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Gajak: सर्दियों में क्यों ठंडा है गजक-रेवड़ी का कारोबार? डिमांड में आ रही 30-40 फीसदी की कमी
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गजक-रेवड़ी के कारोबार में आई गिरावट
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अमर उजाला
विस्तार
सर्दी के दस्तक देते ही और ठंड का अहसास होते ही बाजारों में स्वादिष्ट और पारंपरिक मिठाइयों का चलन बढ़ जाता है। जाड़े के मौसम के साथ ही गजक, रेवड़ी और तिल-गुड़ पट्टी की दुकानों पर लोगों की भीड़ जमा होने लगती है। रेवड़ी और गजक के स्वाद से सर्दी के मौसम का मजा दोगुना हो जाता है। इसका कुरकुरापन और गुड़ की मिठास दिल को लुभाती है, और इसे खाते ही सर्दी से राहत मिलती है। लेकिन इस बार की सुस्त सर्दियों ने रेवड़ी-गजक के बाजार को फीका कर दिया है। दुकान जरुर खुली हैं,मगर कारोबार ठंडा है। व्यापारियों का कहना है कि, जाड़ा शुरू होने से पहले नवम्बर और दिसम्बर में सैकड़ों ऑर्डर एडवांस में रहते थे, लेकिन इस बार तो इनकी संख्या कम है। पिछले सीजन की तुलना से इस वर्ष कारोबार 30-40 फीसदी कम है। हालांकि ठंड बढ़ने के साथ ही रेवड़ी, गजक और चिक्की की ब्रिकी में तेजी आने की उम्मीद है।मध्य प्रदेश के इंदौर में करीब 90 वर्षों से गजक का कारोबार कर रहे शीतल गजक के संचालक सन्नी राज सैनी ने अमर उजाला से कहा, हमारी दुकान में नवरात्रि के बाद से ही गजक बनाने की तैयारियां शुरु हो जाती है। हम ऑर्डर बुक करना शुरू कर देते है। हमारी गजक भारत के अलावा दुबई, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचती है। बॉलीवुड एक्टर सलमान खान, शाहरुख खान, सोनू सूद, कैलाश खेर सहित कई नेता भी इसके दीवाने हैं। गजक का सीजन अक्टूबर से लेकर जनवरी तक होता है। हमारे यहां थाल गजक के अलावा 60 तरह की गजक मिलती है। इनकी कीमत 360 रुपए किलो से लेकर 1200 रुपए तक होती है।
सैनी बताते हैं कि, हम क्वालिटी को मेंटेन करने के लिहाज से ग्राहकों की डिमांड पर ही गजक तैयार करते हैं। एक दिन में 300 से 400 किलो तक गजक तैयार होती है। एक बार में इससे ज्यादा गजक इसलिए बनाते है क्योंकि इससे गजक का टेस्ट बिगड़ जाता है। सर्दियों के मौसम में हमारी दुकान में गजक की डिमांड चार गुना तक बढ़ जाती है। डिमांड इतनी होती है कि कारखाने से दुकान आते ही थोड़े ही समय में पूरी गजक बिक जाती है। हालांकि ठंड पड़ने में हो रही देरी के कारण इस बार कारोबार सुस्त नजर आ रहा है। पिछली बार के सीजन की तुलना में अभी कारोबार 30-40 प्रतिशत कम हैं। क्योंकि इस व्यवसाय का सीधा जुड़ाव ठंड से होता है। इस बार दिसंबर आने के बाद भी अभी कड़ाके की ठंड नहीं आई है। क्योंकि गजक, तिल और गुड़ से बनी यह मिठाई न केवल स्वाद में लाजवाब होती है, बल्कि सेहत के लिए अच्छी होती है। क्योंकि तासीर गर्म होती है।
हरियाणा स्थित रोहतक के गुलाब स्वीट्स के प्रबंधक सतवीर सिंह अमर उजाला से चर्चा में कहते है, सर्दी के मौसम में खानपान के जरिए ठंड के असर को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। तिल, गुड़ और मूंगफली की तासीर गर्म होती है। इसलिए इस मौसम में लोग गुनगुनी धूप में बैठक कर इनसे बनी चीजों को खाना पसंद करते हैं। इससे शरीर में गर्मी भी बनी रहती है। हालांकि इस बार दिल्ली,हरियाणा समेत उत्तर भारत में ठंड का प्रकोप नहीं दिख रहा है। इसलिए हमारा कारोबार भी थोड़ा सुस्त चल रहा है। पिछले साल की तुलना में अभी कारोबार में तेजी नहीं आई है। दिसंबर में ठंड के चलते रेवड़ी-गजक की डिमांड खूब रहती है। लेकिन इस बार दिसंबर में ठंड नजर ही नहीं आ रही है।
सतवीर सिंह कहते कि, गजक,रेवड़ी तैयार करने के लिए कारीगर सितंबर से आने लगते है। अधिकांश कारीगर एमपी-यूपी के होते है। जैसे जैसे सीजन बढ़ता है। करागीरों की संख्या भी बढ़ा देते है। हम हर रोज करीब 2 हजार किलो तैयार करते हैं। लेकिन इस बार ठंड ज्यादा नहीं है तो गजक-रेवड़ी कम तैयार की जा रही है। हमारी यहां से तैयार गजक-रेवड़ी,तिल लड्डू दिल्ली के अलावा देहरादून, पश्चिमी यूपी, हिमाचल और कश्मीर तक जाते है। हालांकि इस बार आर्डर कम है। लेकिन जैसे ही सर्दी बढ़ेगी तो कारोबार में तेजी आने की उम्मीद है।
वहीं,उत्तर प्रदेश के मेरठ में भी गजक और रेवड़ी का बड़ा करोबार होता है। गुड़, तिल और काजू से बनने वाली यहां की गजक और रेवड़ी देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अपने स्वाद का जलवा बिखेरती हैं। शहर में करीब 500 ऐसी दुकानें हैं, जहां सिर्फ इन्हीं का व्यवसाय किया जाता है। गजक कारोबार से जुड़े एक व्यवसायी ने बताया कि, सर्दियों के सीजन में शहर के प्रमुख पुराने बाजारों में रेवड़ी और गजक की दुकानें सजी होती है। इन दुकानदारों को सर्दी के मौसम का बेसब्री से इंतजार रहता है, क्योंकि सर्दियों में गजक और रेवड़ी की बिक्री ज्यादा होती है। आमतौर पर दिवाली के बाद से ही ब्रिकी बढ़ जाती है। लेकिन इस बार ठंड कम पड़ रही है तो इस बार माहौल सुस्त नजर आ रहा है। लोग गजक तो खरीद रहे है लेकिन क्वांटिटी कम है। गजक बनाने वाले भी स्वीकार करते है कि इसका असली स्वाद कड़ाके की ठंड में ही आता है। दुकानदारों का कहना है कि, मेरठ में एक नहीं बल्कि 55 से अधिक प्रकार की गजक तैयार होती है। इसमें सबसे ज्यादा जिन गजकों की डिमांड रहती है। इनमें मलाई गजक, तिल गजक, गोल गजक, आगरा गजक, चीनी की गजक, गुड़ गजक, चॉकलेट गजक सहित अन्य प्रकार की वैरायटी शामिल है। ये 300 रुपए से लेकर 2000 रुपए किलो तक मिलती है। यहां से मेरठ ही नहीं बल्कि देश भर के विभिन्न कोनों में इसकी सप्लाई होती है।
इसलिए सर्दी में बढ़ जाती है गजक की मांग
दरअसल, तिल गुड़ से बनी गजक का चलन वर्षों पुराना है, लेकिन बदलते समय के साथ गजक बनाने का तरीके और वैरायटी में भी अंतर आया है। पहले गजक के रूप में तिल्ली की रेवडिय़ां, गुड़ व शक्कर की गजक का चलन ज्यादा था। आधुनिकता के जमाने में अब मावा, मूंगफली, घी और काजू से बनी गजक लोगों की पहली पसंद बन रही है। जानकारों के अनुसार गुड़ की गजक को दूध के साथ खाने से ठंड का प्रभाव कम हो जाता है। ठंड के मौसम में तिल्ली की गजक मावे का काम करती है। इनका सेवन न केवल स्वाद बढ़ाता है, बल्कि शरीर को भी अंदर से ताजगी और गर्माहट प्रदान करता है।