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रोजगार के सवाल पर युवा हल्ला बोल आंदोलन ने तेज की मुहिम, नए कानून को बताया खतरनाक

Mon, 05 Oct 2020 07:33 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 05 Oct 2020 07:33 PM IST
सार

  • स्थाई नौकरियां खत्म कर अनुबंध आधारित नौकरी देने के कानून को किया पुरजोर विरोध
  • नए कानून के प्रावधानों के जरिये युवाओं को नियंत्रित करने की कोशिश
  • हर वक्त नौकरी जाने के डर और भविष्य की असुरक्षा से युवा जोश खत्म करने का खेल  

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Youth Halla Bol movement against new contract jobs system
jobs - फोटो : Amar Ujala (For Refernce Only)

विस्तार

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे ‘मैं भी चौकीदार’ की तर्ज पर दो साल पहले शुरू किए गए अभियान ‘मैं भी बेरोजगार’ और बाद में करीब 50 युवा संगठनों की पहल पर शुरू हुआ युवा हल्लाबोल आंदोलन एक बार फिर जोर पकड़ने लगा है। इसके संयोजक अनुपम ने मौजूदा स्थिति को बेहद खतरनाक बताते हुए सवाल किया है कि क्या अब स्थायी नौकरियां खत्म हो रही हैं, क्या अब केवल अनुबंध आधारित रोजगार का समय शुरू हो गया है और क्या नौकरीपेशा लोगों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है।

29 सितंबर को अधिसूचित औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के अस्तित्व में आने के बाद लगातार ऐसे सवाल उठ रहे हैं। इसके जरिए केंद्र सरकार ने औद्योगिक संबंध कानून के उस सुरक्षा प्रावधान को खत्म कर दिया है, जिसके बाद नौकरी देने वालों को ये अधिकार मिल जाता है कि वे स्थायी रोजगार को एक तय अवधि के रोजगार में बदल सकते हैं।

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देश में युवा हल्लाबोल आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अनुपम बताते हैं, केंद्र और भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारें अनुबंध आधारित नौकरियों की संख्या बढ़ाकर समाज पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रही हैं। जब देश का युवा नौकरी के लिए सड़कों पर धक्के खा रहा है उस वक्त सरकार उन्हें पक्की नौकरी से दूर करती जा रही है। उत्तर प्रदेश सरकार पहले ही कह चुकी है कि अब पांच साल के अनुबंध पर नौकरी मिलेगी। केंद्र सरकार को जब मनरेगा की तरह शहरी रोजगार कानून लागू कर बेरोजगारों की संख्या घटाने की कोशिश करनी चाहिए, उस वक्त अनुबंध नौकरियों के ही कुछ सीमित विकल्प दिए जा रहे हैं।
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अनुपम के मुताबिक, एसएससी के घोटाले किसी से छिपे नहीं हैं। नौकरी के लिए सभी तरह की औपचारिकताएं पूरी कर चुके आवेदकों को तीसरे साल में भी ज्वाइनिंग नहीं मिल पा रही है। सरकार की नीति गलत है। केंद्र सरकार, अनुबंध आधारित नौकरी की अवधारणा लागू करने पर क्यों अड़ी है। यूपी सरकार द्वारा पांच साल के अनुबंध पर नौकरी देने की दिशा में कदम आगे बढ़ाया जा रहा है। धीरे धीरे दूसरे प्रदेशों की सरकारें भी इसी नीति पर चलेंगी। सरकार का ये कदम दर्शाता है कि नौकरी सुरक्षा कानून कमजोर करने के लिए सिलसिलेवार तरीके से काम किया जा रहा है। सुरक्षित रोजगार संकट में जा चुका है।

उनका कहना है कि आज देश में नौकरी का जो संकट खड़ा हुआ है, वह किसी नीति, जीडीपी या अर्थव्यवस्था आदि के कारण नहीं है, बल्कि उसके लिए केंद्र सरकार के गलत फैसले जिम्मेदार हैं। सरकार जिस नीति पर चल रही है, उसमें सुरक्षित रोजगार के सारे रास्ते खत्म किए जा रहे हैं।

भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा और कर्मचारियों को प्रताड़ना

अनुबंध आधारित नौकरी प्रणाली में भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं होगा। कर्मचारी को खुद भी प्रताड़ित होना पड़ेगा। अनुपम बताते हैं कि उसकी आंखों के सामने भ्रष्टाचार होगा, मगर वह चाह कर भी नहीं बोल सकेगा। वजह, उसे पता रहेगा कि आने वाले फलां महीने की उस तारीख को अनुबंध का नवीकरण होना है। हर वक्त उसकी गर्दन पर तलवार लटकी रहेगी। उसे सोशल मीडिया से दूर कर दिया जाएगा। सरकार को चाहिए कि युवाओं को नियंत्रित करने की बजाए उन्हें पक्की नौकरी दी जाए।

सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि लोगों को नियमित रोजगार मिलना चाहिए। इतना ही नहीं, सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा था कि बराबर काम के लिए बराबर वेतन दिया जाए। देश का युवा तभी आगे बढ़ सकेगा, जब उसे सुरक्षित नौकरी की गारंटी मिलेगी।

अब स्थायी नौकरियों पर संकट आ गया है

पहले सरकारों को अनुबंध आधारित नौकरी को नियत अवधि के रोजगार में बदलने की इजाजत नहीं थी। सरकार ने अब नए श्रम कानूनों के अंतर्गत यह कदम उठाया है। 29 सितंबर को अधिसूचित औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में यह प्रावधान किया गया है कि अब सभी कंपनियां खुद निश्चित समय के लिए अनुबंध आधार पर कर्मचारी रख सकेंगी। पहले इन्हीं कंपनियों को अनुबंध पर कर्मचारी रखने के लिए ठेकेदार के पास जाना पड़ता था।

अधिसूचना में यह भी कहा गया है कि अनुबंध वाले कर्मियों को वे सभी सुविधाएं दी जाएंगी, जो स्थायी कर्मचारियों को मिलती हैं। ये अलग बात है कि अनुबंध पर काम करने वाले कर्मियों को उनकी सेवा समाप्त किए जाने पर उन्हें स्थायी कर्मियों की तर्ज पर मिलने वाले कई लाभ व मुआवजा आदि नहीं मिलेंगे। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के 2019-19 के सर्वेक्षण के अनुसार भारत में कुल कार्यबल में केवल 4.2 फीसदी को अधिकतम सुरक्षा मिली हुई है। मंत्रालय के एक अधिकारी बताते हैं कि मौजूदा हालात में दुनिया के बदलावों को देखकर सरकार ऐसे कदम उठा रही है। इसमें किसी को नुकसान नहीं है। सरकार ने कर्मियों के हितों का ध्यान रखा है।

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