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गर्मी का कैलेंडर क्यों बदल रहा?: अब अप्रैल-अक्तूबर भी तपेंगे, दुनिया की आधी जमीन पर बढ़ा गर्मी का मौसम

Sat, 12 Sep 2026 08:02 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Sat, 12 Sep 2026 08:02 PM IST
सार

गर्मी अब सिर्फ मई से अगस्त तक का मौसम नहीं रह गई है। दुनिया की करीब आधी जमीन पर अत्यधिक गर्मी का मौसम लंबा हुआ है। कहीं गर्मी अक्तूबर तक खिंच रही है, तो उत्तर-पश्चिम भारत में वसंत की ओर गर्म दिनों का विस्तार हुआ है। 45 साल के आंकड़ों में यह बदलाव सामने आया है। ऐसे में सवाल है कि जब गर्मी का समय ही बदल रहा है, तो क्या अप्रैल से अक्तूबर तक हीट अलर्ट और बचाव की तैयारी करनी होगी। आइए, सबकुछ विस्तार से समझते हैं...

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Why Is the Heat Season Getting Longer? Extreme Heat Now Spreads Across April to October
गर्मी का कैलेंडर बदल रहा है... - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

गर्मी अब सिर्फ मई, जून, जुलाई और अगस्त तक सीमित नहीं रह गई है। दुनिया के कई हिस्सों में अत्यधिक गर्म दिनों का सिलसिला गर्मियों की पारंपरिक सीमा से बाहर निकल रहा है। कहीं गर्मी शरद ऋतु तक खिंच रही है, तो कहीं वसंत में ही तेज गर्मी दस्तक दे रही है। यानी अप्रैल से अक्तूबर तक गर्मी का दायरा बढ़ता दिखाई दे रहा है। 45 साल के वैश्विक मौसम आंकड़ों के नए विश्लेषण में सामने आया है कि दुनिया की करीब आधी भूमि पर अत्यधिक गर्मी का मौसम पहले के मुकाबले लंबा हो चुका है। उत्तर-पश्चिम भारत भी उन इलाकों में है, जहां गर्म दिनों का विस्तार वसंत की ओर ज्यादा हुआ है।
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45 साल के आंकड़ों में गर्मी को लेकर क्या बड़ा बदलाव दिखा?

नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज की कैथरीन इवानोविच और उनके सहयोगियों ने 1980 से 2024 तक के वैश्विक जलवायु आंकड़ों का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने 1980 के दशक में दर्ज अत्यधिक गर्म दिनों की तुलना 2015 से 2024 के आंकड़ों से की। अध्ययन के मुताबिक, करीब 50 फीसदी वैश्विक भूमि क्षेत्र में अत्यधिक शुष्क गर्मी का मौसम लंबा हुआ। वहीं करीब 48 फीसदी क्षेत्र में आर्द्र गर्मी का मौसम भी बढ़ा। यानी समस्या केवल यह नहीं है कि गर्मी ज्यादा तेज हो रही है, बल्कि गर्मी के आने और रहने का समय भी बदल रहा है।
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क्या दुनिया के हर हिस्से में गर्मी एक ही तरह बढ़ रही है?

  • गर्मी के मौसम में यह बदलाव हर जगह एक जैसा नहीं है। पश्चिमी अमेरिका, पूर्वी चीन, उत्तरी अफ्रीका और पूर्वी यूरोप में अत्यधिक गर्मी का विस्तार पुराने गर्मी के मौसम के बाद यानी शरद ऋतु की ओर ज्यादा हुआ। इसके उलट पश्चिमी यूरोप, दक्षिणी अफ्रीका और उत्तर-पश्चिम भारत में वसंत की ओर गर्म दिनों का विस्तार ज्यादा देखा गया।
  • पूर्वी रूस के कुछ हिस्सों में इसका उल्टा असर दिखाई दिया और वहां अत्यधिक गर्मी का मौसम छोटा हुआ। वैज्ञानिकों ने हर क्षेत्र में वहां के अत्यधिक गर्म दिनों के आधार पर अलग-अलग हीट सीजन तय किया और फिर 1980 के दशक की तुलना में हाल के वर्षों में इसकी सीमा में आए बदलाव को देखा।

उत्तर-पश्चिम भारत के लिए यह बदलाव क्यों अहम है?

उत्तर-पश्चिम भारत उन क्षेत्रों में है, जहां अत्यधिक गर्म दिनों का विस्तार वसंत की ओर ज्यादा हुआ है। इसका मतलब है कि सामान्य गर्मी के मौसम से पहले ही तेज गर्मी वाले दिन बढ़ सकते हैं। अप्रैल में अचानक अत्यधिक गर्मी पड़ने पर शरीर को गर्म मौसम के अनुसार ढलने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। यही वजह है कि मौसम के सामान्य कैलेंडर से बाहर पड़ने वाली गर्मी स्वास्थ्य के लिहाज से ज्यादा परेशानी पैदा कर सकती है। भारत जैसे देश में इसका असर लोगों की दिनचर्या के साथ खेती, पानी और गर्मी से बचाव की तैयारियों पर भी पड़ सकता है।

क्या केवल तापमान बढ़ना ही इसके पीछे की वजह है?

अध्ययन का अहम निष्कर्ष यह है कि गर्मी के मौसम में हुए बदलाव को केवल औसत तापमान बढ़ने से नहीं समझाया जा सकता। वैज्ञानिकों ने यह भी जांचा कि अगर पुराने मौसम में केवल औसत तापमान के बराबर बढ़ोतरी कर दी जाए, तो अत्यधिक गर्म दिनों का वितरण कैसा होगा। करीब 80 फीसदी भूमि क्षेत्र में वास्तविक बदलाव और केवल तापमान बढ़ने वाले अनुमान के बीच अंतर मिला। कई जगह वास्तविक बदलाव अनुमान से उलटी दिशा में था। शोधकर्ताओं ने नमी में बदलाव, भूमि उपयोग और बड़े स्तर पर बदलते मौसम के पैटर्न को इसके संभावित कारण माना है।

अप्रैल और अक्तूबर की गर्मी शरीर के लिए कितनी मुश्किल हो सकती है?

मौसम से बाहर पड़ने वाली अत्यधिक गर्मी स्वास्थ्य के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकती है। अप्रैल में अचानक तेज गर्मी पड़ने पर शरीर अभी गर्म मौसम के लिए तैयार नहीं हुआ होता। दूसरी तरफ अक्तूबर तक गर्मी खिंचने पर शरीर कई महीनों की गर्मी के तनाव से पहले ही गुजर चुका होता है। फीनिक्स इसका एक उदाहरण है। 2024 में वहां लगातार 113 दिन तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। अक्तूबर  में लगातार 21 दिन रिकॉर्ड गर्मी दर्ज हुई। इससे पता चलता है कि अत्यधिक गर्मी अब गर्मी के पारंपरिक महीनों तक सीमित नहीं रह गई है।

गर्मी से बचाव के लिए प्रशासन को क्या बदलना होगा?

शोधकर्ताओं के मुताबिक गर्मी से बचाव की व्यवस्थाएं केवल पारंपरिक गर्मियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अगर वसंत में ही अत्यधिक गर्मी शुरू हो रही है या शरद ऋतु तक जारी रह रही है, तो जरूरत के मुताबिक अप्रैल और अक्तूबर में भी हीट अलर्ट, कूलिंग सेंटर और सार्वजनिक पूल जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी पड़ सकती हैं। प्रशासन को यह देखना होगा कि किस इलाके में अत्यधिक गर्मी कब शुरू हो रही है और कब तक रह रही है। यानी पुराने हीट कैलेंडर की जगह स्थानीय मौसम के बदलाव के हिसाब से तैयारी करनी पड़ सकती है।

शुष्क और आर्द्र गर्मी में क्या अंतर है?

  • करीब 50 फीसदी वैश्विक भूमि पर अत्यधिक शुष्क गर्मी का मौसम लंबा हुआ।
  • करीब 48 फीसदी भूमि पर आर्द्र गर्मी का मौसम बढ़ा।
  • उत्तर-पश्चिम भारत में गर्म दिनों का विस्तार वसंत की ओर ज्यादा हुआ।
  • पश्चिमी अमेरिका, पूर्वी चीन, उत्तरी अफ्रीका और पूर्वी यूरोप में गर्मी का विस्तार शरद ऋतु की ओर ज्यादा देखा गया।
  • पूर्वी रूस के कुछ हिस्सों में अत्यधिक गर्मी का मौसम छोटा हुआ।

शुष्क गर्मी का असर फसलों और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। वहीं आर्द्र गर्मी में इंसानी शरीर के लिए पसीने के जरिए खुद को ठंडा करना मुश्किल हो जाता है। अगर अत्यधिक गर्मी के साथ दूसरी आपदाएं, जैसे जंगल की आग, भी जुड़ जाएं तो खतरा और बढ़ सकता है।


वैज्ञानिक अब आगे क्या पता लगाएंगे?

वैज्ञानिक अब जलवायु मॉडल की मदद से यह समझने की कोशिश करेंगे कि बदलते गर्मी के मौसम में जलवायु परिवर्तन की भूमिका कितनी है और क्षेत्रीय मौसम के पैटर्न का योगदान कितना है। इसके लिए अलग-अलग इलाकों में अत्यधिक गर्म दिनों के समय और उनकी दिशा में हुए बदलाव को समझना जरूरी है। 1980 के दशक और हाल के वर्षों के आंकड़ों की तुलना ने पहले ही यह संकेत दिया है कि गर्मी का मौसम कई जगह अपनी पुरानी सीमा से बाहर निकल रहा है। ऐसे में आने वाले समय में गर्मी की तैयारी भी केवल मई से अगस्त तक सीमित रखने के बजाय पूरे बदलते मौसम को ध्यान में रखकर करनी पड़ सकती है।

क्या अब अप्रैल से अक्तूबर तक बदलना होगा गर्मी का कैलेंडर?

दुनिया के करीब आधे भू-भाग में अत्यधिक गर्मी के मौसम के लंबा होने की तस्वीर यह सवाल खड़ा करती है कि गर्मी को देखने का पुराना तरीका अब कितना कारगर है। कहीं गर्मी शरद ऋतु तक पहुंच रही है और कहीं वसंत में ही तेज गर्मी शुरू हो रही है। उत्तर-पश्चिम भारत में भी वसंत की ओर गर्मी का विस्तार ज्यादा देखा गया है। इसका मतलब है कि गर्मी से बचाव की तैयारी को भी बदलते मौसम के साथ बदलना होगा। अब सवाल केवल यह नहीं है कि गर्मी कितनी पड़ेगी, बल्कि यह भी है कि गर्मी कब शुरू होगी और कब खत्म होगी।
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