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CRPF: क्यों चर्चा में हैं मुख्यालय के DIG? कार्यप्रणाली पर उठे सवाल; विजिलेंस रडार पर आए थे 321 कैडर अफसर

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 05 Feb 2026 09:51 PM IST
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Why CRPF headquarters DIG in news 321 cadre officers come under vigilance radar
CRPF - फोटो : Amar Ujala

देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल, 'सीआरपीएफ' के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में अहम पद पर तैनात एक 'डीआईजी' चर्चा में हैं। उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। पिछले साल उनके खिलाफ सीवीसी को दी गई शिकायत ने खलबली मचा दी थी। इस शिकायत में डीआईजी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों में आय से अधिक संपत्ति, सेवा नियमों का उल्लंघन, कथित स्टांप ड्यूटी व जीएसटी चोरी और पद का दुरुपयोग करना शामिल है। उनके कार्यकाल में 321 'कैडर' अफसर, जांच की रडार पर आ गए थे। 

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सूत्रों का कहना है कि इस केस की आहट अब गृह मंत्रालय तक पहुंची है। बल के शीर्ष अफसर से संवेदनशील पद पर लंबे समय से तैनात उक्त अफसर के बने रहने को लेकर सवाल किया गया। इस बाबत बल मुख्यालय के जिम्मेदार अधिकारी से जब बात की गई तो उन्होंने बताया कि उक्त डीआईजी को लेकर ऐसा कुछ नहीं है। वे ईमानदार अधिकारी हैं। उनका पद ही ऐसा है, जहां आलोचना होना सामान्य बात है। आमतौर पर डीआईजी का तय कार्यकाल तीन साल का होता है। उक्त अफसर का कार्यकाल चार वर्ष का हो चुका है। समर चेन ट्रांसफर में उनका तबादला संभव है। बतौर आईजी, उनकी पदोन्नति भी करीब है।
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एक शिकायत ने मचा दिया था हड़कंप 
सूत्रों के अनुसार, गृह मंत्रालय में सीआरपीएफ के शीर्ष अफसर से डीआईजी के मामले को लेकर जानकारी मांगी गई है। उनके पिछले चार वर्षों के कार्यकाल में कई शिकायतों के बावजूद डीआईजी को संवेदनशील पद पर बनाए रखा गया। अमूमन डीआईजी का कार्यकाल तीन वर्ष का रहता है, लेकिन वे चार साल से इस पद पर हैं। पिछले साल एक शिकायत ने बल मुख्यालय में हड़कंप मचा दिया था। उस शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए थे। उक्त डीआईजी के कार्यकाल में 321 से अधिक ग्रुप 'ए' में शामिल कैडर अधिकारियों के खिलाफ बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के झूठी और प्रेरित अनुशासनात्मक जांच शुरू की गई। हालांकि वह शिकायत बेनाम थी, इसलिए उस पर कार्रवाई को लेकर संशय बना रहा। नियमानुसार, अगर शिकायत गुमनाम है या उसे किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से भेजा गया है तो उस पर कार्रवाई नहीं हो सकती। 
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सीवीसी को दी शिकायत में लगे थे ये आरोप 
सीवीसी को भेजी गई 13 पन्नों की शिकायत में जिस डीआईजी का नाम लिखा हुआ था, वे लंबे समय तक 'विजिलेंस' के मामले देख रहे हैं। जो आरोप लगाए गए, उनके मुताबिक, डीआईजी ने कथित तौर पर अपनी पत्नी के नाम गाजियाबाद स्थित क्लासिक रेजीडेंसी में एक प्रीमियम 3 बीएचके फ्लैट तथा बिहार के मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर में दो आवासीय प्लॉट खरीदे हैं। इन संपत्तियों की वास्तविक कीमत लगभग 1.20 करोड़ रुपये बताई गई है। पंजीकरण के समय कीमत को जानबूझकर बहुत कम दर्शाया गया है। इसका मकसद, स्टांप ड्यूटी और जीएसटी से बचना रहा है। आरोप यह भी है कि उक्त निवेश उनके ज्ञात आय स्रोतों से संभव नहीं था। इसके लिए कोई बैंक ऋण भी नहीं लिया गया। हालांकि बल के एक जिम्मेदार अधिकारी ने उक्त डीआईजी को ईमानदार करार दिया है। 

लाखों रुपये का कमीशन बनाने का आरोप 
शिकायत में कहा गया कि उक्त अधिकारी ने रियल एस्टेट सौदों में बिचौलिये की भूमिका निभाकर भी लाखों रुपये का कमीशन बनाया। इस राशि को पत्नी और बेटों के नाम बैंक खातों व एफडीआर में जमा करने की बात कही गई है। ठेकेदारों से कमीशन लेना, शिकायत में यह कथित आरोप भी लगा है। इससे जो नकदी जमा हुई, उससे महंगे आभूषण भी खरीदे गए। यह सूचना, सेवा नियमों के तहत विभाग को नहीं दी गई। डीआईजी पर आधिकारिक पद का जानबूझकर दुरुपयोग, प्राधिकार का छद्म प्रयोग, सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965, सीवीसी सतर्कता मैनुअल और पीसीए, 1988 के तहत स्थापित मानदंडों का बार-बार उल्लंघन करने, कमांडेंट और डीआईजीपी रैंक के सीआरपीएफ के ग्रुप 'ए' अधिकारियों को निराश, असहाय और लाचार बनाकर अवैध वित्तीय संतुष्टि के माध्यम से व्यक्तिगत संवर्धन, इस तरह के गंभीर आरोप लगाए गए थे। 

स्टांप शुल्क से बचने का प्रयास 
शिकायत में लिखा था कि डीआईजी, क्लासिक रेजीडेंसी, राज नगर एक्सटेंशन, गाजियाबाद के फ्लैट में रह रहे हैं। शिकायत में फरीदाबाद के सेक्टर 17 स्थित एक फ्लैट, जिसकी कीमत 73 लाख रुपये थी, 2015-16 में यह सौदा हुआ था, यह जिक्र भी किया गया। आरोप है कि बाद में इसे बिक्री विलेख उप क्षेत्रीय कार्यालय- सदर-III, गाजियाबाद द्वारा पंजीकृत किया गया था। उक्त फ्लैट का कम मूल्यांकन करके 29,25,800/- रुपये में दो उद्देश्यों से इसका पंजीकरण कराया गया था। पहला, स्टांप शुल्क से बचने के लिए और दूसरा, इस संपत्ति की खरीद में अपनी कथित अवैध कमाई का उपयोग करने के लिए। सीसीएस (आचरण) नियम, 1964 के नियम 18 के तहत उक्त अधिकारी ने अपने विभाग को सूचित किया है कि उक्त संपत्ति एक आवासीय फ्लैट होने के नाते उन्होंने अपनी पत्नी के साथ संयुक्त रूप से 29,25,800 रुपये में खरीदी है, जबकि वास्तविक खरीद मूल्य 73,00,000 रुपये है। 

शिकायत में जीएसटी चोरी का भी आरोप 
शिकायत में यह भी लिखा था कि उन्होंने फ्लैट की बुकिंग के समय मेसर्स श्री एनर्जी डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ इस फ्लैट की खरीद के लिए बिल्डर के साथ एक समझौता किया था। उस अवधि के दौरान उन्होंने बिल्डर को बाजार मूल्य और रजिस्ट्री मूल्य के अंतर की राशि नकद में चुकाई थी। यह न केवल एनसीआर में, बल्कि पूरे देश में हर खरीदार और हर बिल्डर द्वारा अपनाई जाने वाली एक आम चाल है। शिकायत के अनुसार, प्रीमियम फ्लैट की इस खरीद पर 'स्टाम्प ड्यूटी कर' की भी चोरी हुई है। शिकायत में जीएसटी चोरी का भी आरोप लगा था। वजह, क्योंकि यह फ्लैट उक्त अधिकारी द्वारा अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल्डर/डेवलपर मेसर्स श्री एनर्जी डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड, मकान संख्या 419-421, सेक्टर-17, फरीदाबाद, हरियाणा के पते पर किए गए समझौते के अनुसार बनाया गया है। स्टाम्प ड्यूटी चोरी के लिए रजिस्ट्रार स्टाम्प उत्तर प्रदेश के पास और इस अधिकारी द्वारा इस फ्लैट की खरीद में कीमत का कम मूल्यांकन करके जीएसटी चोरी के लिए जीएसटी आयुक्त, गाजियाबाद के पास अलग से शिकायत दर्ज कराने की बात कही गई। 

भ्रष्ट तरीकों व अघोषित आय के स्रोत 
शिकायत के मुताबिक, बिहार में भी दो अन्य अचल आवासीय भूखंड खरीदे गए थे। इन दोनों संपत्तियों में 47 लाख रुपये का निवेश किया गया है। शिकायत के अनुसार, उनकी पत्नी एक गृहिणी हैं। उनके दो बेटे हैं। उनके पास भी आय के स्वतंत्र स्रोत नहीं हैं। उन्होंने उक्त अधिकारी द्वारा 1,20,00,000/- रुपये के उपरोक्त निवेश में एक पैसा भी योगदान नहीं दिया है। ऐसे में यह निवेश पूरी तरह से और विशेष रूप से भ्रष्ट तरीकों व अघोषित आय के स्रोतों से किया गया है। एनसीआर में दो प्लॉट और एक प्रीमियम फ्लैट की निवेश लागत को पूरा करने के लिए उनके द्वारा कोई आवास या कोई अन्य ऋण नहीं लिया गया है। उनका मासिक वेतन और भत्ते इस निवेश को उचित नहीं ठहराते हैं। इस अवधि के दौरान वे नियमित रूप से अपने जीपीएफ खाते में एक लाख रुपये से 12 लाख रुपये तक जमा करा रहे थे। कुछ समय के लिए उन्होंने लाभांश कमाने वाली कंपनियों के शेयर भी खरीदे।  

बैंक खाते की जांच कराने की माँग 
शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया है कि ठेकेदारों से कमीशन के रूप में प्राप्त नकदी उनके बैंक खाते में जमा की गई है। अगर एसबीआई में उनके बैंक खाते की जांच हो तो यह तथ्य सामने आएगा कि उसमें से लगातार कम निकासी हुई है। उनके घरेलू खर्च अज्ञात स्रोतों से पूरे होते हैं। शिकायत में कहा गया है कि उक्त अधिकारी, 'प्रोविजनिंग' विभाग देख रहे थे। उन ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं से कथित तौर पर मोटा कमीशन कमा रहे थे, जिन्हें बल से ठेके दिलाने में अवैध रूप से लाभ पहुंचाया गया था। 

अनुशासनात्मक कार्यवाही का प्रारंभ 
शिकायत में कहा गया कि पिछले चार वर्षों में सीआरपीएफ के 321 से अधिक ग्रुप 'ए' अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही का प्रारंभ होना, इसमें भी उक्त अधिकारी की भूमिका बताई गई। उन्होंने भारत के राष्ट्रपति, जो सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के नियम 12 के अंतर्गत ग्रुप 'ए' अधिकारियों के लिए अनुशासनात्मक प्राधिकारी (डीए) हैं, के अधिकार का गलत इस्तेमाल किया है। वे स्वयं ही ऐसे प्रभार ज्ञापन/नियुक्ति आदेश, आईओ/पीओ और दंड आदेश जारी और हस्ताक्षरित करते हैं, जिन्हें सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 और भारत सरकार (कार्य-संचालन) नियम, 1961 के अंतर्गत गृह मंत्रालय, भारत सरकार के अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित/प्रमाणित किया जाना चाहिए।

आईओ को गुमराह करने का प्रयास 
ग्रुप 'ए' अधिकारी, जो ज्यादातर कमांडेंट या डीआईजीपी रैंक के होते हैं, के खिलाफ प्रारंभिक जांच का आदेश ज्यादातर कमजोर आधार पर दिया जाता है। शिकायत में लिखा था कि कुछ निम्न-श्रेणी के कर्मियों के बयान अपुष्ट दस्तावेजी साक्ष्य बनाने के लिए दबाव डालकर दर्ज किए जाते हैं। ऐसी प्रारंभिक जांचें अनधिकृत तरीके से की जाती हैं जो केंद्रीय सिविल सेवा (सीसीए) नियम, 1965 के नियम 14(2) और सीवीसी सतर्कता नियमावली के अध्याय-5 में दिए गए दिशानिर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है। प्रारंभिक जांच के दौरान, आईओ को सक्रिय रूप से निर्देशित और गुमराह करने का प्रयास किया जाता है। यह उन अधिकारियों को फंसाने के लिए किया जाता है, जिनके खिलाफ पीई शुरु होती है। पीई के दौरान दर्ज किए गए ऐसे झूठे और प्रेरित बयानों के आधार पर, सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के नियम 12 के तहत अनुशासनात्मक प्राधिकारी, जो अध्यक्ष है, से किसी अनुमोदन के बिना ही नियम 14/16 के तहत अधिकारियों को एक औपचारिक आरोप ज्ञापन जारी किया जाता है।

आरोपों को किसी तरह साबित करने की कोशिश 
हमेशा, आरोप ज्ञापन के अनुलग्नक-III (सूचीबद्ध अभियोजन दस्तावेजों की) और अनुलग्नक-IV (अभियोजन गवाह की) की सूचियों को जानबूझकर खुला छोड़ दिया जाता है, जिससे जांच अधिकारी को रिकॉर्ड पर कोई भी साक्ष्य लाने या किसी भी व्यक्ति से गवाह के रूप में पूछताछ करके संबंधित आरोपित अधिकारियों के खिलाफ आरोपों को किसी तरह साबित करने की गैरकानूनी स्वतंत्रता मिल जाती है। ज्यादातर, आरोप ज्ञापन के अनुलग्नक-III और IV में सूचीबद्ध अभियोजन दस्तावेजों की प्रतियां इस स्तर पर सीओ को नहीं दी जाती हैं, भले ही उनके द्वारा ऐसी प्रतियां मांगी जाती हों। इस प्रकार, सीओ को अपने खिलाफ आरोपों को समझे बिना अपना डब्ल्यूएसडी देने के लिए मजबूर किया जाता है। सीओ द्वारा दिया गया ऐसा डब्ल्यूएसडी गृह मंत्री द्वारा निर्णय लेने के लिए कभी भी गृह मंत्रालय को नहीं भेजा जाता है कि क्या डब्ल्यूएसडी स्वीकार्य है या नहीं। यह सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के नियम 12 के नीचे जीआईडी (3) का स्पष्ट उल्लंघन है {जीआई एमएचए ओएम संख्या एफ.39/1/69-स्था.(ए), दिनांक 16 अप्रैल, 1969 द्वारा अधिसूचित}। 

ख़ुद पत्र लिखकर देते थे निर्देश 
शिकायत में लिखा था, ऐसा प्रयास किया गया कि किसी भी तरह से आईओ द्वारा आरोप को सही साबित कर दिया जाए। इसके लिए वह सभी मामलों में आईओ को अपने हस्ताक्षर के तहत अनधिकृत संचार करते थे। इसमें उन्हें आरोपों को साबित करने के लिए सबूत के तौर पर इस या उस कागज को रिकॉर्ड में लेने का निर्देश दिया जाता है। यदि जांच अधिकारी, आरोपों को गलत साबित करता है, तो डीआईजी साहब अनिवार्य रूप से ऐसे जांच अधिकारी को पत्र लिखकर निर्देश देते हैं कि वह उस कागज को रिकॉर्ड पर लेकर जांच अधिकारी के खिलाफ आरोपों को बलपूर्वक साबित करे। इस शर्त के साथ कि इस तरह के अवैध निर्देशों को जांच रिपोर्ट का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, जो कि सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के तहत भी स्वीकृत नहीं है। यदि सीओ अपनी वैध शिकायतों के निवारण के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है, तो उक्त अधिकारी यह सुनिश्चित करता है कि सीआरपीएफ द्वारा आवश्यक जवाबी हलफनामा दायर न किया जाए। अदालती कार्यवाही में अनावश्यक रूप से देरी की जाए। 


विचलित करने वाला पैटर्न 
उक्त अधिकारी द्वारा जारी किए गए आरोप-पत्रों की गहन जांच से उत्पीड़न का विचलित करने वाला पैटर्न सामने आएगा। इसमें कई महिला अधिकारियों का खुलासा होगा, जिन्हें उनके निर्देश पर लगातार सताया गया है। आरोप यह भी है कि जांच प्रक्रिया के दौरान प्रभावित अधिकारियों से कथित धन उगाही की जाती थी। आरोपों के अनुसार, यदि राशि दी जाती थी तो कार्यवाही रद्द कर दी जाती थी। शिकायत में सीवीसी से अनुरोध किया गया था कि मामले की गुप्त और निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि गवाहों और संबंधित व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। शिकायतकर्ता का दावा था कि प्रस्तुत तथ्य रिकॉर्ड और विक्रेताओं से आसानी से सत्यापित किए जा सकते हैं और इसमें न्यूनतम जांच प्रयास की आवश्यकता होगी। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मामला न केवल सीआरपीएफ के भीतर, बल्कि पूरे केंद्रीय बलों की कार्यप्रणाली और आंतरिक अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।

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