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वो गोरी मेम जो ब्रिटेन से आकर झारखंड की हो गई
नीरज सिन्हा, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
Updated Mon, 23 Jan 2017 05:03 PM IST
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चंदनक्यारी की गगलटांड़ बस्ती के घर में दरी पर कुछ महिलाएं गोल घेरा बनाए बैठी हैं, जिनमें अधिकतर दलित हैं। इन्हीं में एक हैं मिलन देवी। जिनके सामने टीन का बक्सा और गत्ते से मढ़ा रजिस्टर रखा है और वह नाम ले-लेकर पैसों का हिसाब मिला रही हैं कि किसने पैसे जमा किए और जिन्होंने कर्ज लिए, वे कब तक चुकाएंगी।
ये महिलाएं इसे बक्सा बैंक कहती हैं और उनकी बैठकें हफ़्ते में एक बार होती हैं। मिलन देवी, झारखंड में बोकारो से 25 किलोमीटर दूर बसे पिछड़े इलाके चंदनक्यारी में चलने वाले कोऑपरेटिव बैंक से जुड़ी हैं, जिसके नीचे करीब 8000 महिलाएं, 450 स्वयं सहायता समूह चलाती हैं। जन चेतना कोऑपरेटिव बैंक का काम कुछ पुरुषों के साथ गांव की महिलाएं ही देखती हैं।
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ये महिलाएं इसे बक्सा बैंक कहती हैं और उनकी बैठकें हफ़्ते में एक बार होती हैं। मिलन देवी, झारखंड में बोकारो से 25 किलोमीटर दूर बसे पिछड़े इलाके चंदनक्यारी में चलने वाले कोऑपरेटिव बैंक से जुड़ी हैं, जिसके नीचे करीब 8000 महिलाएं, 450 स्वयं सहायता समूह चलाती हैं। जन चेतना कोऑपरेटिव बैंक का काम कुछ पुरुषों के साथ गांव की महिलाएं ही देखती हैं।
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मिलन कहती हैं, "अब वो दिन नहीं रहे, जब पैसे की जरूरत के लिए महाजन के पास कांसे का कटोरा और मंगल सूत्र गिरवी रखना पड़ता था।" इन महिलाओं को संघर्षों से जूझना सिखाया एक ब्रितानी महिला लिंडसे बर्न्स ने, जिन्हें सभी मास्टरनी जी कहती हैं।
लिंडसे 1980 के दशक में धनबाद की कोलयरियों में मजदूरों पर शोध करने आई थीं और फिर यहीं की होकर रह गईं। लिंडसे के साथ जेएनयू में कोलकाता के रंजन घोष भी पढ़ते थे और वे भी उनके साथ यहां आए थे। बाद में चंदनक्यारी के विधायक रहे हारू रजवार के अनुरोध पर वे कॉलेज में पढ़ाने लगे और लोग उन्हें मास्टर कहने लगे।
लोगों के लिए लिंडसे मास्टरनी हो गईं। फिर रंजन घोष पूरी तरह लिंडसे की मुहिम से जुड़ गए। 30 साल से दोनों चंदनक्यारी के चमड़ाबाद बस्ती में मिट्टी के घर में रहते हैं। पश्चिम बंगाल की सीमा पर होने के कारण चंदनक्यारी में लोग बांग्ला ही बोलते हैं।
लिंडसे 1980 के दशक में धनबाद की कोलयरियों में मजदूरों पर शोध करने आई थीं और फिर यहीं की होकर रह गईं। लिंडसे के साथ जेएनयू में कोलकाता के रंजन घोष भी पढ़ते थे और वे भी उनके साथ यहां आए थे। बाद में चंदनक्यारी के विधायक रहे हारू रजवार के अनुरोध पर वे कॉलेज में पढ़ाने लगे और लोग उन्हें मास्टर कहने लगे।
लोगों के लिए लिंडसे मास्टरनी हो गईं। फिर रंजन घोष पूरी तरह लिंडसे की मुहिम से जुड़ गए। 30 साल से दोनों चंदनक्यारी के चमड़ाबाद बस्ती में मिट्टी के घर में रहते हैं। पश्चिम बंगाल की सीमा पर होने के कारण चंदनक्यारी में लोग बांग्ला ही बोलते हैं।
मिलन देवी बताती हैं कि पिछड़ा इलाका होने से यहां लोगों की जिंदगी मजदूरी पर टिकी थी। महाजनों (सूद पर पैसे देने वालों) की दंबगई थी। पैसे समय पर न देने पर वो बर्तन, शादी के हार तक गिरवी रखवा लेते थे। लिंडसे ने हालात देखे, तो महिलाओं को इकट्ठा कर उनके समूह बनाने शुरू किए ताकि वो पैसा बचाकर आत्मनिर्भर हो सकें।
स्वयं सहायता समूहों की सदस्य महिलाएं हफ़्ते में कम से कम 10 रुपए जमा करती हैं और चार प्रतिशत की ब्याज दर पर कर्ज ले सकती हैं। मिलन देवी का कहना है कि चाहे जितने विपरीत हालात हों,किसी सदस्य के घर का सामान और जेवर नहीं लिया जा सकता। इलाज के लिए ये बक्सा बैंक तुरंत पैसे देता है।
मिलन के समूह में 20 सदस्य हैं और अभी 46 हजार रुपए जमा हैं। नोटबंदी के सवाल पर वे कहती हैं- न बाबा न। हम तो पहले ही बड़े नोट जाली होने के डर से नहीं रखते थे। वैसे भी रकम ज्यादा होने पर पैसे सहकारी बैंक में रखवाती हैं।
स्वयं सहायता समूहों की सदस्य महिलाएं हफ़्ते में कम से कम 10 रुपए जमा करती हैं और चार प्रतिशत की ब्याज दर पर कर्ज ले सकती हैं। मिलन देवी का कहना है कि चाहे जितने विपरीत हालात हों,किसी सदस्य के घर का सामान और जेवर नहीं लिया जा सकता। इलाज के लिए ये बक्सा बैंक तुरंत पैसे देता है।
मिलन के समूह में 20 सदस्य हैं और अभी 46 हजार रुपए जमा हैं। नोटबंदी के सवाल पर वे कहती हैं- न बाबा न। हम तो पहले ही बड़े नोट जाली होने के डर से नहीं रखते थे। वैसे भी रकम ज्यादा होने पर पैसे सहकारी बैंक में रखवाती हैं।
लेनदेन में गड़बड़ी भी होती है? इस पर मीरा देवी हंसते हुए कहती हैं, "बक्सा तो मोर ठीन रहेला, चॉबी कल्याणी और खाता-पतर मिलन के पास। जब सामूहिक बैठकें होती हैं, तभी बक्सा खोला जाता है।" कोऑपरेटिव बैंक अध्यक्ष उथानी देवी के मुताबिक, "स्वयं सहायता समूहों के गठन से दलित और पिछड़े समुदायों की महिलाएं घूंघट और देहरी से बाहर निकली हैं।
यह क्या कम है कि हमारे बैंक का सालाना टर्नओवर लाखों में है।" चंदनक्यारी के डाबरबहाल गांव में हमने नजमा बीवी से बक्सा बैंक के बारे में पूछा, तो वे मुस्करा कर बोलीं, "साढ़े सात हजार रुपए हमारे खाते में भी हैं और हाल ही में हमने 1100 रुपए की मदद अपनी शादीशुदा बेटी नसीमुन ख़ातून की पढ़ाई के लिए दी है।"
यह क्या कम है कि हमारे बैंक का सालाना टर्नओवर लाखों में है।" चंदनक्यारी के डाबरबहाल गांव में हमने नजमा बीवी से बक्सा बैंक के बारे में पूछा, तो वे मुस्करा कर बोलीं, "साढ़े सात हजार रुपए हमारे खाते में भी हैं और हाल ही में हमने 1100 रुपए की मदद अपनी शादीशुदा बेटी नसीमुन ख़ातून की पढ़ाई के लिए दी है।"
ये महिलाएं अब शराबखोरी, घरेलू हिंसा और योजनाओं में गड़बड़ी के ख़िलाफ़ आवाज भी उठाती हैं। नजमा बताती हैं कि इन समूहों और बक्सा बैंक के अलावा मास्टरनी के अस्पताल ने महिलाओं को बड़ी राहत दी, वरना इलाके में दूर-दूर तक डॉक्टर और दवा मयस्सर नहीं थे।
रंजन घोष बताते हैं, "जब लिंड्से ने बेटे को जन्म दिया, तो हम लोगों को भी दिक्कतें हुईं। तब लिंडसे ने डेविड वॉर्नर की किताब 'व्हेयर, देयर इज नो डॉक्टर' खरीदी और उसे पढ़कर छोटे-मोटे मर्ज का इलाज करने लगीं। इस बीच हम जनचेतना मंच बनाकर गांव-गांव में महिलाओं को इकट्ठा कर रहे थे। जब ग्रामीण अपनी तकलीफ़ें लेकर रोज लिंड्से के पास आने लगे तो उन्होंने हेल्थ सेंटर खोलने की सोची, जिसमें वह सफल रहीं।"
रंजन घोष बताते हैं, "जब लिंड्से ने बेटे को जन्म दिया, तो हम लोगों को भी दिक्कतें हुईं। तब लिंडसे ने डेविड वॉर्नर की किताब 'व्हेयर, देयर इज नो डॉक्टर' खरीदी और उसे पढ़कर छोटे-मोटे मर्ज का इलाज करने लगीं। इस बीच हम जनचेतना मंच बनाकर गांव-गांव में महिलाओं को इकट्ठा कर रहे थे। जब ग्रामीण अपनी तकलीफ़ें लेकर रोज लिंड्से के पास आने लगे तो उन्होंने हेल्थ सेंटर खोलने की सोची, जिसमें वह सफल रहीं।"
हेल्थ सेंटर एक कमरे में खोला गया, जिसके पास आज अपनी इमारत और ऐंबुलेंस है और ग़रीबों, खासकर महिलाओं का इलाज मामूली पैसे पर होता है। कई बार तो ग़रीब मरीजों को कर्ज भी दिया जाता है। हम जब लिंड्से से मिलने पहुँचे, तो वह गर्भवती महिलाओं की सेहत के बारे में दरयाफ़्त कर रही थीं।
उन्हें दूरदराज गांवों की महिलाओं के नाम-पते बखूबी याद रहते हैं। वे हिंदी बोलती हैं और स्थानीय खोरठा भाषा सीखने की कोशिश में हैं। सालों तक मिट्टी के घर में रहना, गांव की धूल भरी गलियों में घूमना, ये जिंदगी कभी खटकती होगी? इस पर लिंडसे कहती हैं, "यहां रहने का फ़ैसला और यह काम हमने चुना है न।
किसी ने हम पर थोपा नहीं और न हमारा कोई अफ़सर-बॉस है। आज यह देखकर अच्छा लगता है कि महिलाएं महाजनों के आगे हाथ नहीं जोड़तीं। प्रसव सुरक्षित हो रहे हैं। जच्चा-बच्चा की जान नहीं जातीं। मगर हमें इंतजार है महिलाओं की बराबरी का। और वह संघर्ष जारी है।"
उन्हें दूरदराज गांवों की महिलाओं के नाम-पते बखूबी याद रहते हैं। वे हिंदी बोलती हैं और स्थानीय खोरठा भाषा सीखने की कोशिश में हैं। सालों तक मिट्टी के घर में रहना, गांव की धूल भरी गलियों में घूमना, ये जिंदगी कभी खटकती होगी? इस पर लिंडसे कहती हैं, "यहां रहने का फ़ैसला और यह काम हमने चुना है न।
किसी ने हम पर थोपा नहीं और न हमारा कोई अफ़सर-बॉस है। आज यह देखकर अच्छा लगता है कि महिलाएं महाजनों के आगे हाथ नहीं जोड़तीं। प्रसव सुरक्षित हो रहे हैं। जच्चा-बच्चा की जान नहीं जातीं। मगर हमें इंतजार है महिलाओं की बराबरी का। और वह संघर्ष जारी है।"