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आखिर कौन हैं 'हिंदू पलायन लिस्ट' वाले हुकुम सिंह?

Wed, 15 Jun 2016 12:57 PM IST
सलमान रावी/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सलमान रावी/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Wed, 15 Jun 2016 12:57 PM IST
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who is hukum singh?
पलायन पर उठे विवाद की जांच के लिए सांसद सुरेश खन्ना के नेतृत्व में एक नौ सदस्सीय दल वहां भेजा - फोटो : facebook
भारतीय जनता पार्टी ने कैराना से हिंदूओं के पलायन पर उठे विवाद की जांच के लिए सांसद सुरेश खन्ना के नेतृत्व में एक नौ सदस्सीय दल वहां भेजा है। इस दल में उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक बृजलाल भी शामिल हैं। वहीं केंद्रीय मंत्री श्रीपद नाईक ने पत्रकारों को बताया कि तीन केंद्रीय मंत्रियों का एक दल भी उत्तर प्रदेश के इस क़स्बे में जाएगा और 'हिन्दुओं के पलायन' की ख़बरों की जांच करेगा। हालांकि पलायन की सूची को जारी करने वाले क्षेत्र के भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने पास के ही क़स्बे कांधला के 68 लोगों की सूची जारी की है। लेकिन नई सूची में 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग नहीं है।
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वैसे हुकुम सिंह की कैराना की सूची को लेकर भाजपा उत्साह में आ गई थी। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इलाहाबाद में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी इसे उठाया। हुकुम सिंह के इस बार हिंदू शब्द न इस्तेमाल करने को कुछ लोग उनके यू-टर्न के तौर पर देख रहे हैं और इसे लेकर पार्टी के अंदर बहस छिड़ गई है। अब सवाल यह उठता है कि आख़िर हुकुम सिंह कौन हैं और वो पहले इस तरह के विवाद में सामने क्यों नहीं आए?
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उत्तर प्रदेश की विधानसभा में एक अजीब मंज़र था

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वो समाजवादियों के साथ आकर जुड़ जाएं - फोटो : BBC
मार्च 2013 में एक दिन उत्तर प्रदेश की विधानसभा में एक अजीब मंज़र था। मज़ेदार बहस चल रही थी। भाजपा विधायक दल के नेता हुकुम सिंह ने अपने बोलने के अंदाज़ से अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को तारीफ़ के लिए मज़बूर कर दिया। सत्ता पक्ष की बेंच की ओर से समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और संसदीय कार्यमंत्री आज़म ख़ान खड़े हुए। वो हुकुम सिंह की ओर से सदन में रखी गई बातों को ग़ौर से सुन रहे थे। आज़म खान ने कहा, "हुकुम सिंह जी के मूल्यों और उनकी राजनीतिक सोच को देखते हुए मैं उनसे बस यही कह सकता हूँ कि वो समाजवादियों के साथ आकर जुड़ जाएँ।"

यह महज़ संजोग नहीं था कि आज़म ख़ान जैसे नेता ने किसी भाजपा नेता की इतनी तारीफ़ की हो। हुकुम सिंह का अतीत रहा ही कुछ ऐसा है। क़ानून की पढ़ाई करने के बाद उत्तर प्रदेश की न्यायिक सेवा की परीक्षा भी पास की। लेकिन उन्होंने जज बनने की जगह सेना में जाना बेहतर समझा। उन्होंने 1965 में चीन के साथ हुए युद्ध में हिस्सा लिया।
 

हुकुम सिंह ने राजनीतिक सफ़र 1974 में कांग्रेस के साथ शुरू किया

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कांग्रेस के टिकट पर वो दो बार विधायक चुने गए - फोटो : facebook

फ़ौज से रिटायर होकर वकील बन गए। और 1974 में वो राजनीति में सक्रिय हो गए। 2013 से पहले मीडिया में उनकी इतनी चर्चा कभी नहीं होती थी जबकि वो सात बार विधायक और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। हुकुम सिंह चर्चा में तब आए जब मुज़फ्फरनगर दंगे के बीच उन्होंने कथित तौर पर 'नफ़रत भरे बयान' दिए। जबकि शामली में और उत्तर प्रदेश की विधानसभा में उन्हें एक 'सुलझा हुआ' और 'गंभीर' वक्ता माना जाता है। कुछ दिन पहले उन्होंने बीबीसी से कहा था, " मैं अब भी कह रहा हूँ कि कैराना से हो रहे पलायन का मामला सांप्रदायिक नहीं है। यह क़ानून व्यवस्था का मुद्दा है। लोग इसे सांप्रदायिक मुद्दा इसलिए बनाना चाहते हैं ताकि उन गुंडों को संरक्षण मिल सके।"

हुकुम सिंह ने राजनीतिक सफ़र 1974 में कांग्रेस के साथ शुरू किया। कांग्रेस के टिकट पर वो दो बार विधायक चुने गए। फिर उन्होंने जनता पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ा और विधायक चुने गए। वो 1995 में भाजपा में शामिल हो गए और चार बार विधायक रहे। मगर 2009 में वो लोकसभा चुनाव हार गए थे। फिर मुज़फ्फरनगर के दंगों के बाद हुए लोकसभा चुनाव में वो भारी मतों से जीते। तो वो क्या कुछ था जिसकी वजह से उन्होंने इस तरह की सूची बिना पुष्टि किए ही जारी कर दी। उन्होंने स्वीकार किया कि सूची कार्यकर्ताओं ने बनाई थी जिसकी पूरी तरह पुष्टि नहीं की गई। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को क़रीब से देखने वालों को लगता है कि सुलझे हुए नेता माने जाने वाले हुकुम सिंह भी वही सबकुछ करना चाह रहे थे जो राजनीति और पार्टी में उनके बहुत बाद में आए नेताओं ने किया, यानि की बयानों और विवादों के ज़रिए राजनीति के शीर्ष पर पहुंचना। सात बार विधायक रहने और संगठन में इतने दिन तक काम करने के बाद भी हुकुम सिंह इस बार के केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपनी जगह नहीं बना पाए।

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