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कमजोर नहीं तुम! दिव्यांग होने के बाद भी इन महिलाओं ने लहराया सफलता का परचम
Thu, 07 Dec 2023 10:22 AM IST
प्रकाश चंद जोशी
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: प्रकाश चंद जोशी
Updated Thu, 07 Dec 2023 10:22 AM IST
सार
भारत की सबसे छोटे कद की मीनू रहेजा ने खुद दिव्यांग होने के बावजूद सफलता के परचम लहराए हैं और अब अन्य दिव्यांगजनों की मदद कर उनका जीवन सवार रही हैं। हरियाणा के हिसार में रहने वाली मीनू की लंबाई महज 2 फीट 9 इंच है। वह पेशे से वकील हैं।
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राजीव गांधी खेल रत्न सम्मान प्राप्त करतीं दीपा मलिक
- फोटो : PIB
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विस्तार
प्रभा किरण,
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किसी को कद को लेकर ताने मिलते तो किसी की कामयाबी में शारीरिक अक्षमता खड़ी थी, लेकिन आगे बढ़ने वाले कब किसी की सुनते हैं। जिंदगी में 'हार' जैसे शब्द उन्हें पसंद नहीं होते। तभी तो वे आसमान में भी छेद करने का हौसला रखते हैं। ऐसी ही कुछ महिलाओं की कहानियां...
उनके मन में विश्वास था, दिल में जुनून सवार था और दिमाग में कुछ करने की जिद थी। शारीरिक अक्षमता थी, लेकिन उन्होंने कभी उसे अपनी सफलता के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने जीवन में अपने सपने तो पूरे किए ही, साथ में अन्य दिव्यांगजनों और पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत भी बनीं। अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगता दिवस पर कुछ ऐसी ही महिलाओं की कहानियां, जिन्होंने न केवल खुद के लिए रास्ते बनाए और आत्मनिर्भर बनीं, बल्कि खुद सफल होने के बाद अपनी जैसी लड़कियों के लिए अनोखी पहल भी की।
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तानों को बनाया ताकत
मीनू रहेजा
अधिवक्ता, हिसार
भारत की सबसे छोटे कद की मीनू रहेजा ने खुद दिव्यांग होने के बावजूद सफलता के परचम लहराए हैं और अब अन्य दिव्यांगजनों की मदद कर उनका जीवन सवार रही हैं। हरियाणा के हिसार में रहने वाली मीनू की लंबाई महज 2 फीट 9 इंच है। वह पेशे से वकील हैं। 2019 में उन्होंने ‘रहेजा कृष्णा दिव्यांग’ नाम से एनजीओ शुरू किया। इसके तहत वह दिव्यांगों की पढ़ाई के साथ उन्हें पेंशन दिलाकर और कानूनी मसलों को हल करती हैं। मीनू को छोटे कद के कारण लोग ताने मारते थे और उन पर हंसते थे।
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वह बताती हैं, “मां-पापा चाहते थे कि मैं वकील बनूं। जब मैं पहली बार कोर्ट में पहुंची तो मन में एक हिचक थी। इसे दूर करने में उन्होंने मेरी मदद की और मेरा हौसला बढ़ाया।” मीनू को 2019 में इनफिनिटी बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और एक्सक्लूसिव वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह मिली। उनका नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है।
खोला दिव्यांग स्कूल
सविता सिंह
सदस्य, दिव्यांग राज्य सलाहकार बोर्ड
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की रहने वाली सविता सिंह दिव्यांग बच्चों को ही अपना परिवार मानती हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन दिव्यांग बच्चों के लिए समर्पित कर दिया है। सविता 2007 से अपनी संस्था ‘समर्पण’ के बैनर तले ‘राजेश्वरी विकलांग विद्यालय’ चला रहीं हैं, जिसमें करीब 250 दिव्यांग बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
सविता बच्चों की पढ़ाई के साथ उन्हें कंप्यूटर और सिलाई-कढ़ाई की ट्रेनिंग भी देती हैं, जिससे वे अपना रोजगार शुरू कर सकें। इन बच्चों को पढ़ाई के लिए किताब, कॉपी और ड्रेस भी दी जाती हैं, साथ ही उनके रहने के लिए हॉस्टल भी है। सविता खुद दिव्यांग हैं, इसलिए वह इन बच्चों का दर्द अच्छी तरह समझती हैं। सविता का एक पैर बचपन से खराब है, जिसकी वजह से उन्होंने बचपन में काफी परेशानियों का सामना किया। वह आम बच्चों की तरह न दौड़ पाती और न ही डांस कर पाती थीं।
सविता ने जब यह स्कूल खोला तो शास्त्री नगर इलाके में दिव्यांगों के लिए कोई स्कूल नहीं था और स्कूल खोलना इतना आसान भी नहीं था, लेकिन सविता ने हार नहीं मानी। उन्होंने गली-गली जाकर लोगों से चंदा मांगा और अपनी जिंदगी भर की कमाई भी इसमें लगा दी। सविता को 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार और विकलांग कल्याण विभाग द्वारा स्टेट अवार्ड दिया गया। 2015 में उन्हें ‘केविन केयर एपीलिटी अवॉर्ड’ मशहूर संगीतकार ए.आर. रहमान के हाथों मिला। साल 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से उन्हें इस काम के लिए सम्मानित किया गया।
कमजोरी से मिली शक्ति
नीलम एवं रेखा बेन परमार
समाज सेविकाएं, जूनागढ़
गुजरात के जूनागढ़ की रहने वाली दो बहनें नीलम बेन परमार और रेखा बेन परमार मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए काम कर रही हैं। नीलम खुद दिव्यांग हैं, इसके बावजूद वह 40 बच्चों का सहारा बनी हुई हैं। इन बहनों ने साथ मिलकर ‘सांत्वन विकलांग विकास मंडल’ नाम से संस्था बनाई, जो मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की मदद करती है।
इसकी प्रेरणा इन्हें तब मिली, जब 2009 में रेखा बहन के इलाज के लिए राजस्थान में डेढ़ साल रुकी थीं। इलाज के दौरान दोनों बहनों ने दूसरे मरीजों का दर्द महसूस किया और उनकी मदद करने की ठानी। इसके लिए दोनों ने समाज सेवा के बारे में ज्यादा जानने की गरज से 2011 में नागपुर में आठ महीने की ट्रेनिंग ली। वहां से लौटकर दोनों ने पिता से बात की और छोटे स्तर पर संस्था की शुरुआत कर दौलतपारा की एक झोपड़-पट्टी से मानसिक रूप से कमजोर दो लड़कियों को लाईं।
2012 में दोनों ने घर छोड़कर इन लड़कियों के साथ रहना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद उन्होंने वडाल गांव में एक छोटा घर किराए पर लिया। यहां आने के बाद लड़कियों की संख्या बढ़कर पांच हो गई। जैसे-जैसे आस-पास के लोगों को उनके इस नेक काम के बारे में पता चला, गांव के लोग जरूरतमंद लड़कियों को संस्था में पहुंचाने लगे और उनकी आर्थिक मदद भी करने लगे।
2015 में रेखा नौकरी छोड़कर पूरी तरह इन बच्चों की सेवा में लग गईं। उन्होंने चंदा मांगकर बच्चियों की पढ़ाई की व्यवस्था शुरू की। आज इन दोनों बहनों की संस्था में करीब 15 लोग काम कर रहे हैं। ये लोग इन लड़कियों को खान-पान, क्राफ्टिंग और नृत्य आदि सिखाने में मदद करते हैं।
दीपा मलिक ने देश का नाम किया रोशन
नोएडा की रहने वाली दीपा मलिक 2016 में पैरालंपिक खेलों में रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं। दीपा का जीवन चुनौतियों से भरा रहा, जिनका सामना करने के लिए माता-पिता ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। महज 30 वर्ष की उम्र में उनकी तीन ट्यूमर सर्जरी हुईं, जिससे उनके शरीर का निचला हिस्सा पूरी तरह सुन्न हो गया था। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने शॉटपुट और ज्वलीन थ्रो में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीते। उन्होंने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 33 स्वर्ण और 4 रजत पदक जीते। 2008 तथा 2009 में यमुना में तैराकी और स्पेशल बाइक सवारी में भाग लेकर दो बार लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया। पैरालंपिक खेलों में उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें अर्जुन पुरस्कार दिया गया। उन्हें पद्मश्री, खेल रत्न जैसे सम्मान से भी नवाजा गया है।
दीपा मलिक को 5 राष्ट्रपति पुरस्कार, 4 लिम्का विश्व रिकॉर्ड, 3 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, 68 राष्ट्रीय और राज्य पदक, 23 अंतराष्ट्रीय पदक भी मिले हैं। दीपा ने २०१४ में ‘व्हीलिंग हैप्पीनेस’ नाम की संस्था की स्थापना की। इसके जरिए वह दिव्यांगजनों की शारीरिक, वित्तीय और भावनात्मक सहायता करती हैं। दीपा बताती हैं, “२०१६ में जब मुझे पदक मिला, उसके बाद से महिलाओं और दिव्यांग लड़कियों की खेलों में भागीदारी ३०० गुना बढ़ी है, जो उत्साहजनक है। मैं चाहती हूं कि यह भागीदारी और बढ़े।”