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जन्माष्टमी 2017: मिलिए 'फॉरेन रिटर्न' कान्हा से
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Mon, 14 Aug 2017 12:37 PM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : फाइल फोटो
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जन्माष्टमी के पर्व में पूरे देश में कृष्ण मंदिरों में रौनक है। भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान हो रहा है। कई ऐसे अनोखे मंदिर हैं, जहां भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। ऐसा ही एक अनोखा मंदिर है, जहां के भगवान फॉरेन रिटर्न हैं। जिन्होंने लंदन टूर किया था, वो भी पानी के रास्ते।
जी हां, हम बात कर रहे हैं जयपुर में स्थित राधा गोपाल जी के मंदिर की। यह मंदिर जयपुर के प्रमुख आराध्य देव गोविंददेव के मंदिर परिसर में ही स्थित है। महाराजा माधोसिंह के साथ राधा गोपाल जी की प्रतिमाओं ने इंग्लैंड का टूर किया था। महाराजा सवाई माधोसिंह अपने ईष्ट देव राधा-गोपाल जी को भी लेकर गए थे।
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जी हां, हम बात कर रहे हैं जयपुर में स्थित राधा गोपाल जी के मंदिर की। यह मंदिर जयपुर के प्रमुख आराध्य देव गोविंददेव के मंदिर परिसर में ही स्थित है। महाराजा माधोसिंह के साथ राधा गोपाल जी की प्रतिमाओं ने इंग्लैंड का टूर किया था। महाराजा सवाई माधोसिंह अपने ईष्ट देव राधा-गोपाल जी को भी लेकर गए थे।
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गंगाजल ले जाना जरूरी
इस कलश में ले जाया गया था गंगाजल
- फोटो : फाइल फोटो
दरअसल गोविंददेव मंदिर परिसर में दो मंदिर आमने सामने बनाए गए हैं। गंगा माता का और दूसरा राधा गोपाल जी का। महाराजा माधोसिंह के इंग्लैंड में एडवर्ड सप्तम की ताजपोशी के लिए न्यौता मिला था। न्यौता आने के बाद सबसे बड़ी समस्या महाराजा के सामने यह थी कि वे अपने आराध्य राधा गोपाल के दर्शन और पूजा किस तरह से कर सकेंगे। यात्रा करीब पच्चीस दिन की होनी थी।
ऐसे में समाधान निकाला गया कि राधा गोपाल की प्रतिमाओं को भी साथ ही ले जाया जाए। इसके लिए एक नया समुद्री जहाज किराए पर लिया गया। इस जहाज का नाम ओलंपिया था। ओलंपिया में भगवान को चढ़ाने से पहले पूरे जहाज को गंगाजल से घोया गया। भगवान की पूजा अर्चना में गंगाजल के इस्तेमाल के चलते दो बड़े कलशों में गंगाजल भर कर ले जाया गया। अपनी यात्रा के दौरान महाराजा ने अपने धर्म-नियम का निर्वाह पूरी तरह किया।
ऐसे में समाधान निकाला गया कि राधा गोपाल की प्रतिमाओं को भी साथ ही ले जाया जाए। इसके लिए एक नया समुद्री जहाज किराए पर लिया गया। इस जहाज का नाम ओलंपिया था। ओलंपिया में भगवान को चढ़ाने से पहले पूरे जहाज को गंगाजल से घोया गया। भगवान की पूजा अर्चना में गंगाजल के इस्तेमाल के चलते दो बड़े कलशों में गंगाजल भर कर ले जाया गया। अपनी यात्रा के दौरान महाराजा ने अपने धर्म-नियम का निर्वाह पूरी तरह किया।