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Year Ender: चाइल्ड पोर्नोग्राफी से लेकर बाल विवाह तक....; बच्चों के हक के लिए ऐतिहासिक फैसलों का साल रहा 2024

Fri, 20 Dec 2024 04:18 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Fri, 20 Dec 2024 04:18 PM IST
सार

एक साल के अंदर पांच न्यायिक फैसलों से यह साबित हो गया कि न्यायपालिका बच्चों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील है। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि बच्चों के अधिकारों के बाबत भारतीय कानून दुनिया में सबसे प्रगतिशील माने जा सकते हैं, मगर सवाल इन पर अमल का है। 

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Year Ender: 2024 was a year of historic decisions for the rights of children know the details
बच्चों के हक में फैसला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाल के वर्षों में बच्चों की सुरक्षा के प्रति हमारे राष्ट्रीय दृष्टिकोण में बेहद अहम बदलाव देखने को मिले हैं। खास तौर से 2024 बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण की दिशा में कुछ ऐसे ऐतिहासिक फैसलों का साल रहा है जिसके दूरगामी नतीजे होंगे। इन फैसलों ने बच्चों की सुरक्षा को देखने-समझने के पूरे कानूनी परिदृश्य को बदल दिया है।

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बाल यौन शोषण के विरुद्ध कानूनों को कड़ा करने से लेकर बाल विवाह उन्मूलन के लिए उठाए गए कदमों के जरिए न्यायपालिका एक स्पष्ट संदेश दे रही है कि बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। आइए जानते हैं, उन पांच ऐतिहासिक निर्णयों के बारे में, जो बच्चों की सुरक्षा की दिशा में हमारी अनवरत यात्रा में सबसे अहम रहेंगे।
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चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की याचिका पर बच्चों की अश्लील फिल्मों व वीडियो के मांग और आपूर्ति के दुष्चक्र पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर 2024 को अपने फैसले में कहा कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखने, डाउनलोड करने, रखने या इसे किसी से साझा करने वाले किसी भी व्यक्ति पर पॉक्सो के साथ-साथ आईटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी की रोकथाम के लिए अर्से से प्रभावी कानून की प्रतीक्षा थी।
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भारत में 95 करोड़ से ज्यादा लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं और ऐसे में भारत चाइल्ड पोर्नोग्राफी यानी बच्चों के अश्लील फिल्मों व वीडियो का एक बड़ा उपभोक्ता और निर्माता दोनों है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी की शब्दावली को बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (सी-सीम) में बदलकर सुप्रीम कोर्ट ने अपराध को समझने के तरीके में भी एक आदर्श बदलाव किया है। इस बदलाव का नतीजा ये है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी को अब वयस्कों का मनबहलाव के तौर पर नहीं बल्कि अब एक ऐसे गंभीर अपराध के तौर पर देखा जाएगा, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन की याचिका पर आए इस ऐतिहासिक फैसले ने बच्चों के यौन शोषकों के पूरे गठजोड़ पर शिकंजा कस दिया है जो वैश्विक स्तर पर बच्चों के शोषण और उत्पीड़न का भारी मुनाफे वाला उद्योग चलाते हैं।

बाल विवाह के खिलाफ विस्तृत दिशा-निर्देश
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, बाल विवाह के हर तीन पीड़ितों में से एक भारत में है। यह बुराई आज भी हमारे सामाजिक ताने-बाने में गहरे तक पसरी है। बाल विवाह के कानूनन अपराध होने के बावजूद स्थिति निराशाजनक है। आर्थिक कठिनाइयां, पारिवारिक दबाव, सामाजिक धारणाएं और कठमुल्लापन देश में बाल विवाह को बढ़ावा देने के प्रमुख कारक हैं।

....लेकिन बदलाव की हवा बह रही
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगियों की याचिका पर बाल विवाह कानून पर एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्तूबर, 2024 को बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि बाल विवाह अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनने के अधिकार का हनन है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार व प्रशासनिक मशीनरी को इस सदियों पुराने अपराध को समाप्त करने के लिए रोकथाम संरक्षण-अभियोजन रणनीति और समुदाय संचालित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देश यह सुनिश्चित करने पर केंद्रित हैं कि स्कूल, धार्मिक संस्थान और पंचायतें बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता का प्रसार करें खास तौर से उन इलाकों में जहां बाल विवाह की दर अधिक है।

हालांकि कई समाज सुधारकों ने सदियों से इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई है, लेकिन इस फैसले ने बाल विवाह के खात्मे के लिए समग्र रणनीति, लक्ष्यकेंद्रित प्रयासों और समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित किया है। अभी हाल ही में महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा बाल विवाह को समाप्त करने के लिए शुरू किया गया राष्ट्रव्यापी 'बाल विवाह मुक्त भारत अभियान' निश्चित रूप से इस लड़ाई को और आगे बढ़ाएगा।

पॉक्सो पीड़ितों के लिए सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति
हमारे देश में यौन शोषण का शिकार कोई बच्चा जब न्याय की मांग करता है तो दुर्भाग्य से यह उसकी पीड़ा को और बढ़ाने वाला होता है। पूरा समाज उसको अलग नजरिए से देखने लगता है और अक्सर उनके साथ खड़े होने के बजाय उनसे ही सवाल करता है। वहीं, देश की न्यायिक प्रणाली में न्याय की जटिल और थकाऊ प्रक्रिया उन्हें असहाय महसूस कराने के साथ उनमें आत्मग्लानि की भावना को भी जन्म देती है।

तमाम कानूनों के बावजूद देश में अब भी यौन शोषण व उत्पीड़न के पीड़ित बच्चों के लिए अपेक्षित संवेदना का अभाव है। यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम में यौन शोषण पीड़ित बच्चों की सहायता के लिए सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति का प्रावधान है। सपोर्ट पर्सन यानी वह व्यक्ति जो इन बच्चों की कानूनी, चिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक सहायता सहित उन्हें समाज की मुख्य धारा में वापस लाने के लिए प्रशिक्षित है। यह सपोर्ट पर्सन बच्चों को बाल कल्याण समिति द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन कानून में भले ही सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति का प्रावधान हो, जमीनी हकीकत इससे अलग है। एक गैरसरकारी संगठन ‘इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन’ के एक शोध के अनुसार 31 जनवरी 2023 तक देश की विभिन्न फास्ट ट्रैक स्पेशल अदालतों में पॉक्सो के 43 लाख से भी ज्यादा मामले लंबित थे।

हालांकि, इस वर्ष अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की याचिका पर अपने फैसले में सभी राज्यों व केंद्रशासित क्षेत्रों को यौन शोषण के पीड़ित बच्चों की सहायता के लिए अनिवार्य रूप से सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक इन बच्चों को यह महसूस नहीं कराया जाता कि वे सुरक्षित हैं, उन्हें समाज की मुख्य धारा में नहीं लाया जाता और उनकी गरिमा की बहाली नहीं हो जाती, तब तक ये नहीं माना जा सकता कि इन बच्चों के साथ न्याय हुआ है। यह निस्संदेह एक बहुत बड़ा बयान और दूरगामी फैसला है।

बाल विवाह के लिए पंचायतें होंगी जवाबदेह
राजस्थान में सदियों से अक्षय तृतीया जैसी पवित्र मानी जाने वाली तिथि पर बड़े पैमाने पर बच्चों के सामूहिक विवाह की प्रथा चली आ रही है। यह वो मौका होता है जब बड़ी संख्या में बच्चों के बाल विवाह का खतरा रहता है। बहुत से विवाह गाजे-बाजे के साथ होते हैं तो कुछ चोरी छिपे संपन्न कर दिए जाते हैं।

हालांकि अक्षय तृतीया से ऐन पहले राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले से इस साल हर बार की तरह बड़े पैमाने पर बाल विवाह नहीं हो पाए। यह आदेश भी जस्ट राइट्स फॉर चिल्डेन की याचिका पर आया। अदालत ने साफ तौर से कहा कि किसी भी गांव में बाल विवाह होने पर पंचायतों को जवाबदेह ठहराया जाएगा। यह एक अहम फैसला था क्योंकि अगर बाल विवाह को रोकना है तो सबसे पहले पंचायतों को जवाबदेह बनाना होगा। पंचायत प्रतिनिधियों को गांव की एक-एक गतिविधि की खबर रहती है और वे इसे रोकने में सबसे कारगर कड़ी हैं।

बच्चों की गुमशुदगी के मामले में अब 24 घंटे बीतने का इंतजार नहीं
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में देश में कुल 47,000 बच्चे लापता हुए जिनमें से 71.4 प्रतिशत नाबालिग बच्चियां थीं। हो सकता है कि ये बच्चे कम उम्र के प्रेम में फंसकर किसी के साथ घर छोड़ गए हों या परीक्षा में कम नंबर आने की वजह से भाग गए हों लेकिन सबसे ज्यादा संभावना यही है कि ये किसी ट्रैफिकिंग गिरोह के जाल में फंस गए और अब इनसे बाल मजदूरी या वेश्यावृत्ति कराई जा रही है। हालांकि, किसी भी अपराध की जांच में शुरुआती 24 घंटे सबसे अहम होते हैं। लेकिन लापता बच्चों के मामले में पुलिस 24 घंटे बीतने के बाद जांच शुरू करती है जबकि ट्रैफिकिंग गिरोह इस 24 घंटे में बच्चे को किसी भी दूसरे शहर, राज्य या यहां तक कि विदेश भी भेज सकते हैं।

लिहाजा दिल्ली हाई कोर्ट ने जब पुलिस थानों को निर्देश दिया कि बच्चों की गुमशुदगी के मामले में 24 घंटे बीतने का कतई इंतजार नहीं किया जाए और तत्काल जांच शुरू की जाए तो पुलिस को मजबूरन अपनी कार्यशैली बदलनी पड़ी। अदालत ने कहा कि पुलिस के लिए यह मानने की कोई वजह नहीं है कि बच्चा 24 घंटे में घर लौट सकता है और इसलिए वे एक दिन इंतजार कर सकते हैं।


बच्चों की सुरक्षा व संरक्षण के प्रति संवेदनशील न्यायपालिका
महज एक साल के अंदर इन पांच ऐतिहासिक न्यायिक फैसलों से यह साबित हो गया कि न्यायपालिका बच्चों की सुरक्षा व संरक्षण के प्रति संवेदनशील है। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि बच्चों के अधिकारों के बाबत भारतीय कानून दुनिया में सबसे प्रगतिशील माने जा सकते हैं लेकिन सवाल इन पर अमल का है। न्याय अभी भी देश के सबसे वंचित तबकों की पहुंच से बाहर है। फिर भी इन फैसलों से उम्मीद बंधती है कि सतत सतर्कता और सरकार, नागरिक समाज और समुदायों के सम्मिलित प्रयासों से देश में बच्चों की देखभाल और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की संस्कृति विकसित होगी। यह चुनौतीपूर्ण है लेकिन इससे पार पाने के लिए कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना जरूरी है ताकि बचपन भय, शोषण या किसी खतरे के बगैर निरापद माहौल में पुष्पित-पल्लवित हो सके।

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