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जंगल महलः किसका होगा पश्चिम बंगाल का यह हिस्सा, जहां कभी था माओवादियों का कब्जा?

Mon, 22 Mar 2021 07:25 PM IST
कुमार संभव कुमार सम्भव जैन, अमर उजाला, कोलकाता
कुमार सम्भव जैन, अमर उजाला, कोलकाता Published by: कुमार संभव Updated Mon, 22 Mar 2021 07:25 PM IST
सार

  • जंगल महल के क्षेत्र में 40 विधानसभा सीटें आती हैं, जिन पर सभी राजनीतिक दलों की नजरें बनी हुई हैं।

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Who will won Jungle Mahal where the Maoists once occupied bjp tmc congress cpim west bengal assembly election 2021
अमित शाह-ममता बनर्जी-अधीर रंजन चौधरी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

विस्तार

एक वक्त ऐसा था कि यहां लोगों के लिए शाम नहीं, सीधे रात होती थी। माओवादियों का खौफ इतना ज्यादा था कि दिन ढलने से पहले लोग अपने घरों में छिप जाते थे। बात हो रही है पश्चिम बंगाल के जंगल महल की, जहां से माओवादियों का 'जंगलराज' तो खत्म हो गया, लेकिन यह इलाका अब तक 'महल' नहीं बन पाया। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां की आठ सीटों में से पांच पर बाजी मारी, लेकिन अब दौर विधानसभा चुनावों का है और दांव पर 40 सीटें हैं। अब देखना है कि किसका होगा पश्चिम बंगाल का यह हिस्सा, जिस पर कभी था माओवादियों का कब्जा...

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इन इलाकों से मिलकर बना जंगल महल

बता दें कि जंगलमहल पश्चिम बंगाल का आदिवासी इलाका है, जिसमें पुरुलिया, बांकुड़ा, झारग्राम, विष्णुपुर, बीरभूम और पश्चिम मेदिनीपुर आते हैं। ये सभी इलाके दशकों तक माकपा के गढ़ रहे, लेकिन 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने यह किला ढहा दिया। हालांकि, अपना राज ज्यादा वक्त तक कायम नहीं रख पाईं। 2019 के लोकसभा चुनाव हुए तो जंगल महल का झुकाव भाजपा की तरफ हो गया। 

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इतनी सीटों पर जंगल महल का असर

बता दें कि जंगल महल के क्षेत्र में 40 विधानसभा सीटें आती हैं, जिन पर सभी राजनीतिक दलों की नजरें बनी हुई हैं। वाम मोर्चा ने दशकों तक इन सभी सीटों पर अपना कब्जा कायम रखा। साल 2006 में भी माकपा ने यहां की 36 जीतीं, लेकिन 2016 में सीटों की संख्या महज तीन रह गई। वहीं, 2006 के दौरान जंगल महल में खाता खोलने में भी नाकाम रही टीएमसी ने 2016 में कुल 30 सीटें जीतीं। अब जंगल महल की सियासत भाजपा की मुरीद हो गई है। दरअसल, लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान इस इलाके की कुल आठ लोकसभा सीटों में से पांच पर भाजपा ने बाजी मारी थी। 

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जंगल महल में दीदी को खतरा?

गौरतलब है कि यह पूरा इलाका एक जमाने में माओवादियों का गढ़ था। जब राज्य में ममता बनर्जी की सरकार बनी तो माओवादी घटनाओं में कमी आ गई, लेकिन इलाके का विकास अब तक नहीं हुआ। इस इलाके में रोजगार और भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जंगल महल एक पिछड़ा आदिवासी इलाका है, जहां लोगों की नजर चुनाव के दौरान ही जाती है। भाजपा का आरोप है कि इन इलाकों में बिना कमीशन दिए कोई भी काम नहीं हो सकता। 

जंगल महल की सभी सीटों पर भाजपा की नजर

जानकारी के मुताबिक, भाजपा पश्चिम बंगाल को फतह करने का रास्ता जंगल महल से ही निकालने की कोशिश में जुटी है। इसकी वजह लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे हैं, जिनमें भाजपा को यहां से 47 फीसदी वोट मिले थे। दरअसल, भाजपा ने 2014 से ही इस इलाके पर विशेष नजर रखी, जिसके लिए कैलाश विजयवर्गीय समेत कई बड़े नेताओं को तैनात कर दिया। कैलाश विजयवर्गीय लगातार आदिवासी इलाकों के लोगों से मुलाकात करते रहते हैं। वहीं, पीएम मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी इस इलाके में कई रैलियों को अंजाम दे चुके हैं। साथ ही, जंगल महल की राजनीति पर विशेष प्रभाव रखने वाले शिशिर अधिकारी को भी भाजपा अपने पाले में ला चुकी है। बता दें कि शिशिर अधिकारी नंदीग्राम से भाजपा प्रत्याशी सुवेंदु अधिकारी के पिता हैं। खैर, जंगल महल में हर कोई जोर-आजमाइश में लगा हुआ है, लेकिन यह इलाका क्या नतीजा सुनाता है, इसका फैसला दो मई को ही होगा।

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