अमेरिका द्वारा भारत को मिले सामरिक व्यापार प्राधिकरण-1 दर्जे का क्या मतलब है? जानिए इसके फायदे
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अमेरिका द्वारा भारत को सामरिक व्यापार प्राधिकरण-1 (एसटीए-1) सूची में शामिल किया जाना भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इसकी बदौलत भारत अमेरिका से खतरनाक मारक क्षमता वाले ड्रोन विमानों समेत तमाम अत्याधुनिक हथियारों का निर्यात बिना किसी सरकारी नियंत्रण के कर सकता है। इसका मतलब ये है कि भारत को अमेरिका से हथियार लाने के लिए अब लाइसेंस की जरूरत नहीं होगी। फिलहाल अमेरिकी कंपनियों को इसके लिए वहां से वाणिज्य मंत्रालय से लाइसेंस लेनी पड़ता है।
यूएस चैंबर्स ऑफ कॉमर्स की ओर से 30 जुलाई को आयोजित पहले भारत-प्रशांत बिजनेस फोरम में अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विलबर रॉस ने भारत को एसटीए-1 का दर्जा देने की घोषणा की थी। इसकी अहमियत ऐसे समझी जा सकती है कि भारत यह दर्जा पाने वाला दक्षिण एशिया का पहला और पूरे एशिया का तीसरा देश है। भारत से पहले जापान और दक्षिण कोरिया यह दर्जा पा चुके हैं।
सुरक्षा भागीदार के रूप में भारत पर बढ़ा अमेरिका का विश्वास
अमेरिका द्वारा भारत को सामरिक व्यापार प्राधिकरण-1 (एसटीए-1) का दर्जा दिए जाने का मतलब है कि अमेरिका का सुरक्षा भागीदार के रूप में भारत पर विश्वास बढ़ा है। अमेरिका में भारतीय राजदूत नवतेज सिंह सरना ने कहा है कि यह सुरक्षा भागीदार के रूप में भारत पर अमेरिका के विश्वास का संकेत है। वहीं, अमेरिका मानता है कि भारत में बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्था है। इसलिए यह दर्जा मिलने से बिना किसी जोखिम के भारत को अधिक संवेदनशील रक्षा प्रौद्योगिकी और दोहरी उपयोग प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की अनुमति मिलेगी। इससे सुरक्षा भागीदार के रूप में भारत की क्षमताओं का भी प्रदर्शन होता है। साथ ही यह दिखाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत हो रही है।
एसटीए-1 के दर्जे से भारत को क्या फायदा
दरअसल, सामरिक व्यापार प्राधिकरण अमेरिका से बिना किसी लाइसेंस के अत्याधुनिक और संवेदनशील हथियारों के निर्यात की अनुमति देता है और भारत के लिए यह दर्जा बहुत फायदेमंद साबित होगा। दुनिया में कुल 36 देश ही इस सूची में शामिल हैं, जिनमें से अधिकतर नाटो समूह के सदस्य हैं। इस दर्जे से अब भारत को भी नाटो समूह के देशों की तरह सुविधाएं मिलेंगी। इससे भारत अब आसानी से संवेदनशील हथियारों को खरीद पाएगा। इससे न केवल दोनों देशों के बीच पारस्परिकता की वृद्धि होगा बल्कि लाइसेंसों की स्वीकृति में जो समय बर्बाद होते थे, उनकी भी बचत होगी। साथ ही इससे रक्षा उपकरणों की जरुरत भी काफी कम कीमत पर पूरी की जा सकेंगी।
भारत में निवेश बढ़ेगा?
माना जा रहा है कि अमेरिका के इस फैसले से आने वाले दिनों में भारत के रक्षा क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों की तरफ से अरबों डॉलर के नए निवेश का भी रास्ता खुलेगा। विशेषज्ञों की मानें तो भारतीय और अमेरिकी रक्षा कंपनियों के बीच तेजी से गठबंधन होने के आसार हैं। हालांकि अमेरिका भारत को अपने हथियारों के बाजार के तौर पर नहीं देखता, लेकिन उसकी रणनीति भारत में रक्षा उपकरणों के निर्माण का ढांचा तैयार करने की है। इससे अमेरिकी हथियार निर्माता कंपनियों के बीच भारत में निर्माण इकाई स्थापित करने के लिए उत्साह बढ़ेगा। चूंकि अमेरिका में हथियारों के निर्माण में लागत ज्यादा होती है, लेकिन भारत में ये समस्या नहीं है। यहां आसानी से निर्माण इकाईयां स्थापित की जा सकती हैं और उच्च तकनीकी वाले उपकरणों का दूसरे देशों में भी निर्यात किया जा सकता है। यह 'मेक इन इंडिया' के तहत एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
अमेरिकी कंपनियों के लिए भी फायदे का 'दर्जा'
भारत को यह दर्जा मिलना हथियार बनाने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए भी काफी फायदेमंद सिद्ध होगा। चूंकि अभी तक अमेरिकी कंपनियों को संवेदनशील हथियारों के निर्यात के लिए वहां के वाणिज्य मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है और ऐसे मामलों में मंत्रालय मंजूरी देने में काफी देरी करता है या फिर उसे नामंजूर कर देता है। इससे अमेरिकी कंपनियों को भी घाटा होता है। लेकिन यह दर्जा मिल जाने से अमेरिकी कंपनियों की सबसे बड़ी अड़चन दूर हो गई है।