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क्यों मिली योगेंद्र यादव को सजा: एक 'सोच' पर टिके रहने से ही आगे बढ़ता है आंदोलन, अंतर्विरोध पैदा होते रहते हैं

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 22 Oct 2021 03:14 PM IST
सार

अविक साहा ने शुक्रवार सुबह एक खास बातचीत में कहा, योगेंद्र यादव 'जय किसान आंदोलन' से जुड़े हैं। जैसे दूसरे किसान संगठन, संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले संघर्ष कर रहे हैं, वैसे ही यादव भी किसानों के हकों के लिए आवाज उठा रहे हैं। ये तो सभी जानते हैं कि केंद्र सरकार शुरू से ही इस आंदोलन को खत्म कराने के लिए तरह तरह के प्रपंच रच रही है...

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Yogendra went to the BJP worker house, some colleagues did not like it, so he was suspended
योगेंद्र यादव। - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

विस्तार

लखीमपुर खीरी की घटना के बाद किसान आंदोलन में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। किसान संगठनों के कुछ नेताओं की सोच भी कभी-कभार इस आंदोलन को 'दुविधा' में डालती रही है। ताजा प्रकरण 'जय किसान आंदोलन' के संस्थापक और संयुक्त किसान मोर्चे 'एसकेएम' के वरिष्ठ सदस्य योगेंद्र यादव का है। लखीमपुर खीरी में भाजपा कार्यकर्ता शुभम मिश्रा की मौत के बाद उनके घर जाकर शोक जताना, यादव को महंगा पड़ गया। एसकेएम ने उन्हें एक माह के लिए किसान आंदोलन से निलंबित कर दिया है। ये अलग बात है कि वे पहले भी पंजाब से जुड़े किसान संगठनों एवं दूसरी जगहों के कुछ किसान नेताओं की आंखों की किरकिरी बने हुए थे। एसकेएम के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा कहते हैं, ये केवल सोच की दुविधा है। आंदोलन के दौरान 650 किसानों की मौत हो गई। क्या कभी पीएम मोदी और भाजपा ने कोई शब्द कहा। वे पूरी तरह मौन रहे हैं। योगेंद्र यादव अगर उस भाजपा कार्यकर्ता के घर शोक प्रकट करने जाते हैं, जिस पर किसानों को मारने का आरोप नहीं था, हम इसे वाजिब मानते हैं। किसान आंदोलन पर गैर-इंसानियत का आरोप नहीं लगने देंगे। हमारे साथियों को बुरा लगा, इसका खेद है, मगर काम बुरा नहीं था।

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'जय किसान आंदोलन' से जुड़े हैं योगेंद्र यादव                                         

अविक साहा ने शुक्रवार सुबह एक खास बातचीत में कहा, योगेंद्र यादव 'जय किसान आंदोलन' से जुड़े हैं। जैसे दूसरे किसान संगठन, संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले संघर्ष कर रहे हैं, वैसे ही यादव भी किसानों के हकों के लिए आवाज उठा रहे हैं। ये तो सभी जानते हैं कि केंद्र सरकार शुरू से ही इस आंदोलन को खत्म कराने के लिए तरह तरह के प्रपंच रच रही है। आंदोलन को बदनाम करने के लिए भाजपा ने कोई कसर बाकी नहीं रखी है। सरकार, संगठन और आंदोलन, ये सब एक 'सोच' पर टिके होते हैं। जब तक सोच एक रहती है तो आंदोलन आगे बढ़ता रहता है। कुछ ऐसे मौके भी आते हैं, जब सोच को लेकर अंतर्विरोध पैदा होने शुरू हो जाते हैं। इसका मतलब ये नहीं होता कि आंदोलन खत्म हो रहा है। जब किसान आंदोलन शुरू हुआ था, तब से लेकर अब तक ऐसे दर्जनों अवसर आए हैं, जब किसान संगठनों के नेताओं की राय अलग रही है। चूंकि तीन कृषि कानूनों के मुद्दे पर सब सहमत हैं, इसलिए उनकी निजी राय या सोच, आंदोलन पर असर नहीं डालती।

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'यादव का मिश्रा के घर जाना सही था'

योगेंद्र यादव के बारे में साहा ने कहा, लखीमपुर खीरी में मरने वाला शुभम भाजपा कार्यकर्ता था। उस पर ऐसा आरोप भी नहीं था कि उसने किसानों को मारा है। शुभम मिश्रा, बड़ा कार्यकर्ता नहीं था। उसका बच्चा, मां-बाप या परिवार के दूसरे सदस्य, किसानों के शत्रु हैं, ऐसा भी नहीं है। यहां पर जो लड़ाई है, वह व्यक्तिगत नहीं है। किसानों की लड़ाई है। जय किसान आंदोलन की लड़ाई भी व्यक्तिगत नहीं है। पीएम मोदी हैं, उनसे किसानों की निजी शत्रुता नहीं है। केवल मुद्दों की लड़ाई है। पीएम अपनी बात को सही मानते हैं, जबकि किसान उनसे सहमत नहीं हैं। किसान आंदोलन के दौरान 650 किसान मारे गए हैं। वे भी तो किसी के परिवार के सदस्य थे। क्या प्रधानमंत्री और भाजपा का यह फर्ज नहीं बनता था कि वे उन किसानों के लिए दो शब्द कहें। योगेंद्र का भाजपा कार्यकर्ता के घर पर जाना, कुछ साथियों को ठीक नहीं लगा, तो उन्होंने निलंबन कर दिया। इसमें अपमान जैसा कुछ नहीं है। यादव का भाजपा कार्यकर्ता मिश्रा के घर जाना सही था।

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जाने से पहले बैठक में होनी चाहिए थी चर्चा

जिस वक्त यादव, शुभम मिश्रा के घर पर गए, वह मौका ही अलग था। चारों तरफ हलचल थी। इतना समय ही नहीं मिला कि वहां जाने या न जाने के लिए संयुक्त मोर्चा के दूसरे साथियों से चर्चा की जाए। उस वक्त योगेंद्र, लखीमपुर खीरी में थे तो वे इंसानियत के चलते शुभम मिश्रा के घर पर चले गए। एसकेएम की ये बात सही है कि वहां जाने से पहले बैठक में चर्चा होनी चाहिए था। यादव के वहां जाने का मतलब, किसी के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण या बेईज्जती करना नहीं था। योगेंद्र यादव का वहां जाना ठीक था। एसकेएम को बुरा लगा है तो यादव को निलंबित कर दिया गया। किसान आंदोलन, आगे मजबूती के साथ अपनी राह पर चलता रहेगा। बता दें कि एक दिन पहले गाजीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत के बयान को लेकर सोशल मीडिया में यह खबर फैल गई कि आंदोलन अब खत्म होने जा रहा है। टिकैत ने टीवी पर जो कुछ कहा, उसका मतलब यही निकल रहा था। उन्होंने कहा, अब यहां से संसद भवन जाएंगे। अविक साहा ने कहा, ऐसा होता रहता है। कई बार व्यक्ति कहना कुछ चाहता है और उसकी बात को समझ कुछ और लिया जाता है। ये सोच की दुविधा है जो पहले भी रही है और आगे भी रहेगी। इससे आंदोलन न तो कमजोर होगा और न ही टूटेगा।

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