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चिंताजनक: पृथ्वी की 91% अतिरिक्त गर्मी सोख रहे महासागर, मौसम पर प्रभाव; ग्रीनहाउस गैसों का अभूतपूर्व असर
Wed, 25 Mar 2026 04:45 AM IST
Devesh Tripathi
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली/ जिनेवा।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली/ जिनेवा।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Wed, 25 Mar 2026 04:45 AM IST
सार
1960 के बाद से अब तक 2025 में ईईआई अपने उच्चतम स्तर पर दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह संकेतक पारंपरिक सतही तापमान की तुलना में अधिक सटीक तस्वीर पेश करता है। रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक से अब तक पृथ्वी पर जमा हुई कुल अतिरिक्त गर्मी का लगभग 91 प्रतिशत हिस्सा महासागरों ने अवशोषित किया है।
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पृथ्वी
- फोटो : Freepik
विस्तार
पृथ्वी पर जमा हो रही अतिरिक्त गर्मी अब ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन केवल तापमान का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे ऊर्जा तंत्र के असंतुलन का संकट बन चुका है।
विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की नवीनतम स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2025 रिपोर्ट में एक अहम संकेतक पृथ्वी का एनर्जी इम्बैलेंस पहली बार केंद्र में आया है, जो बताता है कि ग्रह कितनी तेजी से गर्म हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार पहली बार पृथ्वी के अर्थ्स एनर्जी इम्बैलेंस (ईईआई) को प्रमुख संकेतक के रूप में शामिल किया गया है। यह उस अंतर को दर्शाता है, जो सूर्य से आने वाली ऊर्जा और अंतरिक्ष में वापस जाने वाली ऊर्जा के बीच होता है। जब यह संतुलन सकारात्मक होता है, तो इसका अर्थ है कि पृथ्वी लगातार अधिक गर्मी जमा कर रही है।
1960 के बाद से अब तक 2025 में ईईआई अपने उच्चतम स्तर पर दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह संकेतक पारंपरिक सतही तापमान की तुलना में अधिक सटीक तस्वीर पेश करता है। रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक से अब तक पृथ्वी पर जमा हुई कुल अतिरिक्त गर्मी का लगभग 91 प्रतिशत हिस्सा महासागरों ने अवशोषित किया है। यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के जलवायु विश्लेषक थॉमस मॉर्टलॉक के मुताबिक वायुमंडल केवल लगभग एक प्रतिशत अतिरिक्त गर्मी को ही धारण करता है, इसलिए केवल सतही तापमान के आधार पर जलवायु संकट की गंभीरता को समझना भ्रामक हो सकता है।
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ग्रीनहाउस गैसों का अभूतपूर्व स्तर
वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) की सांद्रता 2024 में 423.9 पार्ट्स प्रति मिलियन तक पहुंच गई, जो पिछले 20 लाख वर्षों में सबसे अधिक है। इसके साथ ही मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी अन्य प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों का स्तर भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर दर्ज किया गया। अंटार्कटिका की बर्फ कोर के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले 8 लाख वर्षों में सीओ2 का स्तर 150 से 300 पार्ट्स प्रति मिलियन के बीच ही रहा था, जिससे स्पष्ट है कि वर्तमान स्थिति प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन की सीमाओं से कहीं आगे निकल चुकी है।
खाद्य सुरक्षा, प्रवासन और सामाजिक स्थिरता पर असर
जलवायु संकट का असर कृषि उत्पादन पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जिससे खाद्य असुरक्षा का खतरा बढ़ रहा है। इसके साथ ही, चरम मौसम और पर्यावरणीय बदलावों के कारण बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन हो रहा है, खासकर उन क्षेत्रों में जो पहले से ही संघर्ष और अस्थिरता का सामना कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, वैश्विक जलवायु की स्थिति आपातकाल में है। पृथ्वी को उसकी सीमाओं से परे धकेला जा रहा है। हर प्रमुख जलवायु संकेतक खतरे का संकेत दे रहा है। मानवता ने लगातार 11 सबसे गर्म वर्ष झेले हैं यह संयोग नहीं, बल्कि कार्रवाई का स्पष्ट आह्वान है।
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विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की नवीनतम स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2025 रिपोर्ट में एक अहम संकेतक पृथ्वी का एनर्जी इम्बैलेंस पहली बार केंद्र में आया है, जो बताता है कि ग्रह कितनी तेजी से गर्म हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार पहली बार पृथ्वी के अर्थ्स एनर्जी इम्बैलेंस (ईईआई) को प्रमुख संकेतक के रूप में शामिल किया गया है। यह उस अंतर को दर्शाता है, जो सूर्य से आने वाली ऊर्जा और अंतरिक्ष में वापस जाने वाली ऊर्जा के बीच होता है। जब यह संतुलन सकारात्मक होता है, तो इसका अर्थ है कि पृथ्वी लगातार अधिक गर्मी जमा कर रही है।
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1960 के बाद से अब तक 2025 में ईईआई अपने उच्चतम स्तर पर दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह संकेतक पारंपरिक सतही तापमान की तुलना में अधिक सटीक तस्वीर पेश करता है। रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक से अब तक पृथ्वी पर जमा हुई कुल अतिरिक्त गर्मी का लगभग 91 प्रतिशत हिस्सा महासागरों ने अवशोषित किया है। यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के जलवायु विश्लेषक थॉमस मॉर्टलॉक के मुताबिक वायुमंडल केवल लगभग एक प्रतिशत अतिरिक्त गर्मी को ही धारण करता है, इसलिए केवल सतही तापमान के आधार पर जलवायु संकट की गंभीरता को समझना भ्रामक हो सकता है।
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ग्रीनहाउस गैसों का अभूतपूर्व स्तर
वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) की सांद्रता 2024 में 423.9 पार्ट्स प्रति मिलियन तक पहुंच गई, जो पिछले 20 लाख वर्षों में सबसे अधिक है। इसके साथ ही मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी अन्य प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों का स्तर भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर दर्ज किया गया। अंटार्कटिका की बर्फ कोर के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले 8 लाख वर्षों में सीओ2 का स्तर 150 से 300 पार्ट्स प्रति मिलियन के बीच ही रहा था, जिससे स्पष्ट है कि वर्तमान स्थिति प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन की सीमाओं से कहीं आगे निकल चुकी है।
खाद्य सुरक्षा, प्रवासन और सामाजिक स्थिरता पर असर
जलवायु संकट का असर कृषि उत्पादन पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जिससे खाद्य असुरक्षा का खतरा बढ़ रहा है। इसके साथ ही, चरम मौसम और पर्यावरणीय बदलावों के कारण बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन हो रहा है, खासकर उन क्षेत्रों में जो पहले से ही संघर्ष और अस्थिरता का सामना कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, वैश्विक जलवायु की स्थिति आपातकाल में है। पृथ्वी को उसकी सीमाओं से परे धकेला जा रहा है। हर प्रमुख जलवायु संकेतक खतरे का संकेत दे रहा है। मानवता ने लगातार 11 सबसे गर्म वर्ष झेले हैं यह संयोग नहीं, बल्कि कार्रवाई का स्पष्ट आह्वान है।
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