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Amarinder Singh: भाजपा में क्यों शामिल हुए अमरिंदर सिंह, पंजाब की सियासत के लिए इसके क्या मायने? जानें
Mon, 19 Sep 2022 06:15 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 19 Sep 2022 06:15 PM IST
सार
कांग्रेस से अलग होने के बाद अमरिंदर ने अलग पार्टी क्यों बनाई थी? क्यों चुनाव से पहले भाजपा से गठबंधन किया? अब पार्टी का विलय करने के लिए क्यों तैयार हो गए हैं? 2024 के आम चुनाव पर अमरिंदर के इस कदम का क्या असर पड़ेगा? आइये जानते हैं...
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कैप्टन अमरिंदर सिंह का राजनीतिक करियर।
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह सोमवार को भाजपा में शामिल हो गए। इसके साथ ही उन्होंने अपनी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस (पीएलसी) का भाजपा में विलय कर दिया। अमरिंदर के साथ उनके बेटे रणइंदर सिंह और बेटी जय इंदर कौर ने भी भाजपा का दामन थाम लिया। हालांकि, उनकी पत्नी परणीत कौर अभी भी कांग्रेस की सांसद हैं। इसी के साथ पंजाब की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ गया है।
कांग्रेस से अलग होने के बाद अमरिंदर ने अलग पार्टी क्यों बनाई थी? क्यों चुनाव से पहले भाजपा से गठबंधन किया? अब पार्टी का विलय करने के लिए क्यों तैयार हो गए हैं? 2024 के आम चुनाव पर अमरिंदर के इस कदम का क्या असर पड़ेगा? आइये जानते हैं...
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कांग्रेस से अलग होने के बाद अमरिंदर ने अलग पार्टी क्यों बनाई थी? क्यों चुनाव से पहले भाजपा से गठबंधन किया? अब पार्टी का विलय करने के लिए क्यों तैयार हो गए हैं? 2024 के आम चुनाव पर अमरिंदर के इस कदम का क्या असर पड़ेगा? आइये जानते हैं...
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कांग्रेस से अलग होने के बाद अमरिंदर ने क्यों बनाई थी अलग पार्टी?
नवंबर 2021 में अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस के अलग होने के बाद नई पार्टी बनाई। उस वक्त केंद्र सरकार ने कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान नहीं किया था। यह एक बड़ी वजह थी जिसने अमरिंदर सिंह को भाजपा में जाने के बजाय अलग पार्टी बनाने का रास्ता दिया। उन्होंने अलग पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस के गठन का एलान दो नवंबर को कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह तय था कि अमरिंदर को कांग्रेस से अलग पार्टी बनाने का कोई खास फायदा नहीं होना था। इसके बावजूद भाजपा के अलावा किसी और पार्टी का दामन थामना उनके लिए आसान नहीं था।
नवंबर 2021 में अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस के अलग होने के बाद नई पार्टी बनाई। उस वक्त केंद्र सरकार ने कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान नहीं किया था। यह एक बड़ी वजह थी जिसने अमरिंदर सिंह को भाजपा में जाने के बजाय अलग पार्टी बनाने का रास्ता दिया। उन्होंने अलग पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस के गठन का एलान दो नवंबर को कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह तय था कि अमरिंदर को कांग्रेस से अलग पार्टी बनाने का कोई खास फायदा नहीं होना था। इसके बावजूद भाजपा के अलावा किसी और पार्टी का दामन थामना उनके लिए आसान नहीं था।
कैप्टन अमरिंदर सिंह
- फोटो : self
बताया जाता है कि कांग्रेस से विवाद के वक्त अमरिंदर सिंह भाजपा में शामिल हो सकते थे। हालांकि, तब करीबी सूत्रों ने दावा किया था कि अमरिंदर ने शर्त रखी है कि केंद्र सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस ले ले और इस कदम का श्रेय कैप्टन को ही दे। हालांकि, भाजपा ने अमरिंदर के कांग्रेस से अलग होने तक ऐसा कोई एलान नहीं किया। चौंकाने वाली बात यह है कि अमरिंदर के अलग पार्टी बनाने के एलान के महज दो हफ्ते बाद ही पीएम नरेंद्र मोदी ने कृषि कानून वापस लेने का एलान कर दिया। इस तरह आखिरकार चुनाव से पहले अमरिंदर सिंह को पंजाब लोक कांग्रेस का गठबंधन भाजपा से कराने में आसानी हुई।
पंजाब चुनाव के छह महीने बाद विलय क्यों?
पीएम नरेंद्र मोदी के साथ कैप्टन अमरिंदर सिंह।
- फोटो : फाइल
1. अमरिंदर की पार्टी के लिए राजनीतिक जमीन ढूंढने में मुश्किल
पंजाब विधानसभा चुनाव में अमरिंदर सिंह की पार्टी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई। पंजाब में एक बड़ा चेहरा होने के बावजूद अमरिंदर ने जिन 28 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, उन सभी को हार मिली। खुद अमरिंदर भी चुनाव हार गए। उनकी पार्टी को महज आधा फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा। वहीं, सहयोगी भाजपा कृषि कानूनों पर विरोध का सामना करने के बावजूद दो सीटें हासिल करने में सफल रही।
2. भाजपा को सिख चेहरे की जरूरत
भाजपा के लिए भी बिना किसी सिख चेहरे के राजनीति को आगे बढ़ाना आसान नहीं है। पार्टी पंजाब में ऐसे नेता को आगे बढ़ाना चाहती है, जिसका सिख समुदाय में बेहतर प्रभाव हो और पंजाब में लोकप्रिय चेहरा हो। अमरिंदर सिंह के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध हैं। जब वह पंजाब के सीएम थे तो उन्होंने ऑन रिकॉर्ड कहा था कि पीएम संपर्क करने पर हमेशा सहयोग करते हैं।
पंजाब विधानसभा चुनाव में अमरिंदर सिंह की पार्टी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई। पंजाब में एक बड़ा चेहरा होने के बावजूद अमरिंदर ने जिन 28 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, उन सभी को हार मिली। खुद अमरिंदर भी चुनाव हार गए। उनकी पार्टी को महज आधा फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा। वहीं, सहयोगी भाजपा कृषि कानूनों पर विरोध का सामना करने के बावजूद दो सीटें हासिल करने में सफल रही।
2. भाजपा को सिख चेहरे की जरूरत
भाजपा के लिए भी बिना किसी सिख चेहरे के राजनीति को आगे बढ़ाना आसान नहीं है। पार्टी पंजाब में ऐसे नेता को आगे बढ़ाना चाहती है, जिसका सिख समुदाय में बेहतर प्रभाव हो और पंजाब में लोकप्रिय चेहरा हो। अमरिंदर सिंह के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध हैं। जब वह पंजाब के सीएम थे तो उन्होंने ऑन रिकॉर्ड कहा था कि पीएम संपर्क करने पर हमेशा सहयोग करते हैं।
कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रणइंदर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
3. बेटे-बेटी के राजनीतिक करियर के लिए संजीवनी
कैप्टन अमरिंदर सिंह दो बार कांग्रेस से पंजाब के मुख्यमंत्री रहे हैं लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि भाजपा में शामिल होने के बाद उनकी क्या भूमिका रहेगी। कैप्टन इस समय 80 साल के हैं। वहीं, भाजपा आमतौर पर 75 से ऊपर के नेताओं को टिकट नहीं देती है। ऐसे में कैप्टन के लिए पंजाब में खुद के लिए किसी तरह की चाहत रखना मुश्किल है। हालांकि, बीते विधानसभा चुनाव में कैप्टन के बेटे रणइंदर सिंह ने भाजपा-पंजाब लोक कांग्रेस के बीच तालमेल बिठाने और टिकटों की बांटवारे में अहम भूमिका निभाई थी। रणइंदर इन चुनावों में पार्टी को फायदा दिलाने या खुद को बड़े नेता के तौर पर स्थापित करने में सफल तो नहीं हुए, लेकिन अमरिंदर के उत्तराधिकारी के तौर पर उनके नाम की चर्चा शुरू हो गई।
अमरिंदर भाजपा में शामिल होने का दांव आजमा कर अपनी बेटी जय इंदर कौर के राजनीतिक करियर को भी बढ़ा सकते हैं। जय इंदर फिलहाल अमरिंदर का राजनीतिक काम संभालती हैं। पंजाब के चुनाव में उनकी भूमिका पहली कतार में थी। ऐसे में माना जा रहा है कि उनकी बेटी को भी भाजपा में कोई महत्वपूर्ण भूमिका मिल सकती है।
कैप्टन अमरिंदर सिंह दो बार कांग्रेस से पंजाब के मुख्यमंत्री रहे हैं लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि भाजपा में शामिल होने के बाद उनकी क्या भूमिका रहेगी। कैप्टन इस समय 80 साल के हैं। वहीं, भाजपा आमतौर पर 75 से ऊपर के नेताओं को टिकट नहीं देती है। ऐसे में कैप्टन के लिए पंजाब में खुद के लिए किसी तरह की चाहत रखना मुश्किल है। हालांकि, बीते विधानसभा चुनाव में कैप्टन के बेटे रणइंदर सिंह ने भाजपा-पंजाब लोक कांग्रेस के बीच तालमेल बिठाने और टिकटों की बांटवारे में अहम भूमिका निभाई थी। रणइंदर इन चुनावों में पार्टी को फायदा दिलाने या खुद को बड़े नेता के तौर पर स्थापित करने में सफल तो नहीं हुए, लेकिन अमरिंदर के उत्तराधिकारी के तौर पर उनके नाम की चर्चा शुरू हो गई।
अमरिंदर भाजपा में शामिल होने का दांव आजमा कर अपनी बेटी जय इंदर कौर के राजनीतिक करियर को भी बढ़ा सकते हैं। जय इंदर फिलहाल अमरिंदर का राजनीतिक काम संभालती हैं। पंजाब के चुनाव में उनकी भूमिका पहली कतार में थी। ऐसे में माना जा रहा है कि उनकी बेटी को भी भाजपा में कोई महत्वपूर्ण भूमिका मिल सकती है।
2024 के आम चुनाव पर अमरिंदर के इस कदम का क्या असर पड़ेगा?
1. पंजाब से बाकी राज्यों की एंटी इन्कंबेंसी की भरपाई
अमरिंदर अब क्यों भाजपा में शामिल हो रहे हैं, इसका सीधा जवाब है- 2024 में होने वाले आम चुनाव। दरअसल, भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में उन राज्यों में सीटें बढ़ाने की कोशिश में है, जहां उसका खास जनाधार नहीं है। उत्तर भारत में पंजाब एक ऐसा राज्य है, जहां भाजपा अब तक बाकी राज्यों की तरह एकतरफा जीत हासिल नहीं कर सकी है। ऐसे में अमरिंदर को पार्टी में लाकर भाजपा 2024 में एंटी-इन्कंबेंसी वाले राज्यों से हारी सीटों की भरपाई करना चाहेगी।
अमरिंदर अब क्यों भाजपा में शामिल हो रहे हैं, इसका सीधा जवाब है- 2024 में होने वाले आम चुनाव। दरअसल, भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में उन राज्यों में सीटें बढ़ाने की कोशिश में है, जहां उसका खास जनाधार नहीं है। उत्तर भारत में पंजाब एक ऐसा राज्य है, जहां भाजपा अब तक बाकी राज्यों की तरह एकतरफा जीत हासिल नहीं कर सकी है। ऐसे में अमरिंदर को पार्टी में लाकर भाजपा 2024 में एंटी-इन्कंबेंसी वाले राज्यों से हारी सीटों की भरपाई करना चाहेगी।
दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मिलने पहुंचे पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह।
- फोटो : Amar Ujala
2. कृषि कानूनों से नाराज सिखों-किसानों को मनाने की कोशिश
कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत राणा गुरजीत सिंह सोढी और सुनील जाखड़ की पंजाब में किसानों पर अच्छी राजनीतिक पकड़ है। किसान भी कैप्टन के निर्णय की सराहना करते रहे हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसानों के दिल्ली आंदोलन में साथ दिया था।
कैप्टन के जरिए भाजपा पंजाब में किसानों एवं सिख वोटरों का दिल जीतने का प्रयास करेगी और साथ ही अगले कुछ माह तक किसान आंदोलन की बाकी रहती मांगों पर कैप्टन के जरिए केंद्र सरकार गौर कर सकती है। वहीं, सूत्रों का ये भी कहना है कि कैप्टन को भाजपा केंद्र में कृषि मंत्री या फिर किसी राज्य का राज्यपाल बना सकती है। हालांकि, भाजपा के अधिकतर बडे़ नेताओं की राय कैप्टन को कृषि मंत्री बनाए जाने की है।
कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत राणा गुरजीत सिंह सोढी और सुनील जाखड़ की पंजाब में किसानों पर अच्छी राजनीतिक पकड़ है। किसान भी कैप्टन के निर्णय की सराहना करते रहे हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसानों के दिल्ली आंदोलन में साथ दिया था।
कैप्टन के जरिए भाजपा पंजाब में किसानों एवं सिख वोटरों का दिल जीतने का प्रयास करेगी और साथ ही अगले कुछ माह तक किसान आंदोलन की बाकी रहती मांगों पर कैप्टन के जरिए केंद्र सरकार गौर कर सकती है। वहीं, सूत्रों का ये भी कहना है कि कैप्टन को भाजपा केंद्र में कृषि मंत्री या फिर किसी राज्य का राज्यपाल बना सकती है। हालांकि, भाजपा के अधिकतर बडे़ नेताओं की राय कैप्टन को कृषि मंत्री बनाए जाने की है।