसालों या दुर्लभ-महंगे आयातित खाद्य पदार्थों ने उन स्थानीय-मौसमी व्यंजनों को विस्थापित कर दिया, जो स्वादिष्ट भी होते हैं और स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद भी।
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मौर्य राजवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त के समय में एक प्रतापी यूनानी शासक अपने दिग्विजयी अभियान पर भारत पहुंचा था। हालांकि गंगा तक पहुंचने में वह असमर्थ रहा और सिंधु नदी के तटवर्ती राज्यों को ही वह अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाने में सफल हो सका। इस आक्रमण के स्थाई प्रभाव उपमहाद्वीप पर पड़े। मूर्तिकला की ‘गांधार शैली’, नाटकों के मंच पर ‘यवनिका’ तथा ‘यूनानी’ चिकित्सा विज्ञान एवं दर्शन से भारत का साक्षात्कार हुआ।
यूनान भारत के लिए यूरोपीय जगत का प्रवेश द्वार न सही झरोखा जरूर बन सका। यह घटनाक्रम ईसा के जन्म के पहले वाली चौथी सदी का है। दिलचस्प बात है कि सिकंदर की वापसी के बाद भी कुछ यूनानी उत्तर पश्चिमी सीमांत पर बसे रहे और एक छोटा यूनान वहां फलता-फूलता रहा। यह सुझाना तर्कसंगत है कि भारतीय यूनानी खानपान से कभी भी अपरिचित नहीं रहे हैं।
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हाल के दिनों में यूनानी खाने में हमारी दिलचस्पी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। यह भूमध्यसागरीय भोजन की एक शाखा है, जिसे निर्विवाद रूप से सेहत के लिए सर्वश्रेष्ठ करार दिया जा चुका है। यूनानी भोजन में दही (योगर्ट), पनीर (विशेषकर बकरी के दूध से बना पनीर), जैतून का तेल, ताजा सब्जियों का सलाद, हरी पत्तियां, मछलियां तथा समुद्री जीव-जंतुओं को प्रमुख स्थान दिया जाता है। खाने के साथ मदिरा पान का चलन है। अंगूर और अन्य मौसमी तथा सूखे फल अनेक व्यंजनों की बुनियाद हैं।
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मांस में बकरे का चलन है, जिसके कीमे से बनाया जाने वाला ‘मुसाका’ हमारे ‘ताश कबाब’ की तरह होता है। कीमे के साथ इसमें बैंगन की तली कतली भी रहती है, जिसे मुंह में डालते ही बंगाल के ‘बेगुन भाजा’ की याद दिलाता है। अंगूर की पत्तियों में लपेटकर नन्हे चीनी ‘स्प्रिंग रोल्स’ सरीखे दिखने वाले ‘डोल्मा’ स्वादिष्ट चावलों से भरे रहते हैं। अवध के भरवां परवल ‘दुलमा’ या बंगाल के ‘दोलमा’ इन्हीं की संतान नजर आते हैं।
मसालों के नाम पर ग्रीक अर्थात यूनानी खानपान में ताजा पुदीने, धनिए (सिलैंट्रो) या सूखी वनस्पतियों (ओरेगैनो जैसी हर्ब्स) का चलन है या काली मिर्च औेर लौंग के साथ जावित्री तथा जायफल। जबसे दक्षिणी अमेरिका से टमाटर तथा आलू का आयात हुआ, तभी से इसका इस्तेमाल भी खुले हाथ से होता रहा है। सब्जियों में भिंडी, बीन, शिमला मिर्च चाव से खाई जाती हैं।
मिठास के लिए शहद तथा खटास के लिए कागजी नींबू का इस्तेमाल आम है। जाहिर है कि यूनानी खाने के जायके भारतीय जुबान पर चढ़ेे जायकों से बहुत भिन्न नहीं। शायद यही कारण है कि इस देश में यह अपनी अलग पहचान बनाने में असमर्थ सिद्ध हुआ। हमें विदेशी विजेताओं के ‘अनोखे’ खाने ने अधिक आकर्षित किया। दास सुलभ मानसिकता ने उसे ही अनुकरणीय समझा।
सभ्य-सुसंस्कृत यूनानियों को बर्बर रोमनों ने हराया और बाद में इन्हें हूणों ने पराजित किया। बाद की सदियों में मंगोलों, मुसलमान अरबों के साम्राज्य का विस्तार स्पेन तक हुआ। संक्षेप में जैसे-जैसे ‘नए’ खानपान के प्रभाव की परतें चढ़ीं, भूमिगत आधार विस्मृत होता गया। तले ने भुने को पीछे धकेल दिया और ‘दबंग’ मसालों या दुर्लभ-महंगे आयातित खाद्य पदार्थों ने उन स्थानीय-मौसमी व्यंजनों को विस्थापित कर दिया, जो स्वादिष्ट भी होते हैं और स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद भी।