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HR Khanna: क्यों सीजेआई संजीव खन्ना के चाचा से नाराज हो गई थीं इंदिरा गांधी? एक फैसले ने नहीं बनने दिया था CJI

Tue, 12 Nov 2024 05:24 AM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Tue, 12 Nov 2024 05:24 AM IST
सार

प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना के दिवंगत चाचा एचआर खन्ना एक समय पर खुद सीजेआई बनने की दौड़ में थे, लेकिन उस समय की इंदिरा गांधी सरकार ने उनकी जगह पर न्यायाधीश एमएच बेग को भारत का प्रधान न्यायाधीश बना दिया था। आपातकाल के दौरान एक महत्वपूर्ण फैसले पर असहमत होने की वजह से एचआर खन्ना को यह पद गंवाना पड़ा था। 

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Why did Indira Gandhi not allow Sanjeev Khanna's uncle HR Khanna to become CJI know all in hindi
सीजेआई संजीव खन्ना और उनके चाचा जस्टिस एचआर खन्ना। - फोटो : ANI/WIKIPEDIA

विस्तार

जस्टिस संजीव खन्ना ने सोमवार को भारत के 51वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। दिल्ली के प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखने वाले जस्टिस संजीव खन्ना तीसरी पीढ़ी के वकील रहे हैं। उनके पिता जस्टिस देव राज खन्ना दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रहे हैं। इतना ही नहीं, जस्टिस संजीव खन्ना के दिवंगत चाचा जस्टिस एचआर खन्ना सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रहे हैं। बता दें कि एक समय पर जस्टिस एचआर खन्ना खुद सीजेआई बनने वाले थे, लेकिन उस समय की इंदिरा गांधी सरकार ने उनकी जगह पर न्यायाधीश एमएच बेग को भारत का प्रधान न्यायाधीश बना दिया था। आपातकाल के दौरान एक महत्वपूर्ण फैसले पर असहमत होने की वजह से एचआर खन्ना को यह पद गंवाना पड़ा था। 

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जब जस्टिस एचआर खन्ना सीजेआई बनते बनते रह गए...
इंदिरा गाधी सरकार में वरिष्ठता के हिसाब से जस्टिस एचआर खन्ना को सीजेआई बनाया जाना था, लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी जगह पर न्यायाधीश एमएच बेग को सीजेआई बना दिया। बता दें कि न्यायाधीश एमएच बेग जस्चिस एचआर खन्ना से वरिष्ठता के क्रम में जूनियर थे। जस्टिस खन्ना इंदिरा सरकार के इस कदम से खासे नाराज भी हो गए थे। इसके विरोध में उन्होंने साल 1977 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा भी दे दिया था। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी इमरजेंसी के दौरान जस्टिस एचआर खन्ना द्वारा एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में दिए गए एक असहमति पूर्ण फैसले के कारण उनसे नाराज थीं। इस मामले में शीर्ष कोर्ट की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को राज्य के हित में निलंबित किया जा सकता है। जस्टिस खन्ना ने इसका विरोध किया था। वहीं, बहुमत का फैसला देने वाले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एएन रे, न्यायमूर्ति एमएच बेग, न्यायमूर्ति वाईवी चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएन भगवती थे। इस मामले को हैबियस कॉर्पस मामले के रूप में भी जाना जाता है। 

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 चुनाव लड़ने का भी मिला न्योता
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शीर्ष अदालत से इस्तीफा देने के बाद जनता पार्टी ने जस्टिस संजीव खन्ना को चुनाव लड़ने का भी न्योता दिया, लेकिन जनता पार्टी के आग्रह को उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद जब 1977 के आम चुनावों में इंदिरा गांधी की हार हुई तब आपातकाल से जुड़े मामलों की जांच करने के लिए बनाए गए पैनल की अध्यक्षता करने के लिए जनता पार्टी सरकार ने उनसे आग्रह किया, लेकिन जस्टिस खन्ना ने इससे भी इनकार कर दिया। बाद में वे 1977 से 1979 तक  विधि आयोग के  अध्यक्ष रहे। हालांकि इस दौरान उन्होंने कोई वेतन नहीं लिया। फिर 1979 में चौधरी चरण सिंह सरकार में वे कानून मंत्री भी बने हालांकि तीन दिनों के भीतर इस्तीफा भी दे दिया। जस्टिस एच आर खन्ना को 1999 में पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया था। जस्टिस एचआर खन्ना की साल 2008 में 95 साल की अवस्था में मृत्यु हो गई। 

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सीजेआई संजीव खन्ना - फोटो : ANI

 अब भतीजे संजीव खन्ना बने देश के प्रधान न्यायाधीश
अब एचआर खन्ना के भतीजे जस्टिस संजीव खन्ना ने देश के 51वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ग्रहण की। जस्टिस खन्ना का कार्यकाल 13 मई, 2025 तक रहेगा। उन्होंने न्यायाधीश बनने से पहले अपने करिअर की शुरुआत 1983 में तीस हजारी कोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस के साथ की थी। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में भी वकालत की और अब अगले छह माह तक देश के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी संभालेंगे।

जस्टिस खन्ना की प्राथमिकता में क्या?
बतौर सीजेआई लंबित मामलों की संख्या घटाना और न्याय प्रदान करने में तेजी लाना उनकी प्राथमिकता में है।  सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहते वह कई ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहे। जस्टिस खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने 26 अप्रैल को ईवीएम में हेरफेर के संदेह को निराधार करार दिया और पुरानी पेपर बैलेट प्रणाली पर वापस लौटने की मांग को खारिज कर दिया।जस्टिस खन्ना पांच न्यायाधीशों की उस पीठ का हिस्सा थे, जिसने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के केंद्र के 2019 के फैसले को बरकरार रखा। जस्टिस खन्ना की पीठ ने ही पहली बार तत्कालीन मुख्यमंत्री केजरीवाल को आबकारी नीति घोटाले के मामलों में लोकसभा चुनाव में प्रचार करने के लिए 1 जून तक अंतरिम जमानत दी थी।

2019 में प्रोन्नत होकर सुप्रीम कोर्ट में रखा कदम
जस्टिस खन्ना को 18 जनवरी 2019 को कॉलेजियम की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट में एलिवेट किया गया। सुप्रीम कोर्ट आने के बाद वे 17 जून 2023 से 25 दिसंबर 2023 तक सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के अध्यक्ष रहे। अभी नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी के कार्यकारी अध्यक्ष और नेशनल ज्यूडिशल एकेडमी भोपाल के गवर्निंग काउंसिल मेंबर हैं। वह अगले साल 13 मई को सेवानिवृत्त होंगे।

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