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महाराष्ट्र में ‘अर्बन माओवादी’ का जाल: सरकार ने हाईकोर्ट में बताया क्यों लाया गया खास कानून? गिनाए 64 संगठन
Wed, 07 Oct 2026 10:13 AM IST
प्रशांत तिवारी
पीटीआई, मुंबई
पीटीआई, मुंबई
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Wed, 07 Oct 2026 10:13 AM IST
सार
महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में MSPSA कानून का बचाव करते हुए कहा है कि राज्य “अर्बन माओवादी” गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया है और यहां 64 सक्रिय फ्रंटल संगठन हैं, जो देश में सबसे ज्यादा हैं। सरकार के मुताबिक, इन्हीं गतिविधियों से निपटने के लिए यह कानून जरूरी है।
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सीएम देवेंद्र फडणवीस
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा है कि राज्य अब 'अर्बन माओवादी' गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया है। सरकार के मुताबिक, महाराष्ट्र में ऐसे 64 सक्रिय फ्रंटल संगठन काम कर रहे हैं, जो देश में सबसे ज्यादा हैं। इसी बढ़ती गतिविधि से निपटने के लिए महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा कानून लाया गया है।
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'कानून की जरूरत इसलिए पड़ी'
राज्य सरकार ने मंगलवार को बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा कि महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा कानून का मकसद गैरकानूनी, विध्वंसक और उग्रवादी गतिविधियों को रोकने और उनसे निपटने के लिए एक मजबूत कानूनी व्यवस्था तैयार करना है। यह हलफनामा MSPSA की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं के जवाब में दाखिल किया गया है।
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‘अर्बन माओवादी’ नेटवर्क का बढ़ता दायरा चिंता का विषय
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि राज्य में “अर्बन माओवादी” नेटवर्क की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। उसके मुताबिक, गैरकानूनी और विध्वंसक गतिविधियों से निपटने के लिए एक विशेष कानूनी ढांचे की जरूरत महसूस हुई। सरकार ने दावा किया कि महाराष्ट्र “अर्बन माओवादी गतिविधियों का फोकल प्वाइंट” यानी प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।
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देश में सबसे ज्यादा 64 फ्रंटल संगठन होने का दावा
सरकार ने गृह मंत्रालय से जुटाए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि महाराष्ट्र में 64 सक्रिय फ्रंटल संगठन काम कर रहे हैं। सरकार के मुताबिक, यह संख्या देश के किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा है। इसी आधार पर राज्य सरकार ने कहा कि हालात से निपटने के लिए विशेष कानून जरूरी है।
'आजादी और सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी'
हलफनामे में सरकार ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य मौलिक अधिकारों और राज्य की उस जिम्मेदारी के बीच संतुलन कायम करना है, जिसके तहत उसे सार्वजनिक व्यवस्था और देश की अखंडता की रक्षा करनी होती है। सरकार का कहना है कि कानून इसी संतुलन को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
कांग्रेस, CPI और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दी चुनौती
महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएं कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दायर की हैं। याचिकाकर्ताओं ने कानून के प्रावधानों और सरकार को दिए गए अधिकारों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मुख्य न्यायाधीश एम. सी. त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने मंगलवार को याचिकाकर्ताओं को सरकार के हलफनामे पर अपना जवाब यानी rejoinder दाखिल करने के लिए समय दे दिया। अब याचिकाकर्ता सरकार के दावों और कानून के पक्ष में दिए गए तर्कों का जवाब रखेंगे।
'याचिकाकर्ताओं को सीधा कानूनी नुकसान नहीं हुआ'
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट से सभी याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है। सरकार का तर्क है कि याचिकाकर्ताओं को इस कानून से कोई सीधा कानूनी नुकसान नहीं हुआ है। इसी आधार पर सरकार ने उनकी याचिकाओं की स्वीकार्यता पर भी सवाल उठाया है।
पिछले साल विधानसभा से पास हुआ था कानून
MSPSA को राज्य विधानसभा ने पिछले साल जुलाई में पारित किया था। इसके बाद दिसंबर में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस कानून को मंजूरी दी। इस कानून का उद्देश्य वामपंथी उग्रवादी संगठनों या उनसे मिलते-जुलते संगठनों की कुछ गैरकानूनी गतिविधियों को प्रभावी तरीके से रोकना है।
कानून में चार तरह के अपराधों पर सजा का प्रावधान
कानून में चार तरह के अपराधों के लिए किसी व्यक्ति को सजा दी जा सकती है। इनमें किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य होना, संगठन का सदस्य न होते हुए भी उसके लिए पैसा जुटाना, उसके कामकाज में मदद करना या कोई गैरकानूनी गतिविधि करना शामिल है।
सरकार किसी संगठन को घोषित कर सकती है ‘गैरकानूनी’
MSPSA के तहत राज्य सरकार को किसी संदिग्ध संगठन को “गैरकानूनी संगठन” घोषित करने का अधिकार दिया गया है। कानून के इसी प्रावधान को लेकर भी याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई है।
'सरकार को बहुत ज्यादा अधिकार'
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून कार्यपालिका को संगठनों पर प्रतिबंध लगाने और उनकी संपत्तियां जब्त करने जैसी व्यापक शक्तियां देता है। उनका आरोप है कि “गैरकानूनी गतिविधि” और “गैरकानूनी संगठन” की परिभाषाएं काफी अस्पष्ट और जरूरत से ज्यादा व्यापक हैं, जिससे इन शक्तियों का मनमाने तरीके से इस्तेमाल हो सकता है।
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क्या है पूरे विवाद का केंद्र?
एक तरफ महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि राज्य में बढ़ती “अर्बन माओवादी” गतिविधियों और 64 सक्रिय फ्रंटल संगठनों के मद्देनजर यह कानून सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के लिए जरूरी है। दूसरी तरफ कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इसके प्रावधान सरकार को जरूरत से ज्यादा और मनमाने अधिकार देते हैं। अब बॉम्बे हाईकोर्ट में इसी सवाल पर आगे सुनवाई होगी।