लाखों लोग दुनिया भर में हीट स्ट्रेस से पैदा होने वाली परेशानियों का सामना करते हैं। हीट स्ट्रेस लगने से शरीर के कई अंग काम करना बंद कर सकते हैं और जान को खतरा भी हो सकता है। विकासशील देशों में काम करने वाले कई लोगों को इन हालातों का सामना करना पड़ता है। अक्सर खेतों में काम करने वाले मजदूर, इमारतों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और अस्पताल के कर्मी भी इन हालात का सामना करते हैं।
Coronavirus: क्या होता है 'हीट स्ट्रेस', कोरोना में खूब हो रही जिसकी चर्चा
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जानबूझकर एयर कंडीशनर का इस्तेमाल अस्पतालों में नहीं किया जा रहा है ताकि कोरोना वायरस को हवा में फैलने से रोका जा सके। उन्होंने यह नोटिस किया कि 'वो और उनके दूसरे सहकर्मी एक दूसरे पर ज्यादा चिड़चिड़े हो रहे हैं और जल्दी ही गुस्सा हो रहे हैं।'
संक्रमण को रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रोटेक्टिव इक्वीपमेंट की वजह से हालत और खराब हैं। प्लास्टिक की कई परतें भीषण गर्मी में और हालत बिगाड़ रही हैं। डॉक्टर जिमी ली कहते हैं, 'वाकई में जब आप इसे पहनते हैं तभी ये परेशान करने लगता है और आठ घंटे की पूरी शिफ्ट में तो यह वाकई में काफी असहज कर देता है।'
वो मानते हैं कि ज्यादा गर्मी आपके काम करने की क्षमता को धीमा कर देती है जो कि किसी मेडिकल स्टाफ के लिए काफी अहम है। उसे फौरन कोई फैसला लेना होता है। वो हीट स्ट्रेस के लक्षणों को जैसे जी मचलाना और चक्कर आने को अनदेखा कर अपने काम में लगे रहते हैं जब तक कि वो बेहोश होकर गिर ना जाए।
क्या है हीट स्ट्रेस?
यह तब होता है जब शरीर पर्याप्त तौर पर खुद को ठंडा नहीं रख पाता है और उसका तापमान खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है। ऐसे हालत में शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं। यह तब होता है जब पसीने के वाष्पीकरण की प्रक्रिया हवा के बहुत नम होने की वजह से बंद हो जाती है और अत्यधिक गर्मी से निजात नहीं मिल रही होती है।
डॉ ली और दूसरे मेडिकल स्टाफ का मानना है कि पीपीई कीट को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि इसमें पसीने के वाष्पीकरण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम में फिजियोलॉजी की शोधकर्ता डॉक्टर रेबेका लुकास कहती हैं कि हीट स्ट्रेस की वजह से बेहोशी और मांसपेशियों में ऐंठन के साथ-साथ किडनी और आंत के फेल होने का भी खतरा होता है।
हम कैसे इसका पता लगा सकते हैं?
वेट बल्ब ग्लोब टम्परेचर (डब्लूबीजीटी) एक ऐसा सिस्टम है जिससे हमें ना सिर्फ गर्मी का अंदाजा लगता है बल्कि यह आद्रता और दूसरे तथ्यों के सहारे हमें वातावरण की वास्तविक स्थिति के बारे में बताता है। 1950 के दशक में अमेरिकी फौज इसका इस्तेमाल अपने सैनिकों को सुरक्षित रखने में करती थी।
उदाहरण के लिए जब डब्लूबीजीटी 29 डिग्री सेल्सियस पर पहुंचे तो किसी को भी यह सलाह दी जाती है कि वो व्यायाम रोक दे, लेकिन डॉ ली और उनके साथी लगातार सिंगापुर के एनजी टेंग फोंग अस्पताल में इस तापमान पर काम कर रहे हैं। डब्लूबीजीटी के स्केल पर जब 32 डिग्री सेल्सियस पहुंच जाए तो सलाह दी जाती है कि कठोर शारीरिक गतिविधियां रोक देनी चाहिए, क्योंकि उस वक्त खतरा अपने 'चरम' पर पहुंच गया होता है। लेकिन हाल ही में श्री रामाचंद्रा यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर विद्या वेणुगोपाल ने डब्लूबीजीटी पर यह स्तर चेन्नई के अस्पतालों में दर्ज किया है।
इसके अलावा उन्होंने साल्ट पैन की फैक्ट्री में डब्लूबीजीटी पर 33 डिग्री तापमान पाया तो वहीं स्टील फैक्ट्री में 41.7 डिग्री सेल्सियस पाया। वो कहती हैं, 'अगर यह हालत हर रोज रहती है तो फिर लोगों को डिहाइड्रेशन, दिल की बीमारी, किडनी में पत्थर और गर्मी लगने जैसी समस्याएं पैदा होंगी।'
जलवायु परिवर्तन का क्या असर पड़ेगा?
जैसे-जैसे दुनिया का तापमान बढ़ेगा वैसे-वैसे अधिक आद्रता बढ़ेगी। इसका असर यह होगा कि लोगों को गर्मी और आद्रता से मिलने वाले नुकसानदेह परिणाम भुगतने होंगे। ब्रिटेन के मेट ऑफिस के प्रोफेसर रिचर्ड बेट्स कम्पयुटर मॉडल पर काम करते हैं। वो कहते हैं कि डब्लूबीजीटी पर 32 डिग्री सेल्सियस वाले दिनों की संख्या बढ़ने वाली है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की कटौती पर हालांकि यह बहुत हद तक निर्भर करेगा।
वो कहते हैं कि लाखों लोगों के लिए काम पर जाना जोखिम भरा होने वाला है। 'हम इंसान एक तापमान की एक विशेष सीमा के अंदर ही रहने के लिए बने हैं। इसलिए यह साफ है कि अगर हम ऐसे ही दुनिया का तापमान बढ़ाते रहे तो फिर दुनिया के कई गर्म हिस्से हमारे रहने के लिहाज से बहुत गर्म हो जाएंगे।' इस साल के शुरुआत में छपे अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि साल 2100 तक दुनिया में 1.2 अरब लोग हीट स्ट्रेस से प्रभावित हो सकते हैं। अभी से कम से कम चार गुना ज्यादा।