सभी शाकाहारी हो जाएं तो क्या होगा?
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कोलंबिया में इंटरनेशनल सेंटर फॉर ट्रॉपिकल एग्रीकल्चर में काम करने वाले एंड्र्यू जार्विस कहते हैं कि विकसित देशों में शाकाहारी होने के बहुत से फायदे हैं। ये पर्यावरण और सेहत दोनों के लिए बेहतर है। लेकिन विकासशील देशों में ये गरीबी को बढ़ावा देने की वजह भी बन सकता है। अगर सारी दुनिया से रातों-रात मांस खाने वालों को हटा दिया जाए तो क्या होगा? इसके लिए जार्विस और दूसरे जानकार बहुत से तर्क देते हैं।
उनका कहना है हमारे खाने की आदतें हमारे माहौल पर असर डालती हैं लेकिन इसे लोग गंभीरता से नहीं लेते। मिसाल के लिए अमरीका में चार लोगों का मांसाहारी परिवार दो कारें से भी ज़्यादा ग्रीन हाऊस गैस छोड़ता है। लेकिन जब ग्लोबल वॉर्मिंग की बात होती है तो सिर्फ कारों की बात की जाती है मांस खाने वालों की नहीं।
जिसकी वजह से ज़्यादा ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन ज़्यादा होता है। ब्रिटेन के फूड सिक्यूरिटी एक्सपर्ट टिम बेन्टन का कहना है कि हमारी खाने की आदतों का हमारे माहौल पर असर पड़ता है लेकिन इस पर किसी का ध्यान जाता ही नहीं अगर आज हम सभी मांस खाना बंद ना भी करें, सिर्फ उसकी तादाद कम कर दें तो भी काफ़ी अच्छे नतीजे आ सकते हैं।
मांसाहारियों के लिए बड़े पैमाने पर जानवर पाले जाते हैं। जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में जगह चाहिए। एक अंदाजे के मुताबिक दुनिया में बारह अरब एकड़ जमीन खेती और उससे जुड़े काम में इस्तेमाल होती है। इसका 68 फीसद हिस्सा जानवरों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अगर सभी सब्जी खाने वाले हो जाएंगे तो करीब 80 फीसद जमीन चरागाहों और जंगलों के लिए इस्तेमाल में लाई जाएगी।
इससे माहौल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा कम होगी और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिलेगी। बची हुई 10 से 20 फीसद जमीन का इस्तेमाल फसलें उगाने में किया जा सकेगा। अभी जितनी जमीन पर खेती होती है, उसके एक तिहाई हिस्से पर जानवरों के लिए ही चारा उगाया जाता है।
दुनिया भर में गोश्त खाने वालों की कमी नहीं है इसीलिए इसका कारोबार भी व्यापक पैमाने पर फैला हुआ है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के बेन फालान कहते हैं कि दुनिया में करीब साढ़े तीन अरब जानवर जुगाली करने वाले हैं और, करीब 10 अरब से भी ज़्यादा मुर्गियां-मुर्गे हैं। इतनी ही तादाद में हर साल इन्हें काटा भी जाता है। जरा सोचिए कितनी बड़ी संख्या में लोग इनके पालने से लेकर इन्हें काटने और लोगों तक पहुंचाने में लगे हैं।
एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के पीटर एलेक्जेंडर कहते हैं कि मीट के कारोबार में लगे लोगों के लिए नया रोजगार पैदा करना जरूरी है। तभी हम दुनिया को मांसाहारी से शाकाहारी बनाने की तरफ आगे बढ़ सकेंगे। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बड़े पैमाने पर बेरोजगारी का संकट खड़ा हो जाएगा। सबसे पहले ये समझाना होगा कि वो जानवरों के पालने के साथ साथ पर्यावरण के लिए कैसे मदद कर सकते हैं। मसलन, वो अपने जानवरों के लिए जिस चारे का इस्तेमाल करते हैं, उससे वो कैसे बायो-एनर्जी पैदा कर सकते हैं? या चरागाहों को ही कैसे बेहतर बनाकर पर्यावरण को बचा सकते हैं? उन्हें समझाना होगा कि इससे उन्हें रोजगार के दूसरे मौके मिलेंगे।
दुनिया की कुल जमीन का एक तिहाई हिस्सा या तो पूरी तरह से बंजर या कुछ हद तक बंजर जमीन है। इस जमीन का इस्तेमाल जानवरों को चराने के लिए ही किया जा सकता है। अफ्रीका जैसे देशों ने कुछ हिस्सों में चरागाहों को खेती के लायक बनाने की कोशिश की गई लेकिन ऐसा हो न सका। रिसर्चर बेन फालान कहते हैं कि दुनिया में बहुत से ऐसे इलाक़े हैं जहां जानवरों के बिना कुछ लोगों का रहना मुमकिन ही नहीं है।
घुमंतू जातियों के लिए तो ये बात पुख्ता तौर पर कही जा सकती है। जानवर उनके रहन-सहन का अटूट हिस्सा हैं। अगर इन जातियों को शहरों में बसा दिया जाएगा, तो, उनकी सांस्कृतिक पहचान ही गुम होने लगेगी। जब तक इंसान ने खेती करना नहीं सीखा था वो ज़्यादातर मांस ही खाता था। यहां तक कि शादी ब्याह में भी तोहफे के तौर पर जानवर दिये जाते थे। जिसके पास जितने ज़्यादा जानवर होते थे, वो उतना ही ताकतवर समझा जाता था। बड़ी दावत या त्यौहार पर मीट के ही पकवान बनाए जाते थे। लिहाजा गोश्त का खाया जाना हमारे इतिहास की जड़ों में बसा है। इसे आसनी से अलग नहीं किया जा सकता।
अलबत्ता शाकाहारी होने के अपने फायदे हैं, इसमें कोई शक नहीं। स्प्रिंगमैन की कंप्यूटर मॉडल स्टडी कहती है कि अगर 2050 तक सारी दुनिया के लोग शाकाहारी हो जाएंगे तो बेवक्त मरने वालों की तादाद में छह से दस फीसद तक की कमी आ सकती है। लोगों को कैंसर, शुगर, हार्ट अटैक जैसी बीमारियों से भी छुटकारा मिल जाएगा। लोग बीमार कम होंगे तो उनके मेडिकल बिल भी कम हो जाएंगे।
इस पैसे का इस्तेमाल वो जिंदगी की दूसरी जरूरतें पूरी करने लिए कर पाएंगे। ये ख्याल सुनने में बहुत अच्छा है लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि दाल-चावल और सब्जियां प्रोटीन का विकल्प नहीं हो सकतीं। जानवरों के गोश्त में पोषक तत्व ज़्यादा होते हैं। शरीर के लिए प्रोटीन भी उतना ही जरूरी है, जितना कि दूसरे पोषक तत्व। गरीबों के लिए तो प्रोटीन का सबसे सस्ता जरिया ही जानवरों का गोश्त है। अगर सारी दुनिया शाकाहारी हो जाएगी तो सबसे बड़ा संकट विकासशील देशों के लिए हो जाएगा।
एक स्टडी में पाया गया है कि ब्रिटेन ने खाने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक अपनाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 17 फीसद तक की कमी कर ली। अगर हम भी अपने खाने में थोड़ा सा बदलाव ले आएं तो वो पर्यावरण और खुद हमारे लिए फायदेमंद होगा। एक काम और किया जा सकता है।
मीट और मीट से बनी चीजों के दाम बढ़ा दिये जाएं। फल-सब्जियों के दाम कर रखे जाएं। फिर जिन लोगों की जेब इजाजत देगी वही लोग मीट या मीट से बनी चीजें खरीदेंगे। मांसाहार के कारोबार से जो ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है उस पर काबू पाने के ऐसे बहुत से छोटे छोटे तरीके मौजूद हैं। बस जरूरत है इच्छा शक्ति की। उसके लिए सभी को शाकाहारी होने की जरूरत नहीं।