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तेल में आग: क्या है पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने का फॉर्मूला, कैसे आप तक पहुंचने पर महंगा हो जाता है ईंधन
Mon, 12 Jul 2021 08:26 PM IST
प्रतिभा ज्योति
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली,
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली,
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Mon, 12 Jul 2021 08:26 PM IST
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पेट्रोल-डीजल
- फोटो :
iStock
विस्तार
देश में पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों से जनता पस्त है। 2014-15 में पेट्रोल जहां 66 रुपये प्रति लीटर और डीजल 50 रुपये प्रति लीटर मिल रहा था, आज दिल्ली में आज पेट्रोल का दाम 101.19 रुपये जबकि डीजल का दाम 89.72 रुपये प्रति लीटर है। कई शहरों में पेट्रोल 100 रूपये प्रति लीटर तक पहुंचा हुआ है।
आमतौर पर माना जाता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत से तय होती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घट जाने के बाद भी घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल महंगा ही मिलता है। आइए, समझते हैं कि क्या है पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने का फॉर्मूला?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव कम, फिर भी महंगा ही मिलता है पेट्रोल-डीजल
तेल कंपनियां यह देखती हैं कि पिछले 15 दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भावों का औसत क्या है, उसी हिसाब से दाम तय किए जाते हैं। यानी जब कच्चे तेल के दाम घटते या बढ़ते हैं तो उसका असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है। लेकिन जनवरी 2020 से लेकर जनवरी 2021 के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव में 13 फीसदी की कमी आने के बावजूद घरेलू बाजार में लोगों ने 13 फीसदी ज्यादा की कीमत चुकाई।
जनवरी 2001 में कच्चे तेल का भाव 29 रुपये था जबकि लोगों को यह 78 रुपये में मिल रहा था। इसके बाद कोरोना महामारी फैल गई। फरवरी में कच्चे तेल की कीमत 25 रुपये हो गई लेकिन घरेलू बाजार में यह लोगों को महंगे दामों पर ही मिल रहा था। मार्च 2020 में जब दुनियाभर में लॉकडाउन लगने लगा तो कच्चे तेल की कीमत 29 रुपये से घटकर 16 रुपये हो गई लेकिन फिर भी घरेलू बाजार में लोगों ने महज 5 रुपये कम चुकाए।
कई तरह के टैक्स से बढ़ जाती है कीमत
दरअसल इन उत्पादों पर लगने वाले टैक्स घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेट्रोल की कीमत बढ़ने का एक प्रमुख कारण स्थानीय करों की ज्यादा वसूली है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भले ही पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम हो, लेकिन उसका असर घरेलू बाजार में इसलिए नहीं होता है क्योंकि आम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते सरकार कई तरह के टैक्स लगा देती है। पहले इस पर उत्पाद शुल्क और उपकर लगाती है, जिससे सरकार को राजस्व मिलता है।
राज्य सरकार वसूलती है वैट
इसके अलावा राज्य सरकारें बिक्री कर या वैट वसूलती है। उसके बाद मालभाड़ा, डीलर कमीशन, वैल्यू एडेड टैक्स जुड़ जाता है। कुल कर मिलाकर पेट्रोल के खुदरा बिक्री मूल्य का 58 प्रतिशत है और वर्तमान में डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य का लगभग 52 प्रतिशत। इसका मतलब हुआ कि अगर पेट्रोल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर है, तो मोदी सरकार और राज्य सरकारों की ओर से लगाए गए करों में 58 रुपये का हिसाब है। इसमें से केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क लगभग 32-33 रुपये है और बाकी वैट है जो राज्य सरकारें लगाती हैं। इस तरह आम उपभोक्ताओं तक पहुंचते-पहुंचते पेट्रोल-डीजल महंगा मिलता है और उपभोक्ताओं को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत का फायदा नहीं मिल पाता है।
तेल कंपनियां रोज तय करती हैं कीमतें
भारत मुख्य रूप से आयात के माध्यम से अपनी घरेलू तेल की मांग को पूरा करता है। अपनी जरुरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल बाहर से मंगवाता है। कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ही तय करता है। भारत को भी उसी कीमत पर कच्चा तेल खरीदना पड़ता है जो ओपेक तय करता है। सरकारी तेल कंपनिया पेट्रोल-डीजल की कीमत रोज तय करती है।
हालांकि हाल में ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के दौरान मार्च और अप्रैल के महीनों में एक बार भी दाम नहीं बढ़ाए। इसकी एक बड़ी वजह राज्य के स्वामित्व वाली तेल विपणन फर्मों की बाजार हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से अधिक होना है। केयर रेटिंग्स की ओर से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, ईंधन कंपनियों ने फरवरी में 16 बार कीमतों में बढ़ोतरी की, जबकि मार्च में तीन बार और अप्रैल में एक बार दरों में कटौती की। भारत के क्रूड बॉस्केट की औसत कीमत फरवरी से मार्च में 3.5 डॉलर बढ़ी थी और अप्रैल में 1.3 डॉलर गिर गई थी। भले ही कच्चे तेल की कीमतें अप्रैल की तुलना में केवल 3.5 डॉलर बढ़ीं, लेकिन दो महीने खामोश रहने वाली तेल कंपनियों ने मई में कीमतों में 16 गुना का इजाफा किया।
यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में बहुत बढ़े थे पेट्रोल डीजल के दाम
अभी से पहले यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत में ईंधन की कीमतों में 2010-11 और 2013-14 के बीच वृद्धि हुई थी। लेकिन उस समय, उछाल मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि के कारण था, जो अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था।
हालांकि, तब भी, भारतीय शहरों में पेट्रोल की खुदरा कीमत प्रचलित करों के कम होने के कारण 90 रुपये प्रति लीटर से कम थी। उस दौर में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 10 रुपये जितना कम था।
जब 2014-15 की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें गिरने लगीं, मोदी सरकार ने नवंबर 2014 से उत्पाद शुल्क बढ़ाना शुरू कर दिया। इस दौरान विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतें नीचे आईं, इसके बाद भी इस पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी जारी रही। 2020-21 में यह 12.2 फीसदी तक पहुंच गया, जबकि 2014-15 में यह 5.4 फीसदी था। इसका मतलब यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय ईंधन कीमतों में गिरावट का लाभ ग्राहकों को नहीं मिला।
टैक्स में कटौती क्यों नहीं करती सरकारें?
बीते छह सालों में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल से कमाई 307 फीसदी तक बढ़ा ली है। बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बीच भी मोदी सरकार और राज्य सरकारें अपने करों में कटौती इसलिए नहीं करती हैं क्योंकि ये कर राजस्व का एक प्रमुख स्रोत होते हैं। आमतौर पर पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में हर 1 रुपये की बढ़ोतरी से सरकारी खजाने को करीब 13,000-14,000 करोड़ रुपये का फायदा होता है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, राज्यों ने पेट्रोलियम उत्पादों पर वैट से 2019-20 में 2 लाख करोड़ रुपये और अप्रैल-दिसंबर 2020-21 में 1.35 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा संग्रह किया।
मोदी सरकार ने 2020-21 में उत्पाद शुल्क से 3.89 लाख करोड़ रुपये एकत्र किए, जो 2019-20 में एकत्र किए गए 2.39 लाख करोड़ रुपये से 62 प्रतिशत ज्यादा है। पिछले छह सालों में पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क के माध्यम से कुल कर संग्रह में 307.3 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसमें अकेले पेट्रोल से कर संग्रह 206 फीसदी और डीजल से 377 फीसदी बढ़ा है। गौर करने वाली बात यह है कि कर संग्रह में यह इजाफा तब हुआ जब लॉकडाउन के कारण कहीं आने-जाने पर पाबंदी लगी हुई थी और इसके कारण 2020-21 में पेट्रोलियम की खपत में नौ प्रतिशत की कमी आई।