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जुनून और जज्बे से मिलती है सफलता, एवरेस्ट विजेता मेघा परमार ने बताया जीत का मंत्र
Fri, 05 Feb 2021 10:15 PM IST
संजीव कुमार झा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Fri, 05 Feb 2021 10:15 PM IST
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मेघा परमार (फाइल फोटो)
- फोटो : Social Media
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'अगर आप कामयाब होना चाहते हैं तो आपके अंदर कामयाबी का जुनून होना चाहिए। आपका जुनून आपसे वह सब कराता है, जिसे आप करने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकते। यह बात माउंट एवरेस्ट विजेता मेघा परमार ने शुक्रवार को कही। वह भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) की ओर से आयोजित कार्यक्रम 'शुक्रवार संवाद' में मौजूद थीं। इस दौरान आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी और अपर महानिदेशक के सतीश नंबूदिरीपाड भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
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पहले प्रयास में चूक गई थीं मेघा
'माउंट एवरेस्ट की मेरी यात्रा' विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए मेघा ने कहा कि आप जो कुछ भी करना या बनना चाहते हैं, उसके लिए लक्ष्य तय करना चाहिए। बता दें कि मेघा अपने पहले प्रयास में माउंट एवरेस्ट विजय से महज 700 फुट से चूक गई थीं। उन्होंने बताया कि असफलता से हताशा तो आती है, लेकिन समाज में कई लोग आपका हौसला बढ़ाते हैं।
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2019 में फतह किया एवरेस्ट
ट्रेनिंग के दौरान चोटिल होने के बाद मेघा को रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन कराना पड़ा था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 22 मई 2019 को सुबह 5 बजे उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के साथ एवरेस्ट फतह कर लिया। मेघा ने बताया कि आपको फिजिकल फिटनेस के लिए रोज कड़ा परिश्रम और मानसिक फिटनेस के लिए योग व प्राणायाम करना चाहिए।
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मेघा ने सुनाई आपबीती
मेघा ने बताया कि एवरेस्ट यात्रा के दौरान हमेशा पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता था। हर समय शरीर अंदर से टूटता था। सांस नहीं ली जाती थी। सीढ़ियां पार करते समय पैर कांपते थे। उस वक्त मैंने अपनी हिम्मत बढ़ाई और खुद से कहा कि रुको मत। यह भी हो जाएगा।
लाशों के बीच से किया सफर
मेघा ने एवरेस्ट यात्रा की घटनाओं का सजीव वर्णन करते हुए कहा कि किस तरह एक पर्वतारोही को यात्रा के दौरान मरे हुए लोगों की लाशों से गुजरना पड़ता है। उन्होंने बताया कि हम जब हाई एल्टीट्यूड पर पहुंचते हैं तो वहां ऑक्सीजन बहुत कम होती है।
ऐसे में जीवन के लिए प्यार से ज्यादा जरूरी ऑक्सीजन है और हम सब को इसके लिए पेड़ जरूर लगाने चाहिए। मेघा ने कहा कि जब मैं जिंदगी और मौत के बीच थी तो खुद से दो वादे किए थे। एक तो यह कि मैं बहुत सारे पौधे लगाऊंगी और दूसरा यह कि लोगों की हरसंभव मदद करूंगी। कार्यक्रम का संचालन प्रो. प्रमोद कुमार और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. संगीता प्रणवेंद्र ने किया।