कानों देखी: योगी बाबा से पंगा न लेना, बाबा को दबाव में काम करना मंजूर नहीं
योगी के मिलते ही दिनेश खटीक के पूरे सुर ही बदल गए। अब भला कौन बताए? योगी जी के लिए यह कोई पहली बार तो है नहीं। उन्हें पिछले कार्यकाल के भी ओमप्रकाश राजभर समेत कई कड़वे अनुभव हैं।
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कुछ भी हो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने इस्तकबाल से कोई समझौता नहीं करते। कोई चाहे तो मंत्री दिनेश खटीक, बृजेश पाठक, जितिन प्रसाद से पूछ ले। ताजा मामला दिनेश खटीक का ही ले लीजिए। उनके मंत्रालय के कबीना मंत्री स्वतंत्र देव सिंह हैं। स्वतंत्र देव को भी पता नहीं कि खटीक जी नाराज चल रहे हैं और उन्होंने गृहमंत्री अमित शाह को चिट्ठी तक लिख दी। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के पास इस्तीफा भेज दिया। रातों-रात लखनऊ के राजनीतिक गलियारे में मंत्रियों के बीच में जातिगत चर्चाओं ने भी जोर पकड़ लिया। बात यहीं नहीं रुकी। बताते हैं केशव प्रसाद मोर्य का गुट भी मन ही मन खुश लेने लगा, लेकिन देर शाम होते-होते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऑपरेशन डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया। इसका नतीजा भी निकला। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिनेश खटीक को सबकुछ समझा दिया। योगी ने स्वतंत्र देव सिंह से बात की। कुछ अधिकारियों से भी बात की और दिनेश खटीक से भी मिले। योगी के मिलते ही दिनेश खटीक के पूरे सुर ही बदल गए। अब भला कौन बताए? योगी जी के लिए यह कोई पहली बार तो है नहीं। उन्हें पिछले कार्यकाल के भी ओमप्रकाश राजभर समेत कई कड़वे अनुभव हैं।
उद्धव अंतिम लड़ाई के लिए तैयार, पार्टी संविधान पर भरोसा
उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और हरीश साल्वे अपना अपना पक्ष रखने में जुटे हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को अपने ऊपर हाथ रखने वाले केंद्रीय नेताओं के साथ-साथ हरीश साल्वे पर काफी भरोसा है। इसके सामानांतर उद्धव ठाकरे शिवसेना के संविधान को ब्रह्मा मानकर चल रहे हैं। यह संविधान ही उन्हें आजीवन पार्टी का अध्यक्ष बनाता है। उद्धव की दूसरी ताकत महाराष्ट्र के कई क्षेत्रों में शिवसेना के वफादार नेता हैं। इसलिए उद्धव ठाकरे ने लगातार शिवसेना और बाला साहब के प्रति वफादारी को ही मुख्य मुद्दा बना रखा है। दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे की दुश्वारियां भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इसमें सबसे बड़ी परेशानी मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर है। बताते हैं मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए साथ देने वाले तमाम नेताओं की महत्वाकांक्षा हिलोरें ले रही हैं। उद्धव ठाकरे को यहां से भी काफी उम्मीदे हैं। शिवसेना के रणनीतिकारों को लग रहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार के बाद काफी कुछ उन्हें अच्छा सुनने को मिलेगा।
क्या नीतीश कुमार अपना अच्छा भला नहीं तय कर पा रहे हैं?
भाजपा और जद(यू) में सब कुछ ठीक नहीं है। जद (यू) के प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के नेता आरसीपी सिंह, बिहार के विधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा और बिहार भाजपा के अध्यक्ष रवीन्द्र जायसवाल के बीच भी अंदरखाने में बहुत कुछ चल रहा है। नीतीश कुमार अपना तेवर तो दिखाते हैं, लेकिन घूम फिरकर एनडीए के पाले में आ जाते हैं। दूसरी तरफ भतीजे तेजस्वी यादव हैं। तेजस्वी इन दिनों कुछ ज्यादा ही मुस्करा रहे हैं। मुस्कराएं भी क्यों न। प्रधानमंत्री से सीधे बात हुई तो नीतीश कुमार से भी स्पेस मिल रहा है। लेकिन तेजस्वी इसके आगे नहीं बढ़ते। यह भी नीतीश के लिए दुविधा जैसी स्थिति है। कुछ भाजपाई तो तंज कसते हैं कि नीतीश बाबू को भी अब बिहार के एकनाथ शिंदे का डर सता रहा है। बताते हैं कि नीतीश ही नहीं संभलकर चल रहे हैं, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी अब छाछ फूं- फूंक कर पी रहे हैं।
क्या मध्यप्रदेश में सब ठीक चल रहा है?
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की निगाह ऐसी हर आहट को ढूंढ रही है जो उन्हें दिल्ली की अंदरुनी खबर दे दे। शिवराज को पता है कि पिछले कुछ समय से उनके विरोधी खासे सक्रिय हैं। एक तबका भाजपा में उत्तराखंड की तरह सत्ता वापसी के लिए नए मुख्यमंत्री की आस लगाए भी बैठा है। हालांकि दिल्ली में बैठे मध्यप्रदेश.के कुछ नेता बड़े अनुशासन के साथ अपने कामकाज में लगे हैं। इनमें कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, ज्योतिरादित्य सिंधिया भी हैं। महत्वाकांक्षा वाले नेता भी हैं। इनमें मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा भी हैं। विरोधी खेमे को लग रहा है कि गुजरात चुनाव तक मध्यप्रदेश में कुछ हलचल देखने को मिल सकती है।