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Hindi News ›   India News ›   Why Are India's Sugar Exports Declining? Is It El Niño, Ethanol, or Falling Production?

Explainer: क्यों कम हो रहा है भारतीय चीनी का निर्यात; अल नीनो, एथेनॉल या घटता उत्पादन, क्या है असल वजह?

Tue, 23 Jun 2026 10:59 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Tue, 23 Jun 2026 10:59 AM IST
सार

भारत का चीनी निर्यात लगातार घट रहा है, जिसकी वजह सिर्फ उत्पादन में कमी नहीं बल्कि सरकार की एथेनॉल नीति, घरेलू मांग और अल नीनो से जुड़ी मौसम संबंधी चुनौतियां भी हैं। ऐसे में आने वाले वर्षों में दुनिया को भारतीय चीनी कम मिल सकती है और वैश्विक चीनी बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। आइए विस्तार से जानते हैं। 

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Why Are India's Sugar Exports Declining? Is It El Niño, Ethanol, or Falling Production?
चीनी निर्यात घटने की क्या वजह? - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दुनिया के कई देशों को आने वाले वर्षों में भारतीय चीनी कम मिल सकती है। पहली नजर में यह खबर भारत के लिए नकारात्मक लग सकती है, लेकिन पूरी तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल और दिलचस्प है। मामला केवल चीनी उत्पादन में कमी का नहीं है, बल्कि भारत की बदलती ऊर्जा नीति, किसानों की आय, जलवायु जोखिम और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
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आइए जानते हैं कि वैश्विक चीनी उत्पादन में भारत का क्या स्थान है? वर्तमान में चीनी उत्पादन को लेकर आंकड़े क्या बताते हैं? इस सीजन कितना चीनी का उत्पादन हुआ? कौन से राज्यों में सबसे ज्यादा उत्पादन हुआ? अल नीनो ने उत्पादन पर कैसे असर डाला? विशेषज्ञों का क्या कहना है? भारत की एथेनॉल नीति कैसे बदल रही है? ब्राजील की क्या स्थिति है? सरकार क्यों बनाना चाहती है एथेनॉल को वैकल्पिक ईंधन? वैश्विक चीनी बाजार की क्या स्थिति है?
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दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल है भारत

अमेरिकी कृषि विभाग के अनुसार भारत दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादकों में शामिल है। 

पिछले वर्षों में उत्पादन कितना रहा?

भारत का चीनी उत्पादन पिछले एक दशक में काफी उतार-चढ़ाव से गुजरा है। वर्ष 2014-15 में देश का चीनी उत्पादन 283.10 लाख टन था, जो 2016-17 में घटकर 202.85 लाख टन रह गया। इसके बाद बेहतर मौसम और गन्ने की खेती बढ़ने से उत्पादन में तेज सुधार हुआ और 2021-22 में यह रिकॉर्ड 357.60 लाख टन के स्तर पर पहुंच गया, जो इस अवधि का सबसे अधिक उत्पादन था। हालांकि इसके बाद उत्पादन में गिरावट का दौर शुरू हुआ और 2022-23 में यह 328.15 लाख टन व 2023-24 में 319.64 लाख टन रह गया। आईएसमए के मौजूदा अनुमान के अनुसार 2025-26 में भारत का चीनी उत्पादन 349 लाख टन रहने की उम्मीद जताई गई थी।

इस सीजन में कितना रहा उत्पादन? 

  • सहकारिता मंत्रालय और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के अनुसार 15 अप्रैल 2026 तक देश में 273.90 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हो चुका था।
  • इस सीजन में चीनी मिलों ने 2,865.21 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई की।
  • गन्ने से चीनी निकालने की औसत दर (रिकवरी) 9.56% रही।
  • देशभर में 541 चीनी मिलें इस सीजन में संचालित रहीं।

भारत के चीनी उत्पादन में किन राज्यों का दबदबा?

एनएफसीएफसी के 14 फरवरी के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक मिलकर देश के कुल चीनी उत्पादन में 87.48% हिस्सेदारी रखते हैं।

महाराष्ट्र इस सीजन में सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य बनकर उभरा है।
  • चीनी उत्पादन: 89.80 लाख मीट्रिक टन (LMT)
  • पिछले साल इसी अवधि में: 68.10 एलएमटी
  • गन्ना पेराई: 960.43 एलएमटी
  • पिछले साल गन्ना पेराई: 740.22 एलएमटी
उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है।
  • चीनी उत्पादन: 65.60 एलएमटी
  • पिछले साल इसी अवधि में: 63.25 एलएमटी
कर्नाटक तीसरे स्थान पर रहा।
  • चीनी उत्पादन: 41.70 एलएमटी
  • पिछले साल इसी अवधि में: 37.20 एलएमटी
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निर्यात के आंकड़ों में कैसे दिखे बदलाव?

आंकड़ों के अनुसार, भारत का चीनी निर्यात पिछले कुछ वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है। चीनी सीजन 2020-21 में देश ने कुल 70 लाख मीट्रिक टन (LMT) चीनी का निर्यात किया था। इसके बाद 2021-22 में निर्यात बढ़कर 110 लाख मीट्रिक टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

हालांकि, 2022-23 में कुल चीनी निर्यात घटकर 63.08 लाख मीट्रिक टन रह गया। इसके बाद घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने निर्यात पर प्रतिबंधात्मक रुख अपनाया, जिससे 2023-24 में चीनी निर्यात लगभग थम गया और केवल 1 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात हुआ।

भारत के निर्यात बाजारों का भूगोल कैसे बदला?

भारत के निर्यात बाजारों का भूगोल बदल रहा है। वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान जहां इंडोनेशिया और बांग्लादेश सबसे बड़े खरीदार थे, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र के देश भारतीय चीनी की मांग का मुख्य आधार बन गए हैं। सोमालिया, सूडान, जिबूती, श्रीलंका, तंजानिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं।
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निर्यात में गिराटव की क्या वजह है?

भारत के चीनी निर्यात में आई यह भारी गिरावट केवल उत्पादन या मौसम की वजह से नहीं है, बल्कि इसके पीछे सरकार की बदली हुई प्राथमिकताएं भी हैं। सरकार एक तरफ घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे रही है।

घरेलू उपभोक्ताओं के लिए चीनी की कीमतें नियंत्रण में रहें, इसके लिए वाणिज्य मंत्रालय के तहत विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने चीनी निर्यात पर लगी पाबंदियों को आगे भी जारी रखा है। सरकार का मानना है कि अनियंत्रित निर्यात से घरेलू आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और कीमतों में तेजी आ सकती है। इसी वजह से अब चीनी निर्यात केवल विशेष अनुमति के आधार पर ही किया जा सकता है।

हालांकि सरकार ने चीनी मिलों और गन्ना किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए चीनी सीजन 2024-25 के लिए 10 लाख मीट्रिक टन निर्यात की अनुमति दी थी। इसके बाद 2025-26 सीजन के लिए 15 लाख मीट्रिक टन का निर्यात कोटा भी तय किया गया है। इसके बावजूद यह मात्रा उन वर्षों की तुलना में काफी कम है, जब भारत 100 लाख मिट्रिक टन से अधिक चीनी निर्यात कर रहा था।

निर्यात में कमी की दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण वजह एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम है। पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने, स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार देशभर में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम चला रही है। 

अल नीनो कैसे डाल रहा चीनी उत्पादन पर असर?

मुंबई स्थित कमोडिटी ट्रेडिंग कंपनी एमईआईआर कमोडिटीज इंडिया के प्रबंध निदेशक राहिल शेख ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि भारत में पहले ही आपूर्ति दबाव में है और अब अल नीनो एक बड़ा जोखिम बनकर उभर रहा है। उनका कहना है कि अगर अनुमान के मुताबिक बारिश कमजोर रहती है तो गन्ने की खेती प्रभावित होगी।
रिपोर्ट के अनुसार मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस वर्ष भारत में मानसून 11 वर्षों के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच सकता है। जून में सामान्य से 40 प्रतिशत से अधिक कम बारिश दर्ज होने के कारण कई किसानों ने गन्ने की बुवाई टाल दी है। 

आत्मनिर्भर ऊर्जा की दिशा में भारत का लक्ष्य क्या है?

इसी दौरान भारत की एथेनॉल नीति भी तेजी से आगे बढ़ रही है। देश पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम कर रहा है। उद्योग अनुमानों के अनुसार वर्तमान 12-13 अरब लीटर की तुलना में 2039-40 तक एथेनॉल की मांग बढ़कर लगभग 30 अरब लीटर तक पहुंच सकती है।

हाल ही में देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनियों में से एक ने पहला फ्लेक्स-फ्यूल यात्री वाहन पेश किया है, जबकि दोपहिया क्षेत्र में भी फ्लेक्स-फ्यूल मोटरसाइकिल बाजार में आ चुकी है। सरकार ने उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन को बढ़ावा देने के लिए कर संबंधी बदलाव भी किए हैं।

सरकार क्यों बनाना चाहती है एथेनॉल को वैकल्पिक ईंधन?

भारत सरकार एथेनॉल को केवल एक वैकल्पिक ईंधन नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति के अहम हिस्से के रूप में देख रही है। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाकर देश की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने और किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा करने पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में भारत ने 2025 में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल कर लिया।

अब सरकार इससे भी आगे की तैयारी कर रही है। अब सरकार E85 और E100 जैसे उच्च इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों को शामिल करना चाहती है। E85 में 85 प्रतिशत इथेनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल होता है, जबकि E100 पूरी तरह शुद्ध इथेनॉल आधारित ईंधन है। उद्योग के कई विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सरकारी नीतियां चीनी निर्यात की तुलना में एथेनॉल उत्पादन को अधिक समर्थन दे सकती हैं।  

वैश्विक चीनी बाजार पर क्यों बढ़ रहा दबाव?

एसएंडपी ग्लोबल कमोडिटी इनसाइट्स की रिपोर्ट अनुसार वैश्विक चीनी बाजार पर दबाव बढ़ रहा है क्योंकि दुनिया के दो सबसे बड़े उत्पादक भारत और ब्राजील दोनों को खाद्य और ईंधन के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। भारत में उद्योग एथेनॉल उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखने के लिए बेहतर कीमतों की मांग कर रहा है।

मुंबई में आयोजित चीनी, इथेनॉल और जैव ऊर्जा सम्मेलन में श्री रेणुका शुगर्स के कार्यकारी अध्यक्ष अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि अगर गन्ने के रस से बनने वाले एथेनॉल की कीमतें नहीं बढ़ाई गईं तो उद्योग ज्यादा चीनी बनाने की ओर लौट सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अल नीनो की आशंका के बीच अगले सीजन में गन्ने की फसल इस वर्ष से बेहतर होने की गारंटी नहीं है।

एसएंडपी के अनुसार अमेरिकी कृषि विभाग का अनुमान है कि 2026-27 में वैश्विक चीनी उत्पादन घटकर 184.9 मिलियन टन रह सकता है। वहीं अंतरराष्ट्रीय चीनी संगठन ने भी 2026-27 में वैश्विक आपूर्ति घाटे का अनुमान जताया है।

ब्राजील में भी स्थिति आसान नहीं है। वहां चीनी की बजाय एथेनॉल उत्पादन के लिए अधिक गन्ना इस्तेमाल किया जा रहा है। अमेरिकी कृषि विभाग के अनुसार 2026-27 में ब्राजील का चीनी उत्पादन 4.25 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले सीजन से कम है।
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