{"_id":"6af032beef62430819079729","slug":"jharkhand-high-court-divorce-appeal-cancer-affected-child-cruelty-maintenance-increased-2026-11-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"झारखंड: कैंसर पीड़ित मासूम को छोड़ने वाली पत्नी की अपील खारिज, हालांकि बढ़ाया गुजारा भत्ता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
झारखंड: कैंसर पीड़ित मासूम को छोड़ने वाली पत्नी की अपील खारिज, हालांकि बढ़ाया गुजारा भत्ता
Sun, 08 Nov 2026 01:59 PM IST
प्रतीक कुमार पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: प्रतीक कुमार पाण्डेय
Updated Sun, 08 Nov 2026 01:59 PM IST
सार
झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में पत्नी की तलाक के आदेश के खिलाफ अपील खारिज कर दी है। अदालत ने माना कि कैंसर से पीड़ित सात महीने की बच्ची को छोड़कर मायके चले जाना और लंबे समय तक पति से अलग रहना क्रूरता और परित्याग की श्रेणी में आता है। हालांकि, अदालत ने महिला का मासिक गुजारा भत्ता 10 हजार से बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया।
विज्ञापन
झारखंड उच्च न्यायालय
- फोटो : ANI
विस्तार
झारखंड उच्च न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने गंभीर रूप से बीमार और कैंसर से पीड़ित सात महीने की मासूम बच्ची को छोड़कर मायके चली गई पत्नी की तलाक के आदेश के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी। उच्च न्यायालय ने माना कि गंभीर बीमारी से जूझ रही बच्ची की देखभाल न करना और लंबे समय तक पति से अलग रहना स्पष्ट रूप से क्रूरता और परित्याग की श्रेणी में आता है। हालांकि, अदालत ने महिला को राहत देते हुए उसके मासिक गुजारा भत्ते की राशि 10 हजार रुपये से बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दी है।
उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत के फैसले को रखा बरकरार
इस मामले की शुरुआत जमशेदपुर की पारिवारिक अदालत से हुई थी। दोनों पक्षों का विवाह 23 नवंबर, 2008 को हुआ था। वैवाहिक जीवन में विवाद होने और पत्नी के बिना कारण मायके चले जाने के बाद पति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। जमशेदपुर पारिवारिक अदालत ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद 24 नवंबर, 2021 को पति द्वारा दायर तलाक याचिका को स्वीकार कर लिया था। पारिवारिक अदालत ने विवाह विच्छेद का आदेश जारी किया था, जिसे पत्नी ने झारखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायाधीश मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई की। उच्च न्यायालय ने पाया कि पारिवारिक अदालत के निर्णय में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और तलाक के आदेश को कायम रखा।
मासूम की अनदेखी और परित्याग को अदालत ने माना क्रूरता
उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि दंपती की सात महीने की बेटी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रही थी। इस कठिन और नाजुक समय में बच्ची को अपनी मां की देखभाल की सबसे अधिक जरूरत थी, लेकिन पत्नी उसे छोड़कर अपने मायके चली गई। इसके साथ ही वह लंबे समय तक अपने पति से पूरी तरह अलग रही। खंडपीठ ने इन परिस्थितियों को बेहद गंभीर माना। अदालत ने कहा कि गंभीर बीमारी से पीड़ित मासूम शिशु को इस हालत में छोड़ देना और अपने वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन न करना क्रूरता की पराकाष्ठा है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बीमार बच्चे की उपेक्षा और जीवनसाथी का त्याग कानून की नजर में परित्याग और मानसिक क्रूरता माना जाएगा।
विज्ञापन
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के तहत बढ़ाया गुजारा भत्ता
तलाक के मामले में पत्नी की याचिका खारिज करने के साथ ही उच्च न्यायालय ने उसकी आर्थिक जरूरतों का भी ध्यान रखा। अदालत ने महिला के मासिक गुजारा भत्ते की राशि में बढ़ोतरी करने का आदेश दिया। पूर्व में निचली अदालत ने 10 हजार रुपये प्रतिमाह तय किए थे, जिसे उच्च न्यायालय ने बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायाधीश मनोज प्रसाद की पीठ ने दोनों पक्षों की तरफ से प्रस्तुत शपथ पत्रों का अध्ययन किया। अदालत ने इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय के राजनेश बनाम नेहा फैसले का भी संज्ञान लिया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भविष्य में परिस्थितियां बदलने पर दोनों में से कोई भी पक्ष सक्षम अदालत में आवेदन देकर गुजारा भत्ते की राशि में संशोधन करा सकता है।
विज्ञापन
उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत के फैसले को रखा बरकरार
इस मामले की शुरुआत जमशेदपुर की पारिवारिक अदालत से हुई थी। दोनों पक्षों का विवाह 23 नवंबर, 2008 को हुआ था। वैवाहिक जीवन में विवाद होने और पत्नी के बिना कारण मायके चले जाने के बाद पति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। जमशेदपुर पारिवारिक अदालत ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद 24 नवंबर, 2021 को पति द्वारा दायर तलाक याचिका को स्वीकार कर लिया था। पारिवारिक अदालत ने विवाह विच्छेद का आदेश जारी किया था, जिसे पत्नी ने झारखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायाधीश मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई की। उच्च न्यायालय ने पाया कि पारिवारिक अदालत के निर्णय में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और तलाक के आदेश को कायम रखा।
विज्ञापन
मासूम की अनदेखी और परित्याग को अदालत ने माना क्रूरता
उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि दंपती की सात महीने की बेटी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रही थी। इस कठिन और नाजुक समय में बच्ची को अपनी मां की देखभाल की सबसे अधिक जरूरत थी, लेकिन पत्नी उसे छोड़कर अपने मायके चली गई। इसके साथ ही वह लंबे समय तक अपने पति से पूरी तरह अलग रही। खंडपीठ ने इन परिस्थितियों को बेहद गंभीर माना। अदालत ने कहा कि गंभीर बीमारी से पीड़ित मासूम शिशु को इस हालत में छोड़ देना और अपने वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन न करना क्रूरता की पराकाष्ठा है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बीमार बच्चे की उपेक्षा और जीवनसाथी का त्याग कानून की नजर में परित्याग और मानसिक क्रूरता माना जाएगा।
विज्ञापन
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के तहत बढ़ाया गुजारा भत्ता
तलाक के मामले में पत्नी की याचिका खारिज करने के साथ ही उच्च न्यायालय ने उसकी आर्थिक जरूरतों का भी ध्यान रखा। अदालत ने महिला के मासिक गुजारा भत्ते की राशि में बढ़ोतरी करने का आदेश दिया। पूर्व में निचली अदालत ने 10 हजार रुपये प्रतिमाह तय किए थे, जिसे उच्च न्यायालय ने बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायाधीश मनोज प्रसाद की पीठ ने दोनों पक्षों की तरफ से प्रस्तुत शपथ पत्रों का अध्ययन किया। अदालत ने इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय के राजनेश बनाम नेहा फैसले का भी संज्ञान लिया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भविष्य में परिस्थितियां बदलने पर दोनों में से कोई भी पक्ष सक्षम अदालत में आवेदन देकर गुजारा भत्ते की राशि में संशोधन करा सकता है।