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SC: 'सावधानी से बढ़ेंगे आगे', हिंदू उत्तराधिकार कानून की धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट
Thu, 25 Sep 2025 09:34 AM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 25 Sep 2025 09:34 AM IST
सार
SC: सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार कानून की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करते हुए कहा कि वह इस मामले में सावधानी से आगे बढ़ेगा। कोर्ट ने हिंदू सामाजिक ढांचे को टूटने से बचाने की बात कही, लेकिन साथ ही महिलाओं के अधिकारों को लेकर संतुलन बनाए रखने पर भी जोर दिया। मामला विशेष रूप से अधिनियम की धारा 15 और 16 से जुड़ा है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की कुछ धाराओं को लेकर दायर याचिका पर विचार करते समय बहुत ही सावधानी से आगे बढ़ेगा। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि वह हजारों वर्षों पुरानी हिंदू सामाजिक संरचना और उसके मूल सिद्धांतों को तोड़ने से बचेगा। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच इस अधिनियम के तहत उत्तराधिकार से जुड़ी कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हमें हिंदू समाज की उस संरचना को नीचा नहीं दिखाना चाहिए, जो पहले मौजूद है। एक अदालत के रूप में हम आपको सावधान कर रहे हैं। हिंदुओं की सामाजिक संरचना है और उसे गिराने की कोशिश न करें। हम ऐसा कोई फैसला नहीं देना चाहते, जिससे हजारों वर्षों से चली रही व्यवस्था टूट जाए।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं के अधिकार जरूरी हैं, लेकिन सामाजिक ढांचे और महिलाओं को अधिकार देने के बीच एक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। बेंच ने इस मुद्दे के व्यापक समाधान से पहले पक्षकारों को सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में भेज दिया है, ताकि वे आपसी समझौते की संभावना तलाश सकें।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने क्या दलील दी?
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि जिन धाराओं को चुनौती दी गई है, वे महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण और उन्हें अलग करने वाली हैं। उन्होंने कहा कि परंपराओं के नाम पर महिलाओं को समान संपत्ति अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम. नटराज ने अधिनियम का बचाव किया और कहा कि यह कानून अच्छी तरह से तैयार किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता इस कानून की आड़ में सामाजिक ढांचे को तोड़ना चाहते हैं।
ये भी पढ़ें: 'बेअंत सिंह की हत्या के दोषी को अब तक फांसी क्यों नहीं दी...कौन जिम्मेदार?'; अदालत ने उठाए सवाल
इस मामले में कोर्ट के समक्ष विचाराधीन मुख्य मुद्दा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 और 16 है। ये धाराएं उस स्थिति से जुड़ी हैं जब किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है, यानी उसने कोई वसीयत नहीं छोड़ी होती है। धारा 15 के अनुसार, अगर किसी हिंदू महिला की मृत्यु वसीयत छोड़े बिना होती है, तो उसकी संपत्ति सबसे पहले उसके पति के उत्तराधिकारियों को मिलती है, उसके अपने माता-पिता को नहीं।
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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हमें हिंदू समाज की उस संरचना को नीचा नहीं दिखाना चाहिए, जो पहले मौजूद है। एक अदालत के रूप में हम आपको सावधान कर रहे हैं। हिंदुओं की सामाजिक संरचना है और उसे गिराने की कोशिश न करें। हम ऐसा कोई फैसला नहीं देना चाहते, जिससे हजारों वर्षों से चली रही व्यवस्था टूट जाए।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं के अधिकार जरूरी हैं, लेकिन सामाजिक ढांचे और महिलाओं को अधिकार देने के बीच एक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। बेंच ने इस मुद्दे के व्यापक समाधान से पहले पक्षकारों को सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में भेज दिया है, ताकि वे आपसी समझौते की संभावना तलाश सकें।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने क्या दलील दी?
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि जिन धाराओं को चुनौती दी गई है, वे महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण और उन्हें अलग करने वाली हैं। उन्होंने कहा कि परंपराओं के नाम पर महिलाओं को समान संपत्ति अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम. नटराज ने अधिनियम का बचाव किया और कहा कि यह कानून अच्छी तरह से तैयार किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता इस कानून की आड़ में सामाजिक ढांचे को तोड़ना चाहते हैं।
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इस मामले में कोर्ट के समक्ष विचाराधीन मुख्य मुद्दा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 और 16 है। ये धाराएं उस स्थिति से जुड़ी हैं जब किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है, यानी उसने कोई वसीयत नहीं छोड़ी होती है। धारा 15 के अनुसार, अगर किसी हिंदू महिला की मृत्यु वसीयत छोड़े बिना होती है, तो उसकी संपत्ति सबसे पहले उसके पति के उत्तराधिकारियों को मिलती है, उसके अपने माता-पिता को नहीं।