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53 घंटे बाद 'कब्र' से जिंदा निकले तीन जांबाज
इंटरनेट डेस्क
Updated Wed, 14 Aug 2013 04:31 PM IST
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झारखंड के निरसा में अवैध खनन में फंसे तीन मजदूरों को 53 घंटे बाद सोमवार को सही सलामत निकाल लिया गया। मजदूरों के मुताबिक भगवान के भजनों और 15 रोटियों ने उन्हें इस दौरान हिम्मत दी।
हर घंटे सदियों की तरह गुजरे। तीनों को पता नहीं था कि बाहर उन्हें बचाने की कोशिशें चल रही थीं। खदान से बाहर निकलने के बाद उन्होंने सभी लोगों से बात की।
ऐसे चला राहत कार्य
शनिवार और रविवार को राहत कार्य चलाने के बावजूद आशा के अनुरूप परिणाम नहीं मिलने पर कई ग्रामीण मायूस हो गए थे, परंतु आज सुबह करीब 6 बजे से फिर काफी संख्या में कोराडांगाल गांव के वाशिंदे युद्धस्तर पर बचाव कार्य में भिड़ गए थे। आठ मोटर पंपों के जरिए फिर खदान से पानी निकालना शुरू कर दिया गया था।
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लगातार पंपों के चलने के कारण खदान का जलस्तर करीब चार फीट तक कम हो गया। पानी कम होने के कारण ग्रामीण मुहाने के पास पहुंच जोर-जोर से आवाज लगाने लगे। उधर खदान में पानी कम होने और बाहर से आ रही धीमी आवाज की सुन फंसे तीनों मजदूरों की भी जान में जान आई।
इसके बाद मजदूरों ने भी आवाज लगानी शुरू कर दी। उनकी आवाज सुन बचाव कार्य में लगे ग्रामीणों का भी हौसला बुलंद हुआ। इसके बाद बाहर से भी लोगों ने आवाज देनी शुरू कर दी कि हिम्मत मत हारो, तुम सभी बाहर निकाल लिए जाओगे। दोपहर एक बजे तीनों मजदूर मुहाने के पास तक पहुंचने में सफल रहे। उस समय वहां कमर तक पानी था। ग्रामीणों ने उन्हें देखा तो बांस को पानी के अंदर डाला। फिर बांस को पकड़ उन्हें बाहर खींच लिया गया।
एक बोरी कोयला काटने की मजदूरी 22 रुपए
मजदूरों ने बताया कि ठेकेदार उन्हें प्रति बोरा 22 रुपए की मजदूरी देता था। तीन में से दो मजदूर चार-पांच माह से कोयला काट रहे थे, जबकि तीसरा उस दिन पहली बार खदान में उतरा था।
निकले तीनों युवकों ने बताया कि शनिवार की सुबह से रिमझिम बारिश हो रही थी। बारिश के कारण अन्य मजदूर नहीं पहुंचे थे। अगर वे पहुंचते तो भी उनके साथ ही जलमग्न खदान में फंस जाते।
उन्हें ईश्वर पर था विश्वास
मौत को मात देकर निकले तीनों युवकों ने बताया कि उन्हें ईश्वर पर विश्वास था। वे जानते थे कि ईश्वर की कृपा से वे सकुशल बाहर निकल अपने घर लौट जाएंगे। उन्होंने बताया की शनिवार को भोजन के रूप में कुल पंद्रह रोटियां लेकर कोयला काटने खदान में उतरे थे।
ये रोटियां ही जीवित रहने का सहारा थीं। कब तक अंदर रहना पड़ता, नहीं जानता था। बचा-बचा कर रोटियां खाईं पानी नहीं पीया। जिस समय वे बाहर निकले, एक रोटी फिर भी बची रह गई थी।
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हर घंटे सदियों की तरह गुजरे। तीनों को पता नहीं था कि बाहर उन्हें बचाने की कोशिशें चल रही थीं। खदान से बाहर निकलने के बाद उन्होंने सभी लोगों से बात की।
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ऐसे चला राहत कार्य
शनिवार और रविवार को राहत कार्य चलाने के बावजूद आशा के अनुरूप परिणाम नहीं मिलने पर कई ग्रामीण मायूस हो गए थे, परंतु आज सुबह करीब 6 बजे से फिर काफी संख्या में कोराडांगाल गांव के वाशिंदे युद्धस्तर पर बचाव कार्य में भिड़ गए थे। आठ मोटर पंपों के जरिए फिर खदान से पानी निकालना शुरू कर दिया गया था।
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लगातार पंपों के चलने के कारण खदान का जलस्तर करीब चार फीट तक कम हो गया। पानी कम होने के कारण ग्रामीण मुहाने के पास पहुंच जोर-जोर से आवाज लगाने लगे। उधर खदान में पानी कम होने और बाहर से आ रही धीमी आवाज की सुन फंसे तीनों मजदूरों की भी जान में जान आई।
इसके बाद मजदूरों ने भी आवाज लगानी शुरू कर दी। उनकी आवाज सुन बचाव कार्य में लगे ग्रामीणों का भी हौसला बुलंद हुआ। इसके बाद बाहर से भी लोगों ने आवाज देनी शुरू कर दी कि हिम्मत मत हारो, तुम सभी बाहर निकाल लिए जाओगे। दोपहर एक बजे तीनों मजदूर मुहाने के पास तक पहुंचने में सफल रहे। उस समय वहां कमर तक पानी था। ग्रामीणों ने उन्हें देखा तो बांस को पानी के अंदर डाला। फिर बांस को पकड़ उन्हें बाहर खींच लिया गया।
एक बोरी कोयला काटने की मजदूरी 22 रुपए
मजदूरों ने बताया कि ठेकेदार उन्हें प्रति बोरा 22 रुपए की मजदूरी देता था। तीन में से दो मजदूर चार-पांच माह से कोयला काट रहे थे, जबकि तीसरा उस दिन पहली बार खदान में उतरा था।
निकले तीनों युवकों ने बताया कि शनिवार की सुबह से रिमझिम बारिश हो रही थी। बारिश के कारण अन्य मजदूर नहीं पहुंचे थे। अगर वे पहुंचते तो भी उनके साथ ही जलमग्न खदान में फंस जाते।
उन्हें ईश्वर पर था विश्वास
मौत को मात देकर निकले तीनों युवकों ने बताया कि उन्हें ईश्वर पर विश्वास था। वे जानते थे कि ईश्वर की कृपा से वे सकुशल बाहर निकल अपने घर लौट जाएंगे। उन्होंने बताया की शनिवार को भोजन के रूप में कुल पंद्रह रोटियां लेकर कोयला काटने खदान में उतरे थे।
ये रोटियां ही जीवित रहने का सहारा थीं। कब तक अंदर रहना पड़ता, नहीं जानता था। बचा-बचा कर रोटियां खाईं पानी नहीं पीया। जिस समय वे बाहर निकले, एक रोटी फिर भी बची रह गई थी।