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अफगानिस्तान में जब फौज चलती है तो सड़कें हो जाती हैं खाली, पर कश्मीर में क्यों नहीं?

Thu, 14 Feb 2019 09:28 PM IST
आसिम खान   जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  
  जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली   Published by: आसिम खान Updated Thu, 14 Feb 2019 09:28 PM IST
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When the army moves in Afghanistan, the road becomes empty, why not in Kashmir

कश्मीर के अवंतिपोरा का गरीपोरा इलाका। लंबे समय से बड़े आतंकी हमले का अलर्ट। इसमें घात लगाकर हमला, फ़िदायीन अटैक और आईईडी ब्लास्ट जैसी वारदात शामिल रहती हैं। इन सबके बीच सीआरपीएफ के 2547 अधिकारी और जवानों को लेकर 78 वाहनों का काफिला आगे बढ़ता है। बीच रास्ते में आतंकी हमला हो जाता है। दूसरी ओर, अफगानिस्तान-सीरिया या दूसरे कई देशों में देखें तो वहां जब सुरक्षा बलों का काफिला चलता है तो सड़क खाली हो जाती है। कुछ देशों में, जहां हाईअलर्ट होता है और वहां रोड व्यस्त हैं तो उसकी एक-दो लेन पर बेरिकेडिंग कर देते हैं। कश्मीर में भी 1990 से पहले यह होता था। आज वह सब बंद हो गया है। 

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जहां से सुरक्षा बल चलते हैं, वहां आमने-सामने आम ट्रैफिक भी बे रोक-टोक चलता है। यहां तक कि सुरक्षा बलों के वाहनों पर पत्थर बरसा देते हैं। नतीजा, अवंतिपोरा का अटैक। बता दें कि समय-समय पर सुरक्षा बलों की खुद की हिफाजत के लिए सुरक्षा के मापदंड बदलते रहे हैं। पठानकोट और उरी हमले के बाद सेना के लिए नए मापदंड बनाए गए। खासतौर पर नॉर्थ ईस्ट व कश्मीर में रोड ओपनिंग पार्टी को बड़ी जिम्मेदारी दी गई। पायलट गाड़ियां और साइड से कोई क़ाफ़िले में न घुसे, इसके लिए भी कुछ आदेश जारी किए गए थे। 
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सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पंवार का कहना है कि कई बार राजनीतिक फैसलों के चलते सुरक्षा बलों की हिफाजत को ताक पर रख दिया जाता है। अफगानिस्तान, सीरिया, अमेरिका, रुस और इजराइल सहित कई ऐसे दूसरे देश हैं, जहां पर आतंकी हमलों का हाई-अलर्ट मिलता है तो रोड बंद करने का प्रावधान किया गया है। जिस रोड से सुरक्षा बलों का काफिला निकलता है, वहां रुटीन का ट्रैफ़िक थोड़ी देर के लिए रोक दिया जाता है। 
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पूर्व आईजी कहते हैं कि कश्मीर में 1990 से पहले यह होता था। चूंकि उस दौरान आतंकवाद चरम पर था तो सुरक्षा बल खतरे को भांपते हुए उस मार्ग को सामान्य वाहनों के लिए बंद कर देते थे, जहां से सुरक्षा बलों का काफिला गुजरता है। कश्मीर में राजनीतिक लोगों ने यह कह कर सड़क बंद कराने वाले प्रावधान वापस करा दिए कि इससे जनता को परेशानी होती है। नतीजा, आपके सामने है। सुरक्षा बलों के वाहनों पर पत्थर बरसाए जाते हैं। यहां तक कि किसी रोड से जब काफिला गुजरता है तो पत्थर फेंकने वाले बिल्कुल निकट से सुरक्षा बलों के वाहनों को निशाना बनाते हैं। उन्हें कोई नहीं रोकता। 


अगर कोई सुरक्षा बल अपने बचाव में कोई कदम उठा ले तो उसके खिलाफ मामला दर्ज हो जाता है। गरीपोरा में सीआरपीएफ काफिले पर हुए हमले का दोहराव न हो तो इसके लिए हाई अलर्ट वाले इलाके में जहां से काफिला गुजरना है, उसे सामान्य वाहनों के लिए बिल्कुल बंद करना होगा। सीआरपीएफ की कोई दो-चार गाड़ियां नहीं थीं, 25 सौ से ज़्यादा जवान और 78 गाड़ियां काफिले में शामिल थी। हमले का मकसद समझा जा सकता है कि टारगेट बहुत बड़ा नुक़सान पहुंचाने का था। 

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