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संघ और वीएचपी ने क्यों अप्रैल तक छोड़ा राम मंदिर का मुद्दा, यहां पढ़िए इसकी वजह

Thu, 07 Feb 2019 03:14 PM IST
अजय सिंह अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अजय सिंह Updated Thu, 07 Feb 2019 03:14 PM IST
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Why RSS and VHP left the Ram temple issue
राम मंदिर

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद ने एलान कर दिया है कि वह राम मंदिर आंदोलन को अगले छह महीने के लिए स्थगित कर रहे हैं। इसी के साथ इस बात पर अटकलबाजी शुरू हो गई कि पिछले छह महीने से जो आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद लगातार राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने या अध्यादेश लाने के लिए सरकार पर दबाव बनाये हुए थे, वह अचानक इससे पीछे क्यों हट गए? इस सवाल का जवाब जानने से पहले थोड़ी देर के लिए पिछले लोकसभा चुनाव के समय की एक घटना का जिक्र कर लेना अच्छा रहेगा।

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हर चुनाव के पहले राजनीतिक दल जनता को लुभाने के लिए अपने चुनावी घोषणा पत्र में कुछ वायदे करते हैं, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान का पहला चरण बीत जाने के बाद भी भाजपा ने अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी नहीं किया था। वजह थी पार्टी के भीतर ही मंदिर मुद्दे पर आम राय का न बनना। पार्टी के वरिष्ठ नेता यह तय नहीं कर पा रहे थे कि घोषणा पत्र में राममंदिर मुद्दे को कितना महत्त्व दिया जाए।
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बताया जाता है कि मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता घोषणा पत्र में राम मंदिर को प्रमुखता से स्थान देना चाहते थे, जबकि उसके पूर्व ही पार्टी अधिवेशन में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किये जा चुके नरेंद्र मोदी इस मुद्दे को ज्यादा अहमियत देने के पक्ष में नहीं थे।
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चर्चा तो यहां तक है कि एक बार पार्टी के घोषणा पत्र को अंतिम रूप दे दिया गया था, और इसे प्रेस के बीच जारी करने का कार्यक्रम भी बना लिया गया था, लेकिन जब घोषणा पत्र की कॉपी नरेंद्र मोदी के सामने आई तो वे नाखुश हो गए। उनके दबाव में चुनाव समिति की दोबारा बैठक हुई और राममंदिर मुद्दे को आगे से हटाकर घोषणा पत्र के बिलकुल अंतिम पृष्ठ पर दो लाइन में समेट दिया गया।

बताया जाता है कि पार्टी नेताओं के बीच इस मुद्दे पर मचा घमासान पार्टी की आंतरिक राजनीति का परिणाम थी। मोदी विरोधी खेमा घोषणा पत्र में मंदिर मुद्दा डालकर मोदी के लगातार बढ़ते जनसमर्थन को मंदिर मुद्दे के नाम पर कुछ रोकना चाहता था, तो वहीं मोदी अपने हाथ आये अवसर को अयोध्या की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहते थे।

इसके बाद वही हुआ जो नरेंद्र मोदी चाहते थे। इस बात को भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि बात-बात पर किसी न किसी मंदिर घूमने वाले मोदी अभी तक अयोध्या में भगवान राम के दर्शन करने नहीं गए हैं।आलोचकों का कहना है कि यह बेवजह नहीं है। चतुर राजनेता मोदी अयोध्या जाकर किसी विवाद को तूल नहीं देना चाहते हैं।

बताया जाता है कि नरसिंहा राव के प्रधानमंत्री रहते हुए भी एक बार दोनों पक्ष इस मुद्दे के हल के करीब पहुंच गये थे, लेकिन इस मुद्दे की राजनीतिक संभावनाओं के चलते संघ परिवार के ही कुछ लोग इसके आड़े आ गये थे और राम मंदिर मुद्दे को हल होने नहीं दिया गया था।

मौजूदा चुनावी समीकरण में बाधा हो सकता है राम मंदिर

वर्तमान में केंद्र सरकार और भाजपा भले ही इस बात के दावे कर रहे हों कि इस बार वे पिछले चुनाव के मुकाबले ज्यादा बड़े बहुमत के साथ सरकार बनायेंगे, लेकिन जमीनी स्थिति देखकर वे भी चुनाव परिणाम के प्रति आशंकित हैं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम ने इतना साफ कर दिया है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को तगड़ा झटका लग सकता है।

नरेंद्र मोदी को संसद पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले उत्तर प्रदेश में भी सपा-बसपा के गठबंधन से पार्टी को बड़ा झटका लगने की आशंका जताई जा रही है। गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी मुश्किल से अपनी इज्जत बचा सकी थी।

महाराष्ट्र में भी भाजपा आज 2014 की स्थिति में नहीं है। ऐसे में पूरी हिंदी पट्टी में पार्टी का कमजोर होना तय माना जा रहा है। और अगर ऐसा होता है तो पार्टी जादुई आंकड़े 272 से कुछ पीछे रुक सकती है। इसके बाद उसे सरकार बनाने के लिए एनडीए का कुनबा बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। माना जा रहा है कि अपने-अपने वोट बैंक की मजबूरियों के कारण एनडीए खेमे के ही कई दल राममंदिर मुद्दे को ज्यादा तूल दिए जाने की स्थिति में भाजपा से बिदक सकते हैं।


पार्टी के एक शीर्ष नेता के मुताबिक अगर भाजपा राम मंदिर मुद्दे पर कानून बनाने की कोशिश करती, या अध्यादेश लाने की तरफ कदम बढ़ती तो यह स्थिति अभी ही बन जाती। नीतीश कुमार हों या रामविलास पासवान, राम दास आठवले हों या राजभर, मंदिर मुद्दा शिवसेना को छोड़ किसी भी गैर भाजपाई दल को मंदिर मुद्दा सूट नहीं करता। लिहाजा, चुनावी लाभ-नुकसान का आकलन कर संघ परिवार ने इसे ठंडे बस्ते में डालना ही ठीक समझा है।

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