Women Empowerment in RSS: ‘आरएसएस में महिलाओं की नो एंट्री’, कितने सही हैं ये आरोप?
Women Empowerment in RSS: संघ के विशेषज्ञ बताते हैं कि ये आरोप पूरी तरह निराधार हैं। संघ में 1936 में ही राष्ट्र सेविका समिति (Rashtra Sevika Samiti) का गठन कर दिया गया था, जिसमें केवल महिलाएं ही भाग लेती हैं...
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) में महिलाओं की भूमिका को लेकर लंबे समय से प्रश्न खड़े किये जाते रहे हैं। विशेषकर वामपंथी आलोचकों द्वारा यह आरोप लगाया जाता रहा है कि आरएसएस अपने संगठन में देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को कोई हिस्सेदारी नहीं देता। इस प्रकार वे उसे पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त एक संगठन बताते रहे हैं, जहां महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है। यह प्रश्न आज दोबारा तब सुर्खियों में आ गया, जब आरएसएस के हेड क्वार्टर नागपुर (Nagpur) में विजयादशमी (Vijyadashmi) कार्यक्रम पर पद्मश्री पर्वतारोही संतोष यादव (Santosh Yadav) को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया और उनका सम्मान किया गया। लेकिन ये आरोप कितने सही हैं?
संघ के विशेषज्ञ बताते हैं कि ये आरोप पूरी तरह निराधार हैं। संघ में 1936 में ही राष्ट्र सेविका समिति (Rashtra Sevika Samiti) का गठन कर दिया गया था, जिसमें केवल महिलाएं ही भाग लेती हैं। इस समय इसमें लगभग दस लाख बहनें भाग लेती हैं और देश के सभी प्रांतों में इसकी शाखाएं चलती हैं। अकेले राजधानी दिल्ली में ही लगभग 70 महिला शाखाएं राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से संचालित की जा रही हैं। हालांकि, ये आरोप सही हैं कि आरएसएस की मुख्य बॉडी में केवल पुरुष कार्यकर्ता ही कार्य करते हैं।
जहां तक संघ में महिलाओं को आगे न बढ़ाने का आरोप है, उसके प्रतिउत्तर में राष्ट्र सेविका समिति का कहना है कि उसकी कार्यकर्ता सुमित्रा महाजन देश की लोकसभा की स्पीकर तक रह चुकी हैं। इसी प्रकार दिवंगत सुषमा स्वराज भी राष्ट्र सेविका समिति से जुड़ी रहीं जो केंद्र सरकार में विदेश मंत्री सहित अनेक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभाती रहीं। वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संसदीय बोर्ड की सदस्य भी रहीं, जो भाजपा में निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है। इसी प्रकार राष्ट्रीय सेविका समिति की अनेक महिलाएं देश के महत्त्वपूर्ण पदों तक पहुंचीं।
महिलाओं की सार्वजिनक भूमिका के पक्षधर थे हेडगेवार- राकेश सिन्हा
आरएसएस के जानकार राकेश सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार’ की पृष्ठ संख्या 208 पर लिखा है कि ‘संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका के प्रबल पक्षधर थे। तभी तो संघ की शाखाओं एवं शिविरों में महिला नेताओं को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया जाता था। अखिल भारतीय महिला परिषद ने संघ के सामाजिक सुधार के दृष्टिकोण का समर्थन किया था। इसकी अध्यक्षा राजकुमारी अमृत कुंवर एवं अन्य सदस्य, जिनमें राज्य विधानसभा की उपसभापति अनसूया बाई काले भी शामिल थीं, नागपुर के संघ शिविर में 28 दिसंबर 1937 को आई थीं।'
राकेश सिन्हा आगे लिखते हैं कि 'यह कोई पहली घटना नहीं थी। इसके पहले भी सार्वजनिक जीवन में कार्यरत महिला नेताओं एवं समाजसेवियों को आमंत्रित किया गया था। कांग्रेस की नेता कमलाबाई ने 21 नवंबर 1938 को कोंकण में संघ की शाखा में अपना भाषण दिया था।' इसी प्रकार पार्वतीबाई चिटणवीस 9 दिसंबर 1934 को संघ की नागपुर शाखा के वार्षिक उत्सव में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुई थीं। मध्यप्रांत विधानसभा की मनोनीत सदस्या रमाबाई तांबे संघ के प्रशंसकों में थीं।'
सिन्हा के मुताबिक़, डा. हेडगेवार महिलाओं की सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक भूमिका के प्रति कितने जागरूक थे, इसका पता इस बात से चलता है कि देश के सर्वाधिक पुराने महिला संगठनों में से एक ‘राष्ट्र सेविका समिति’ के वह प्रेरणा स्रोत थे। (इसकी स्थापना आरएसएस की स्थापना के कुछ ही वर्षों बाद 1936 में हो गई थी।) संघ से प्रभावित महिला कार्यकर्ताओं में उन्होंने आत्मविश्वास एवं हिम्मत पैदा करके उन्हें स्वतंत्र संगठन की नींव रखने के लिए प्रेरित किया था।
मध्यप्रांत में दो महिला संगठनों राष्ट्र सेविका समिति (वर्धा) और राष्ट्रीय स्वयंसेविका संघ (भंडारा) की स्थापना 1935-36 में हुई थी। डा. हेडगेवार की प्रेरणा से अक्तूबर 1936 में दोनों संगठनों का विलय हो गया। आज भी इस समिति के अंदर महिलाओं को सैद्धांतिक और शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता है।
आरएसएस की महिला नेता ने बताया
आरएसएस की महिला विंग के तौर पर देखी जाने वाली ‘राष्ट्र सेविका समिति’ (इसका संक्षिप्त नाम भी आरएसएस है जो मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संक्षिप्त नाम के सामान है।) की दिल्ली प्रांत की प्रचार प्रमुख कुलना एल साहनी ने अमर उजाला को बताया कि समिति की स्थापना 1936 में ही हो गई थी। तभी से देश के सभी प्रान्तों में राष्ट्रीय सेविका समिति की शाखाएं कार्य कर रही हैं। इनमें युवा लड़कियों से लेकर घरेलू-कामकाजी महिलाओं तक को जगह दी जाती है।
महिला आरएसएस कर्मी क्या करती हैं
कुलना एल साहनी ने बताया कि महिलाओं की पारिवारिक जिंदगी की व्यस्तताओं को देखते हुए उन्हें कार्य करने में स्वतंत्रता दी जाती है। वे जितना समय संगठन के लिए दे सकती हैं, उन्हें उसी के अनुरूप जिम्मेदारी दी जाती है। कुछ महिलाएं पूर्ण कालिक भी होती हैं जो प्रवास कर समाज के अंदर सांस्कृतिक चेतना के विस्तार और संगठन के विस्तार के लिए कार्य करती हैं तो कुछ महिलाओं को सीमित समय के लिए जिम्मेदारी दी जाती है।
देश के किसी हिस्से में प्राकृतिक आपदा आने के समय राष्ट्रीय सेविका समिति की बहनें समाज के लोगों से आवश्यक वस्तुएं एकत्र करती हैं, जिसे आरएसएस के सेवा भारती के माध्यम से जरूरतमंदों तक भेज दिया जाता है। राष्ट्रीय सेविका समिति की बहनें सिलाई-कढ़ाई और अन्य कार्यों में भी लगी रहती हैं जो परेशान लोगों के लिए आवश्यक वस्तुएं बनाकर उन तक पहुंचाती हैं।
राष्ट्र सेविका समिति परिवार के सभी संभव कोणों से विकास के लिए कार्य करती है। महिला शाखाओं में महिलाओं को बच्चों को पालने, घर में सकारात्मक शांतिपूर्ण वातावरण बनाये रखने और बच्चों में सांस्कृतिक चेतना के विकास के लिए भी आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाता है। महिलाओं को शारीरिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है, जिससे वे स्वयं स्वस्थ रहकर अपने परिवार को बेहतर ढंग से पाल सकें और राष्ट्र-समाज के विकास में अपना योगदान दे सकें।