Coronavirus: उन पांच डॉक्टरों की कहानी, जो इलाज करते-करते कोरोना की चपेट में आ गए
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कोरोना काल के पहले टेस्ट सिरीज की प्रैक्टिस के दौरान इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स ने एक भारतीय डॉक्टर विकास कुमार के नाम की टीशर्ट पहनी थी। स्टोक्स इसके जरिए इंग्लैंड के डॉक्टरों के जज्बे को सलाम कर रहे थे। इंग्लैंड ही नहीं, पूरी दुनिया में डॉक्टर दिन रात एक करके लाखों की तादाद में कोरोना के मरीजों को ठीक करने के काम में जुटे हैं।
डॉक्टरों के कठिन और कर्मठ प्रयास से भारत भी अछूता नहीं है। लगातार कोरोना के मरीजों के इलाज में जुटे ये डॉक्टर सबसे अधिक एक्सपोज्ड हैं और इसके चलते कोरोना से संक्रमित भी हो रहे हैं। देश के कई इलाकों से कुछ डॉक्टरों के मौत की भी खबरें आईं। हम आज यहां उन पांच डॉक्टरों की बात कर रहे हैं जो खुद नॉट आउट रहते हुए कोरोना संक्रमण की बाउंड्री पार करके वापस अस्पताल के मैदान में बैटिंग करने उतरे हैं या उतरने ही वाले हैं।
'मैं कोरोना पॉजिटिव थी, ये मालूम है मुझसे इलाज कराने वाले मरीजों को'
बिहार से बीबीसी की सहयोगी सीटू तिवारी ने डॉक्टर प्रतिमा से बात की जो मुजफ्फरपुर के केजरीवाल अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और रोगियों का इलाज करते करते खुद ही मरीज बन बैठीं। पढ़ें क्या है डॉक्टर प्रतिमा का कहना।
मेरे पति डॉ संजय कुमार भी पेशे से डॉक्टर हैं और मेरा बेटा भी एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है। इसलिए हमारा परिवार अच्छी तरह जानता है कि संकट की इस घड़ी में डॉक्टरों की प्रतिबद्धता के क्या मायने हैं। 23 जून को मेरे सिर में दर्द शुरू हुआ। मुझे लगा कि ये मेरे माइग्रेन का दर्द है। मुझे बुखार, खांसी जुकाम की कोई समस्या नहीं थी। 28 जून को मेरे एक सीनियर सहकर्मी की कोरोना टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। उनकी हालत सीरियस हो गई और उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया।
इससे थोड़ी घबराहट महसूस हुई। मैंने अपना कोरोना टेस्ट कराया। मैं पॉजिटिव थी, जिसके बाद दो जुलाई को मुझे पटना के एम्स में भर्ती कराया गया। इस बीच मेरे पति की रिपोर्ट तो नेगेटिव आई, लेकिन बेटे की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। मरीजों को देखने के दौरान मैं संक्रमित हुई थी और मुझसे मेरा बेटा संक्रमित हुआ था।
अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान मैंने सोशल मीडिया और अन्य जरियों से ढूंढ ढूंढ कर अपने एमबीबीएस के पुराने दोस्तों से बात की। हम लोगों की बातचीत इस बात से शुरू होती कि 'आप ठीक हैं', और उसके बाद हंसी मजाक और दुनियाभर की दूसरी बातें, लेकिन कोरोना के बारे में कोई बात नहीं करते थे। हमने ये नियम बना लिया था। इस दौरान मुझे सांस की तकलीफ शुरू हो गई। थोड़ा सा चलने पर ही सांस उखड़ने लगती थी, लेकिन अस्पताल में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई। एम्स, पटना में साफ-सफाई का ख्याल रखा जाता था और समय पर सादा खाना मिलता था।
अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी कमजोरी महसूस होती थी। इधर सोशल मीडिया और दूसरे संचार माध्यमों से मेरे कोरोना पॉजिटिव होने की खबर फैल चुकी थी। मुझे सिंगापुर में रहने वाली मेरी बहुत पुरानी दोस्त तक ने फोन करके पूछा। हालांकि अब सब कुछ सामान्य है।
मैंने कुछ दिन पहले से ही फिर से मरीजों को देखना शुरू कर दिया। मेरे मरीज जानते हैं कि मैं कोरोना पॉजिटिव थी, लेकिन वो बेहिचक आते हैं। गर्भवती महिलाएं आती हैं, डिलिवरी केस भी आते हैं। मेरी इच्छा शक्ति, परिवार, समाज और खास तौर पर मेरे मरीजों के विश्वास ने मेरे जीवन में नई ऊर्जा भर दी है।
डॉक्टर का वीडियो हुआ वायरल
बेंगलुरु से बीबीसी के सहयोगी इमरान क़ुरैशी ने मल्लेश्वरम में केसी जनरल हॉस्पिटल के 53 वर्षीय फिजीशियन और सीनियर स्पेशलिस्ट डॉ. के जी सुरेश से बात की जो कोविड19 पॉजिटिव होने के बाद होम क्वारंटीन में हैं और जिन्हें हाल ही में एक ऐसी घटना से गुजरना पड़ा जिससे जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल था। उस घटना का जिक्र और डॉक्टर सुरेश क्या सोचते हैं। पढ़ें खुद उनके ही शब्दों में।
मेरा हॉस्पिटल विक्टोरिया हॉस्पिटल या बोरिंग हॉस्पिटल की तरह से टर्शरी हॉस्पिटल (ऐसे हॉस्पिटल जो आमतौर पर आईपीडी या रेफरल मरीजों को स्पेशलाइज्ड कंसल्टेटिव हेल्थकेयर मुहैया कराते हैं) नहीं है। केसी जनरल हॉस्पिटल एक सेकेंडरी लेवल हॉस्पिटल है यानी कि यह एक जिला अस्पताल जैसा है। इस अस्पताल में फिलहाल 100 बेड्स खासतौर पर कोविड के मरीजों के लिए रखे गए हैं, लेकिन हमारी दिक्कत कोविड मरीजों की नहीं है, क्योंकि इसके लिए एक तय प्रोटोकॉल है और हम आईसीएमआर से आने वाले सभी निर्देशों का पालन करते हैं।
हमारी चुनौती दोगुनी है। पहली हमारे हॉस्पिटल में आने वाले एसएआरआई केसों की संख्या की है और दूसरी, मरीजों और उनके परिजनों से निबटने की है। मरीज जब हमारे पास आते हैं तो उनकी स्थिति का पता नहीं होता। वे कोविड पॉजिटिव हैं या नहीं, हम नहीं जानते। ऐसे में जब तक हमें यह नहीं पता चलता कि वे किस बीमारी से जूझ रहे हैं, उनके परिजनों से निबटना बड़ा ही तनावपूर्ण होता है। हमारे ज्यादातर मरीज मध्यम वर्ग या कम आमदनी वाले तबके से आते हैं।
चूंकि, ये काफी बेचैन होते हैं, ऐसे में ये लोग मास्क पहनने या सामाजिक दूरी जैसी आम चीजों का ख्याल नहीं रखते। जब हम उन्हें दूरी बनाए रखने के लिए बोलते हैं तो उन्हें बुरा लगता है। ऐसा ज्यादातर वैसे मरीजों के साथ होता है जो कि शहरी इलाकों से आते हैं। ग्रामीण इलाके के लोग हमारी बात को एक बार में ही मान जाते हैं। साथ ही वे बड़ी उम्मीदों के साथ आते हैं। वे कोविड के डर से काफी भावुक हो जाते हैं।
इसी तरह की चिंता के चलते हॉस्पिटल में एक घटना हुई। एक मरीज को मेरे सहयोगी ने 19 जुलाई को भर्ती किया था। दो दिन बाद मुझे एक कॉल आई और मैं भागकर पहुंचा तो पता चला कि मरीज को आईसीयू ले जाना होगा, लेकिन हमारे यहां आईसीयू की सुविधा नहीं है। मरीज के रिश्तेदार निजी अस्पताल जाने के लिए राजी थे। जब तक वे किसी अस्पताल की तलाश कर पाते, मरीज की मौत हो गई। हमने रिश्तेदारों को समझाया कि चूंकि मरीज एंटीजन टेस्ट में कोरोना संक्रमित पाया गया था, ऐसे में पार्थिव शरीर को केवल बीबीएमपी (बंगलुरू महानगरपालिका) को ही सुपुर्द किया जा सकता है।
रिश्तेदार इसे लेकर काफी भावुक हो गए और उन्होंने सवाल उठाने शुरू कर दिए। हमने उन्हें समझाने की पूरी कोशिश की। जिस वक्त मैं दूसरे मरीजों को देख रहा था तब मुझे पता चला कि वे बातचीत को रिकॉर्ड कर रहे हैं। तब मैंने मेरा मोबाइल फोन निकाला और जो कुछ भी वे कर रहे थे उसे रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया। उनमें से कुछ लोगों ने फोन छीनने की कोशिश की और यह नीचे गिर गया। यह केवल भावनात्मक स्थिति को दिखाता है। मैं उन्हें कसूरवार नहीं मानता हूं, लेकिन पूरी गंभीरता से कहूं तो घुटन पैदा करने वाले पीपीई सूट को पहनकर काम करने को छोड़ दिया जाए तो क्लीनिकल मैनेजमेंट पर उतना बुरा असर नहीं होता है जितनी बड़ी चुनौती आज के वक्त में मरीजों के रिश्तेदारों के साथ भावनात्मक रूप से पैदा हालात से निबटने की होती है।
डॉक्टरों के सामने आज यही सबसे बड़ी चुनौती है। इसका असर हम सभी डॉक्टरों पर पड़ रहा है। कोविड वॉर्ड में मेरे दो फिजीशियन सहयोगी पॉजिटिव पाए गए। अब हमारे एक प्रोफेसर पॉजिटिव निकले हैं। पिछले हफ्ते मैं कोविड ड्यूटी पर था, क्योंकि हमारे सीनियर रेजिडेंट इससे पिछले हफ्ते काम करने के चलते अनिवार्य छुट्टी पर थे। कोविड वॉर्ड में ड्यूटी कर रहे डॉक्टरों को एक हफ्ते का ऑफ दिया जाता है और उसके बाद ही वे ड्यूटी पर लौट सकते हैं। महज दो दिन बाद मैं कोविड पॉजिटिव निकला हूं। फिलहाल मैं होम क्वारंटीन में हूं और मौजूदा मानव संसाधन पर इस वक्त भारी तनाव है। हालांकि ठीक होकर मैं एक बार फिर अस्पताल में मरीजों के इलाज में जुट जाऊंगा।
डॉक्टर जो नहीं डरती कोरोना से
असम से बीबीसी के सहयोगी दिलीप कुमार शर्मा ने उस महिला डॉक्टर डॉ. मालविका बर्मन से बात की जिनकी कहानी कोरोना से संक्रमित होने और उस पर जीत के बाद एक नए जज्बे के साथ वापस काम पर लौटने की है। पढ़ें क्या बताया डॉक्टर मालविका ने।
मार्च में जब कोविड को लेकर चीन के कुछ वीडियो सामने आए थे तब मुझे डर लगा था। मुझे पूरा अनुमान था कि ये असम तक भी जरूर पहुंचेगा और जब असम में पहला मरीज मिला तो बतौर डॉक्टर मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी कि हमें इससे हर हाल में निबटना है। मैं गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल के जैव रसायन विभाग की लेबोरेटरी में काम करती हूं। कोरोनो संक्रमित मरीजों का संक्रमित खून बायो केमिकल एनालिसिस के लिए हमारे लेबोरेटरी में आता है।
इस बीच रोटेशन के तहत मेरी ड्यूटी गुवाहाटी के महेंद्र मोहन चौधरी अस्पताल में लगी थी जो पूरी तरह कोविड अस्पताल है। यह जून के महीने की बात है। अब चूक कहां हुई ये तो पता नहीं, लेकिन मैं उसी दौरान संक्रमित हुई। मैं सिंगल मदर हूं और मेरी 10 साल की एक बेटी है। मेरे 83 वर्षीय पिता और 70 साल की मां दोनों डायबिटीज और उच्च रक्तचाप से ग्रस्त है। दोनों मेरे साथ रहते हैं।
माता-पिता और बेटी को हाई रिस्क होने के कारण मैंने खुद को चार महीने सेल्फ आइसोलेशन में रखा। मार्च से ही जब भी मैं अस्पताल से घर लौटती थी तो मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि मैं शायद कोविड पॉजिटिव हो गई हूं। इसलिए घर पर मेरी बेटी और माता-पिता अलग फ्लोर पर रहते थे और मैं अलग। हम ज्यादातर वीडियो कॉलिंग पर ही बातें करते थे, लेकिन 27 जून की रात हमें अस्पताल से पता चला कि हम सभी कोविड पॉजिटिव हो गए हैं तो कुछ देर के लिए चिंतित जरूर हुई, लेकिन मेरे साथ अस्पताल में काम करने वाले चिकित्सकों और बाकी साथियों ने काफी साथ दिया। सबसे राहत की बात तो ये थी कि मेरे वृद्ध माता-पिता के शरीर में वायरल लोड कम था।
मैं अस्पताल में काम कर रही थी तो मुझे हमेशा यह लगता था कि कभी न कभी कोविड तो होगा ही इसलिए मैंने खुद को आइसोलेशन में रखा था, लेकिन परिवार के बाकी सदस्यों को ये कैसे हुआ तो इस पर मुझे ये लगता है कि सबसे पहले हमारे घर का जो मुख्य हेल्पर है वह बीमार पड़ा। ये हेल्पर ही मुझे हर जरूरत के सामान लाकर देता था और बाकी के सदस्यों को भी घर के काम में मदद करता था। शायद यहीं चूक हुई होगी।
जब वह कोविड पॉजिटिव पाया गया तो हम सभी ने जांच करवाई और हमारा भी रिजल्ट पॉजिटिव आया। मैं अस्पताल में भर्ती हुई और वहां पहले से इलाज करा रहे स्वास्थ्यकर्मियों और अन्य विभाग के लोगों को देखा जो ड्यूटी के दौरान संक्रमित हुए थे तो मेरे अंदर बहुत शक्ति आ गई। मैंने ठान लिया कि मुझे जल्द ठीक होकर काम पर लौटना है, क्योंकि मानव सेवा करने का इससे बड़ा मौका जीवन में फिर नहीं आ सकता। ठीक होने के अगले दिन ही मैंने ड्यूटी ज्वाइन कर ली।
'कोरोना से डरें नहीं, जीतना मुश्किल नहीं'
कोलकाता से बीबीसी के सहयोगी प्रभाकर मणि तिवारी ने कोरोना मुक्त होने वाले सरकारी अस्पताल के डॉक्टर समीरन डे से बात की। डॉक्टर समीरन बताते हैं कि उन्होंने कोरोना को कैसे हराया और साथ ही वो इससे जूझ रहे लोगों को सलाह भी देते हैं।
मेरा नाम समीरन डे है। मैं कोरोना से जीत कर दोबारा अपने काम पर लौट चुका हूं। कोरोना होने और इसके खिलाफ जीत की कहानी लंबी तो है, लेकिन कोरोना को हराना मुश्किल नहीं है। यह बीमारी हमेशा जानलेवा नहीं होती। हम कुछ एहतियात और सावधानियों के साथ इस पर जीत हासिल कर सकते हैं।
बीती 27 मई को ड्यूटी खत्म करने के बाद मुझे महसूस हुआ कि अचानक स्वाद की अनुभूति खत्म हो गई है। बार-बार छींक आ रही थी, लेकिन बुखार नहीं था। एक जून को मुझे अस्वस्थता महसूस हुई और साथ ही हल्का बुखार (99 डिग्री फॉरेनहाइट) भी था। अगले दिन यानी दो जून को मुझे कमजोरी महसूस होने लगी और बुखार 100 से 101 डिग्री तक पहुंच गया। उसके बाद मैं मेटियाबुर्ज स्थित अपने अस्पताल में ही भर्ती हो गया। मुझे पैरासिटामोल टेबलेट के साथ ही विटामिन सी के कैप्सूल और एजिथ्रोमाइसिन 500 टेबलेट दिए गए, लेकिन हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन नहीं दी गई।
उसी दिन मेरा नमूना लेकर जांच के लिए एसएसकेएम मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजा गया। चार जून तक बुखार कम हो गया था, लेकिन कमजोरी जस की तस थी। उधर एसएसकेएम से आरटीपीसीआर (RTPCR) रिपोर्ट मिलने में देरी हो रही थी। इस वजह से अस्पताल के अधिकारियों ने दक्षिण कोलकाता के बांगुर जिला अस्पताल में दोबारा जांच के लिए मेरा नमूना भेजा। चार जून को ही वहां ट्रूनेट (Truenat) और आरटीपीसीआर (RTPCR) के लिए मेरा नमूना भेज दिया गया। उस दिन मेरे ट्रूनेट (Truenat) टेस्ट की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। उसके बाद मुझे अपने अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।
छह जून को एसएसकेएम अस्पताल से आरटीपीसीआर (RTPCR) की रिपोर्ट नेगेटिव आई थी और अगले दिन यानी सात जून को बांगुर जिला अस्पताल से भी यह रिपोर्ट नेगेटिव ही आई। उसके बाद मुझे सात दिनों तक होम आइसोलेशन में रहने की सलाह देकर अस्पताल से छोड़ दिया गया। आठ जून को मैं पूरी तरह सामान्य था। न तो बुखार था और न ही कमजोरी। मैं लोगों को यही सलाह दूंगा कि संक्रमित होने की स्थिति में डरें नहीं। कोरोना हमेशा जानलेवा नहीं होता। संक्रमण के बाद ठीक होने तक मसालेदार भोजन की जगह ऊर्जा से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन किया। इससे मुझे कमजोरी पर शीघ्र काबू पाने में सहायता मिली।
मेरी सलाह है कि आइसोलेशन में रहने के दौरान गाने सुनें, फिल्में देखें और किताबें पढ़ें। इससे तनाव पर काबू पाने में सहायता मिलेगी। मेरी वजह से तनाव के कारण मेरे माता-पिता को भी काफी मुश्किलें उठानी पड़ी। मां को बुखार और डायरिया हो गया और पिता को भी बुखार हो गया था, लेकिन वह लोग मेरी बताई दवाओं के सेवन से ही ठीक हो गए थे। मैं पहले जैसी ऊर्जा के साथ ही दोबारा काम पर लौट आया हूं। हम जिन हालात में काम कर रहे हैं, उनमें तमाम सावधानियों के बावजूद कभी भी किसी को संक्रमण हो सकता है, लेकिन इससे हारने और डरने की बजाय आत्मविश्वास बनाए रखें।तमाम एहतियाती उपायों का पालन करते रहें। आखिर में जीत तय है।
'डर बना रहता, कहीं दोबारा कोरोना संक्रमित न हो जाऊं'
राजस्थान में बीबीसी के सहयोगी मोहर सिंह मीणा ने जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में डॉक्टर नवलीन खुराना से बात की जो खुद कोरोना से संक्रमित हुईं। अस्पताल में भर्ती हुईं, फिर होम क्वारंटीन किया और वापस मरीजों के इलाज में जुट गई हैं। कोरोना के मरीजों के इलाज से लेकर खुद रोगी बनने और फिर मरीजों के पास वापसी की कहानी खुद डॉक्टर नवलीन खुराना की जुबानी।
जब कोरोना स्टार्ट हुआ था, तब तो केस कम थे। उस दौरान मैं ऑपरेशन थिएटर (ओटी) में पोस्टेड थी। यह नया-नया स्टार्ट हुआ था, तो किसी को भी पीपीई किट्स और एन-95 की अवेयरनेस नहीं थी और न ही यह आसानी से उपलब्ध थे। अप्रैल में मेरी ड्यूटी इमरजेंसी ऑपरेशन थिएटर में थी। तब शायद एक अनजान मरीज का इलाज करते हुए ही मैं कोरोना वायरस से संक्रमित हुई और मेरी कोविड-19 रिपोर्ट पॉजिटिव आई। रिपोर्ट आने के बाद 4 दिन मुझे आइसोलेशन वार्ड में रखा गया, मेरी अगली रिपोर्ट नेगेटिव आई तो मुझे डिस्चार्ज कर दिया गया।
डिस्चार्ज होने के बाद मैं 14 दिन के लिए होम क्वारंटीन में रही और फिर से सैंपल लिया गया। इस बार भी रिपोर्ट नेगेटिव आई, जिसके बाद फिर मैं मरीजों का इलाज करने के लिए ड्यूटी पर लौट आई। इमरजेंसी ओटी में आने वाले पेशेंट पॉजिटिव हैं या नेगेटिव, यह मालूम नहीं होता। इसलिए पूरी सावधानी बरतते हुए अब मरीजों का इलाज कर रहे हैं। पहले तो पीपीई किट और एन-95 मास्क भी जल्दी नहीं मिल रहे थे, लेकिन अब सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
अभी मेरी ड्यूटी सवाई मानसिंह अस्पताल (एसएमएस) के रुटीन और इमरजेंसी ओटी में है और एसएमएस को कोरोना फ्री कर दिया गया है। सभी कोरोना पेशेंट का इलाज आरयूएचएस में चल रहा है। आरयूएचएस अस्पताल के कोविड वार्ड में जो मेरे सीनियर्स डॉक्टर ड्यूटी कर रहे हैं, उनके लिए बहुत ज्यादा हेक्टिक है। वह सात दिन ड्यूटी करते हैं और फिर सात दिनों के लिए क्वारंटीन में रहते हैं।
अपने अस्पताल से कोरोना पॉजिटिव होने वाली मैं दूसरी डॉक्टर थी। मेरी कोविड-19 रिपोर्ट पॉजिटिव आई तो पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया। फिर धीरे-धीरे स्थितियां सही होती गईं। रिस्क अब भी बहुत है, क्योंकि फिर से इंफेक्शन के चांस रहते हैं। इसलिए यह डर बना रहता है कि कहीं कोरोना वापस न हो जाए। घर वालों से भी डिस्टेंस मेंटेन करती हूं।