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फॉर्मूला लेखन से नारी मुक्ति नहीं हो सकती
अमर उजाला, बैठक
Updated Fri, 01 Dec 2017 11:43 AM IST
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मैत्रेयी पुष्पा और चित्रा मुदगल
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मशहूर साहित्यकार चित्रा मुदगल का मानना है कि साहित्य में स्त्री विमर्श के नाम पर जो लिखा जा रहा है, वह स्त्री विमर्श है ही नहीं। इसने तो स्त्री विमर्श को एक खांचे में सीमित कर दिया है। वहीं, मशहूर कहानीकार मैत्रेयी पुष्पा का मानना है कि बड़े-बड़े दावों के बावजूद सत्री को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाया है। जो बराबरी दिखती है, वह दिखावा भर है।
चित्रा एवं मैत्रेयी में यह ऐतिहासिक जुगलबंदी हपुई मंगलवार को अमर उजाला की चर्चित साहित्यिक पहल बैठक में। दोनों ने स्त्री-विमर्श, रचनाधर्मिता, विरोधाभास, साम्यता और लेखन पर चर्चा की। कई जाने-अनजाने पहलुओं पर भी बात हुई। अपने और दूसरों के लिखने के मायने भी समझाए। यह अमर उजाला बैठक की तीसरी जुगलबंदी थी।
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चित्रा एवं मैत्रेयी में यह ऐतिहासिक जुगलबंदी हपुई मंगलवार को अमर उजाला की चर्चित साहित्यिक पहल बैठक में। दोनों ने स्त्री-विमर्श, रचनाधर्मिता, विरोधाभास, साम्यता और लेखन पर चर्चा की। कई जाने-अनजाने पहलुओं पर भी बात हुई। अपने और दूसरों के लिखने के मायने भी समझाए। यह अमर उजाला बैठक की तीसरी जुगलबंदी थी।
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देह की मुक्ति सब कुछ नहींः चित्रा
चित्रा मुदगल ने साफ कहा कि स्त्री विमर्श के फॉर्मूला लेखन से कोई क्रांति संभव नहीं है। आधी आबादी आज समाज और व्यवस्था से आगे आई है, तो उसके पीछे पितृसत्ता का वह हिस्सा है, जिसने उसे आगे बढ़ने के अवसर और शक्ति दी है। दमन और दलन के आरोपों के बीच भी स्त्री मन ने अपसने मन की करने और सोचने की राह निकाली।
दरअसल, आज स्त्री विमर्श के नाम पर जैसी कंडीशनिंग हो रही है, वह तो पुरुष विमर्श की प्रतिकृति है। चित्रा ने कहा, "सर्जना एक दृष्टि के साथ चलती है, वह समाज सापेक्ष होती है। सामाजिक चेतना से बदलाव आता है।
दरअसल, आज स्त्री विमर्श के नाम पर जैसी कंडीशनिंग हो रही है, वह तो पुरुष विमर्श की प्रतिकृति है। चित्रा ने कहा, "सर्जना एक दृष्टि के साथ चलती है, वह समाज सापेक्ष होती है। सामाजिक चेतना से बदलाव आता है।
मैं तो लिखती रही, लोगों ने खांचे में डाल दियाः मैत्रेयी
मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि समाज में आज बी शिक्षा, सोच और धारणा में स्तरी समान या मित्रवत नहीं है। गांवों में ही नहीं बड़े शहरों में भी स्त्री की चुनौतियां कायम है। महानगरों में की महिलाओं को देश की स्त्रियों का प्रतिनिधि मानना सही नहीं है। मेरी कहानियां हकीकत और अनुभवों से निकलती हैं। मैं स्त्री विमर्श नहीं जानती, इस शब्द को तो बड़े साहित्यकारों ने गढ़ा है, जिसे मैंने मंजूर कर लिया।
उन्होंने कहा, लेखक अपने दायरे से छिटक कर लिखता है, तो मुझे नहीं लगता कि वह न्याय कर रहा है। मेरी कहानियों में मेरे सिमटे हुए अनुभव हैं। मेरी भी सीमाएं हैं, मेरा सामर्थ्य इतना नहीं है कि मैं ब्रह्मांड नाप सकूं। सारे देश की महिलाओं की नुमांइदगी का दावा मैं नहीं करती। मैं अपने परिवेश से पात्र और कहानियां चुनती हूं। परिवेश में संघर्षों-यातनाओं की दीक्षा लेकर आई हूं, उसे शब्द देना मेरा साहित्यिक-नैतिक दायित्व है। मैं दरअसल ग्रामीण महिलाओं की पत्रकार हूं, जो उनके दुख-दर्द को जुबान देती है।
उन्होंने कहा, लेखक अपने दायरे से छिटक कर लिखता है, तो मुझे नहीं लगता कि वह न्याय कर रहा है। मेरी कहानियों में मेरे सिमटे हुए अनुभव हैं। मेरी भी सीमाएं हैं, मेरा सामर्थ्य इतना नहीं है कि मैं ब्रह्मांड नाप सकूं। सारे देश की महिलाओं की नुमांइदगी का दावा मैं नहीं करती। मैं अपने परिवेश से पात्र और कहानियां चुनती हूं। परिवेश में संघर्षों-यातनाओं की दीक्षा लेकर आई हूं, उसे शब्द देना मेरा साहित्यिक-नैतिक दायित्व है। मैं दरअसल ग्रामीण महिलाओं की पत्रकार हूं, जो उनके दुख-दर्द को जुबान देती है।