आतंकियों का दबदबा: क्या अमेरिका फिर लौट कर आएगा अफगानिस्तान, खत्म होने की बजाय पहले से ज्यादा बढ़ गए दुश्मन
विदेशी मामलों के विशेषज्ञ कर्नल एके दत्ता कहते हैं दरअसल अमेरिका जिस मकसद के साथ बीस साल पहले अफगानिस्तान में आकर अपने दुश्मनों का सफाया करना चाहता था, उसमें थोड़ी बहुत कामयाबी तो हासिल की, लेकिन उस कामयाबी के अलावा बहुत सारी नाकामियां जुड़ती चली गयीं...
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अफगानिस्तान की जमीन पर अमेरिका की बीस साल की मेहनत पर पानी फिर गया। क्योंकि जिस मकसद से बीस साल पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान में एंट्री की थी वह मकसद तो सफल नहीं हुआ बल्कि अपने नए दुश्मन और पैदा कर लिए। यही नहीं, अफगानिस्तान से लेकर अमेरिका तक राष्ट्रपति बाइडन और पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप की कूटनीतिक हार से फजीहत हो रही है, सो अलग। विदेशी मामलों के जानकार बताते हैं कि जिस तरीके से अफगानिस्तान की जमीन पर अमेरिका की नाकामी सामने आई है उससे अनुमान लगाया जा रहा है कि अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान की जमीन पर फिर से उतरेंगी। बस इस बार अंतर इतना होगा कि अमरीकी फौज तालिबानियों की मदद के लिए साथ खड़ी होगी।
अफगानिस्तान की जमीन पर एक बार फिर से अमेरिका के आने की सुगबुगाहट हक्कानी नेटवर्क और आईएस (के) की सक्रियता के चलते सुनाई पड़ रही है। विदेशी मामलों के विशेषज्ञ कर्नल एके दत्ता कहते हैं दरअसल अमेरिका जिस मकसद के साथ बीस साल पहले अफगानिस्तान में आकर अपने दुश्मनों का सफाया करना चाहता था, उसमें थोड़ी बहुत कामयाबी तो हासिल की, लेकिन उस कामयाबी के अलावा बहुत सारी नाकामियां जुड़ती चली गयीं। इन्हीं में सबसे बड़ी नाकामी यह रही कि जब अमेरिकी फौजों ने अफगानिस्तान को छोड़ना शुरू किया अंदरूनी तौर पर तालिबान से चल रही बातचीत में उसने इस बात का समझौता नहीं किया कि सत्ता परिवर्तन के बाद पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले हक्कानी नेटवर्क का दखल अफगानिस्तान में नहीं होगा। यही अमेरिका की एक बड़ी नाकामी अफगानिस्तान की जमीन छोड़ने के एलान के वक्त हुई।
अब जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की विदाई हो रही है तो पूरे अफगानिस्तान में तबाही मची हुई है। दरअसल काबुल में सुरक्षा की जिम्मेदारी तालिबान ने हक्कानी नेटवर्क को दे दी और नतीजतन हक्कानी नेटवर्क के टुकड़ों पर पलने वाले आईएस(के) के आतंकवादियों ने काबुल में एक के बाद एक धमाके कर लाशें बिछानी शुरू कर दीं। जिसमें अमेरिका से लेकर अफगानिस्तान और दुनिया के अन्य कई मुल्कों के लोगों की मौतें हो गई। बौखलाए अमेरिका ने न सिर्फ तालिबान को कसा बल्कि आईएस (के) के ठिकानों पर जाकर ड्रोन हमले करने शुरू कर दिए और हमले के मुख्य आरोपी को मार गिराने का दावा कर दिया।
इस हमले से हक्कानी नेटवर्क ने तालिबान को अपनी धमक में लेकर अमेरिका की दखलंदाजी को बंद करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। कर्नल दत्ता कहते हैं दरअसल अफगानिस्तान से अशांति फैला कर माहौल को हमेशा से गर्म करने की मंशा पाकिस्तान की रही है। तालिबानियों से लेकर हक्कानी नेटवर्क और आईएस (के) से लेकर हजारा, उजबेक और उईगर आतंकवादियों को पाकिस्तान न सिर्फ पनाह देता रहा, बल्कि उन्हें वित्तीय मदद से लेकर गोला बारूद तक की आपूर्ति करता रहता है। विशेषज्ञ बताते हैं जब तालिबान को अफगानिस्तान में सत्ता हासिल हुई तो पाकिस्तान इसी में लगा हुआ था कि काबुल समेत कई जगहों की सुरक्षा हक्कानी नेटवर्क को मिल जाए। रणनीतिक तौर पर पाकिस्तान सफल हुआ और हक्कानी नेटवर्क को तालिबान ने सुरक्षा की जिम्मेदारी दे दी।
पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले आईएस(के) को यह बात बिल्कुल नागवार गुजर रही थी कि तालिबान और अमेरिका का अंदरखाने में समझौता हो रहा है। आईएस और तालिबान का आपस में छत्तीस का आंकड़ा है। अफगानिस्तान के कई इलाकों में तालिबानी और आईएस में लगातार झड़पें भी होती रहती थीं। जिसमें पाकिस्तान की ओर से आईएस को लगातार मदद मिलती रहती है। ऐसा नहीं है कि तालिबानियों को पाकिस्तान से मदद नहीं मिलती, लेकिन बात जब आईएस और हक्कानी नेटवर्क की आती तो पाकिस्तान दोनों आतंकी संगठनों को तालिबान के मुकाबले ज्यादा तवज्जो देता था। कर्नल दत्ता कहते हैं पाकिस्तान की यही रणनीति थी कि आतंकवादी संगठनों को न सिर्फ पैदा करो बल्कि पाल पोस कर बड़ा करते रहो। आतंकियों को माकूल माहौल और पूरा समर्थन देने वाले पाकिस्तान ने इस इलाके में आतंकवादी संगठनों का ऐसा ताना-बाना बुना के अब हालात बद से बदतर हो गए।
अफगानी तालिबान हक्कानी नेटवर्क पर भरोसा करता है। हक्कानी नेटवर्क आईएस (के) को आगे बढ़ाता है। आईएस (के) अफगानी तालिबान को नापसंद करता है। और पाकिस्तान तीनों कॉो आतंकवाद फैलाने में इस्तेमाल करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान दिखावे के साथ अफगानिस्तान में सत्ता बहाली के बाद सब चीजें व्यवस्थित करने का नाटक तो जरूर कर रहा है, लेकिन हक्कानी नेटवर्क और आईएस के माध्यम से अफगानिस्तान में अशांति फैलाने में भी पीछे नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक आईएस (के) के ज्यादातर लड़ाके पाकिस्तानी हैं। जबकि हक्कानी नेटवर्क में भी पाकिस्तानियों की संख्या बहुत ज्यादा है। इन दोनों आतंकी संगठनों के आतंकवादी अल-कायदा और आईएस के साथ मिलकर अमेरिका से हर मौके पर दुश्मनी का बदला लेने के लिए तैयार रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यही वजह है की हक्कानी नेटवर्क की शह पर आईएस ने काबुल में बड़ा धमाका किया और अमेरिकी सैनिकों की जान ले ली।
विशेषज्ञों का कहना है अमेरिकी सेना पर हुए हमले के बाद अमेरिका को इस बात का अंदाजा हो गया है कि यह सभी आतंकी संगठन एकजुट होकर अमेरिका के खिलाफ जहां मौका मिलेगा वहां पर हमले करते ही रहेंगे। कर्नल दत्ता कहते हैं इस बड़ी वजह के साथ-साथ अमेरिका में उनके राष्ट्रपति का सैनिकों की लगातार हो रही शहादत से भारी विरोध भी पैदा हो गया है। यही कुछ वजह है जिसके चलते अमेरिका को एक बार फिर से यह सोचना पड़ रहा है कि अफगानिस्तान की जमीन को अगर छोड़ा जाए तो कितने दिनों के लिए छोड़ा जाए। क्योंकि बहुत ज्यादा दिनों तक अफगानिस्तान की जमीन को ऐसे ही छोड़ देने से आतंकी संगठन न सिर्फ पनपेंगे बल्कि बड़े देशों को निशाने पर लेते रहेंगे। इसलिए पेंटागन एक बार फिर से इस तैयारी में है कि अफगानिस्तान की धरती पर बीस साल पहले शुरू किए गए अभियान को उसके अंजाम तक पहुंचाया जाए। क्योंकि अभी के हालात में अमेरिका का मिशन न सिर्फ आधा-अधूरा है बल्कि नाकाम भी है।