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Jharkhand: केंद्र में मंत्री बनने के बाद पहली ही परीक्षा में चूके चौहान, फेल हो गया CM हिमंत का भी फॉर्मूला

Sat, 23 Nov 2024 02:24 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Sat, 23 Nov 2024 02:24 PM IST
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सार
केंद्र में कृषि मंत्री बनने के बाद मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था, जबकि उनके साथ सह प्रभारी के तौर पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को लगाया था। इन चुनावी नतीजों से साफ हो गया है कि केंद्र में जाने के बाद शिवराज चौहान अपने पहले ही टास्क में चूक गए है, जबकि हिमंत बिस्व सरमा का हार्डकोर हिंदुत्व कार्ड भी यहां काम नहीं कर सका है।   
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Jharkhand Result: After becoming minister Shivraj Singh Chauhan failed in test CM Himanta formula also failed
झारखंड चुनावी परिणाम का विश्लेषण - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

झारखंड में एक बार फिर हेमंत सोरेन की अगुवाई में इंडिया गठबंधन की सरकार बनती दिख रही है। रुझानों में भाजपा गठबंधन काफी पिछड़ती दिख रहा है। जबकि इंडिया गठबंधन बहुमत के आंकड़े को पार कर चुका है। अगर हेमंत सोरेन राज्य में दोबारा सरकार बनाने में कामयाब रहते हैं तो उनके लिए ये बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन भाजपा को अपनी रणनीति पर फिर विचार करना पड़ेगा। पार्टी ने चुनाव की जिम्मेदारी जिन दो अहम कंधों पर सौंपी थी। वे दोनों ही अपना करिश्मा नहीं दिखा सके है। 



केंद्र में कृषि मंत्री बनने के बाद मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था, जबकि उनके साथ सह प्रभारी के तौर पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को लगाया था। इन चुनावी नतीजों से साफ हो गया है कि केंद्र में जाने के बाद शिवराज चौहान अपने पहले ही टास्क में चूक गए है, जबकि हिमंता बिस्वा सरमा का हार्ड कोर हिंदुत्व कार्ड भी यहां काम नहीं कर सका है।   


भाजपा को इन चुनावों में स्थानीय नेताओं को दरकिनार करना महंगा पड़ा। पार्टी नेतृत्व ने शुरु से ही स्थानीय नेताओं को दरकिनार कर पूरी जिम्मेदारी इन दोनों नेताओं को सौंप दी थी। चुनावी कामकाज संभालने के बाद से ही दोनों नेताओं ने पार्टी के अंदर राजनीतिक हस्तक्षेप शुरू कर दिया था। इससे स्थानीय नेता नाराज थे। दोनों नेताओं ने पार्टी हाईकमान को विश्वास में लेते हुए अन्य पार्टियों के कई नेताओं को न केवल भाजपा शामिल करवाया बल्कि उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट भी दिलवाया। इन सारे फैसलों से स्थानीय और प्रदेश बीजेपी नेताओं दूर रखा गया। लेकिन अनुशासित पार्टी और चुनाव सिर पर रहने के कारण कहीं से कोई खास विरोध का स्वर नहीं गूंजा। 

झारखंड भाजपा के नेताओं का कहना है कि, विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही शिवराज सिंह चौहान और हिमंत बिस्वा शर्मा का झारखंड आने का सिलसिला शुरू हो गया था। अंतिम कुछ दिनों के दौरान तो हिमंता ने रांची में होटल में रुकने की जगह एक मकान ही अपना कैंप ऑफिस बना लिया था। टिकट वितरण, चुनाव प्रचार और अन्य चुनावी रणनीति तैयार करने में भी शिवराज चौहान और हिमंत बिस्वा शर्मा ही प्रभावी रहे। शुरु से भाजपा के नेता ये मानकर चल रहे थे कि हम सरकार में आ रहे है। लेकिन यह आत्मविश्वास पार्टी को भारी पड़ा।

टिकट से लेकर प्रचार तक में चली शिवराज-बिस्व सरमा की
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति बिलकुल अलग है। दोनों अपनी राजनीति के जरिए राज्यों में कमाल कर चुके हैं। शिवराज चौहान हिंदुत्व के साथ साथ सोशल इंजीनियरिंग के लिए जाने जाते है। जबकि हिमंता बिस्व शर्मा हार्ड कोर हिंदुत्व की राह पर चलते हैं। लेकिन इन दोनों नेताओं की खूबियों पर हेमंत सोरेन का आदिवासी, मुस्लिम और यादव का समीकरण भारी पड़ा। भाजपा ने यहां भी ' बंटेंगे तो कटेंगे ' का नारा दिया, लेकिन ध्रुवीकरण नहीं हुआ। यहां 'हिन्दू-मुस्लिम' से ज्यादा सोरेन का आदिवासी अस्मिता का दांव चला गया। बीजेपी ने बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया। लेकिन हेमंत सोरेन ने भाजपा पर काटो-बांटो की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए 'बेटी-माटी-रोटी' का नारा दिया, जो चुनाव में काम कर गया है।



इसलिए इन दोनों को सौंपी थी झारखंड जिम्मेदारी
इन दोनों दिग्गज नेताओं को झारखंड की जिम्मेदारी देकर बीजेपी ने यह मैसेज देने की कोशिश है थी कि अब पार्टी बदल रही है। पार्टी हिंदुत्व के कोर एजेंडे में सोशल इंजीनियरिंग का मिश्रण चाहती है। इन दोनों को साथ ही लेकर पार्टी चुनाव जीतना चाहती है। मध्य प्रदेश से लेकर हरियाणा तक में भाजपा का यह फार्मूला हिट रहा है। इसलिए झारखंड में भी इसे दोहराने की कोशिश की थी। 

झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा जमीनी मुद्दों के अलावा कोर हिंदुत्व की बात करते नजर आए। साथ ही बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे को हवा दे रहे हैं। यही नहीं, बंटेंगे तो कंटेंगे नारे पर भी हिमंता ने जोर दिया है। जबकि शिवराज सिंह चौहान अपनी रैलियों में हिंदुत्व की बात तो करते थे। लेकिन इन सबके बीच सोशल इंजीनियरिंग को भी आगे बढ़ाते थे। मध्य प्रदेश की तरह झारखंड में गोगो दीदी योजना की बात करते थे। जिसके तहत बहनों को हर महीने 2,000 रुपए की राशि दी जाएगी।

ऐसे रहे नतीजे
बता दें कि झारखंड में कुल विधानसभा की 81 सीटें हैं। इसमें करीब 51 सीटों में इंडिया गठबंधन को कामयाबी मिलती दिख रही है। जबकि एनडीए को फिलहाल 29 सीटों पर बढ़त है। झारखंड में सरकार बनाने के लिए 41 सीटों की जरूरत है।

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