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What After Chandrayaan-3?: चांद तो बस शुरुआत है, इसरो को तो सूरज, मंगल और शुक्र तक जाना है
Wed, 23 Aug 2023 02:13 PM IST
रविंद्र भजनी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: रविंद्र भजनी
Updated Wed, 23 Aug 2023 02:13 PM IST
सार
What After Chandrayaan-3?: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो का चंद्रयान-3 बुधवार को चांद की सतह पर उतरेगा। यह तो महज शुरुआत है। इसरो इसके बाद सूरज, मंगल और शुक्र तक जाने की तैयारी में है।
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चांद फतह के बाद इसरो की आगे की तैयारी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का चंद्रयान-3 बुधवार को चांद की सतह पर उतरेगा। यह न केवल प्रतिष्ठित अंतरिक्ष एजेंसी के लिए बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है। चंद्रयान-3 तो बड़ी उपलब्धि है ही, इसरो की लाइन-अप भी तैयार है। इसके बाद इसरो की तैयारी सूरज, मंगल और शुक्र तक जाने की है।
गगनयान मिशन
इसरो का गगनयान मिशन भारत का अंतरिक्ष में मनुष्य को भेजने की ओर पहला कदम है। गगनयान मिशन 2022 में लॉन्च हो जाना था, लेकिन देरी से चल रहा है। अब 2025 के बाद इसके होने की उम्मीद है। फिलहाल गगनयान ह्यूमन स्पेस फ्लाइट मिशन से पहले इसरो ने दो मानवरहित मिशन प्लान किए हैं। इसरो अगले साल की शुरुआत में पहला मानवरहित फ्लाइट टेस्ट करने वाला है। इस यान को व्योममित्र नाम दिया गया है। हॉफ-ह्यूमनॉइड के तौर पर इसकी व्याख्या की जा रही है। यह इसरो के कमांड सेंटर से जुड़ा रहेगा। गगनयान प्रोजेक्ट के लिए इसरो ने क्रायो स्टेज इंजिन क्वालिफिकेशन टेस्ट, क्रू एस्कैप सिस्टम के साथ ही पैराशूट एयरड्रॉप टेस्ट पूरे कर लिए हैं। टेस्ट व्हीकल क्रू एस्कैप सिस्टम को सतीश धवन स्पेस सेंटर में तैयार किया गया है।
सूरज का अध्ययन करेगा आदित्य एल-1
इसरो सूर्य का अध्ययन करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए सितंबर के पहले हफ्ते में आदित्य एल-1 को लॉन्च किया जा सकता है। 2015 में इसरो ने एस्ट्रोसैट लॉन्च किया था और आदित्य एल-1 भारत का दूसरा एस्ट्रोनॉमी मिशन होगा। स्पेसक्राफ्ट सूर्य-पृथ्वी के सिस्टम में लैगरेंज पॉइंट-1 (एल1) के पास बने हैलो ऑर्बिट में रहेगा। यह धरती से 15 लाख किमी दूर है। इस यान की मदद से सूर्य का लगातार अध्ययन संभव होगा। ग्रहण और अन्य खगोलीय घटनाएं भी इसमें खलल नहीं डालेंगी।
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आदित्य एल-1 को पीएसएलवी रॉकेट से लॉन्च किया जाएगा और यह चंद्रयान मिशन की तरह ही होगा। स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की निचली कक्षा में होगा और इसे एल1 की तरफ धकेला जाएगा। लॉन्च से एल1 की ओर इस यान की यात्रा चार महीने की होगी। इस मिशन में सात पेलोड होंगे। चार सूर्य की रिमोट सेंसिंग करेंगे और तीन उस पर होने वाली गतिविधियों पर नजर रखेंगे।
अमेरिका के साथ संयुक्त अभियान- निसार
नासा और इसरो का सार यानी निसार (NISAR) अभियान पृथ्वी के बदलते इकोसिस्टम का अध्ययन करेगा। भूजल के प्रवाह के साथ ही ज्वालामुखियों, ग्लेशियर के पिघलने की दर, पृथ्वी की सतह पर होने वाले बदलावों का अध्ययन करेगा। निसार दुनियाभर में सतह पर हो रहे बदलावों पर नजर रखेगा, जो अंतरिक्ष और समय की वजह से नहीं हो पाता। यह हर 12 दिन में डिफॉर्मेशन मैप बनाएगा और इसके लिए दो फ्रिक्वेंसी बैंड्स का इस्तेमाल करेगा। इससे भूकंप की आशंका वाले इलाकों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
इसकी लागत करीब 1.5 बिलियन डॉलर होगी और यह दुनिया का सबसे महंगा सैटेलाइट होगा। इसका लॉन्च जनवरी 2024 में प्रस्तावित है। 2800 किगलो का यह सैटेलाइट एल-बैंड और एस-बैंड सिंथेटिक अपर्चर रडार (एसएआर) उपकरणों से सुसज्जित होगा। इससे यह डुअल-फ्रिक्वेंसी इमेजिंग राडार सैटेलाइट बनेगा।
फिर मंगल फतह की कोशिश
भारत का दूसरा इंटर-प्लैनेटरी मिशन मंगलयान-2 भी प्रस्तावित है। इस बार हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरा और राडार भी ऑर्बिटल प्रोब में लगा होगा। इस मिशन के लिए लैंडर रद्द कर दिया गया है। भारत का पहला मंगल मिशन मंगलयान-1 सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में पहुंच गया था। लॉन्च व्हीकल, स्पेसक्राफ्ट और ग्राउंड सेग्मेंट की लागत 450 करोड़ रुपये आई थी, जो अब तक का सबसे किफायती मंगल मिशन था।
शुक्रयान भी है लाइन में
इसरो के मार्स ऑर्बिटर मिशन या मंगलयान-1 की सफलता के बाद इसरो की निगाहें शुक्र ग्रह पर जम गई हैं। अमेरिका, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और चीन ने भी शुक्र ग्रह के लिए अपने मिशन पर काम करना शुरू कर दिया है। भारत का मिशन वैसे तो 2024 के लिए नियोजित था, फिलहाल इसके 2031 से पहले पूरे होने के आसार नहीं हैं। सरकार से अब तक आवश्यक मंजूरियां तक नहीं मिली हैं।
स्पेडेक्स (स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट)
भारत भविष्य में अपना स्पेस स्टेशन बनाता है तो उसे अपने स्पेस डॉक की आवश्यकता होगी। इसके लिए स्वदेशी स्पेडेक्स बनाया जा रहा है। इसका लक्ष्य पृथ्वी की कक्षा में दो स्पेसक्राफ्ट को डॉक (पार्क) करने की तकनीक विकसित करना है। मल्टी-मॉड्यूल स्पेस स्टेशन बनाने के लिए यह अहम होता है। साथ ही इससे अन्य ग्रहों पर मनुष्यों को भेजने के मिशन और कक्षा में किसी स्पेसक्राफ्ट में ईंधन भरने में भी भारत महारत हासिल कर लेगा।
क्लाइमेट ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट
इसरो जल्द ही क्लाइमेट ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट -इनसैट-3डीएस लॉन्च करने वाला है। इसरो के अधिकारियों के मुताबिक, तैयारियां अंतिम रूप ले रही हैं। इसके अलावा आने वाले महीनों में कुछ रक्षा और पर्यावरणीय अध्ययन के सैटेलाइट्स भी लॉन्च होने वाले हैं।
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गगनयान मिशन
इसरो का गगनयान मिशन भारत का अंतरिक्ष में मनुष्य को भेजने की ओर पहला कदम है। गगनयान मिशन 2022 में लॉन्च हो जाना था, लेकिन देरी से चल रहा है। अब 2025 के बाद इसके होने की उम्मीद है। फिलहाल गगनयान ह्यूमन स्पेस फ्लाइट मिशन से पहले इसरो ने दो मानवरहित मिशन प्लान किए हैं। इसरो अगले साल की शुरुआत में पहला मानवरहित फ्लाइट टेस्ट करने वाला है। इस यान को व्योममित्र नाम दिया गया है। हॉफ-ह्यूमनॉइड के तौर पर इसकी व्याख्या की जा रही है। यह इसरो के कमांड सेंटर से जुड़ा रहेगा। गगनयान प्रोजेक्ट के लिए इसरो ने क्रायो स्टेज इंजिन क्वालिफिकेशन टेस्ट, क्रू एस्कैप सिस्टम के साथ ही पैराशूट एयरड्रॉप टेस्ट पूरे कर लिए हैं। टेस्ट व्हीकल क्रू एस्कैप सिस्टम को सतीश धवन स्पेस सेंटर में तैयार किया गया है।
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सूरज का अध्ययन करेगा आदित्य एल-1
इसरो सूर्य का अध्ययन करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए सितंबर के पहले हफ्ते में आदित्य एल-1 को लॉन्च किया जा सकता है। 2015 में इसरो ने एस्ट्रोसैट लॉन्च किया था और आदित्य एल-1 भारत का दूसरा एस्ट्रोनॉमी मिशन होगा। स्पेसक्राफ्ट सूर्य-पृथ्वी के सिस्टम में लैगरेंज पॉइंट-1 (एल1) के पास बने हैलो ऑर्बिट में रहेगा। यह धरती से 15 लाख किमी दूर है। इस यान की मदद से सूर्य का लगातार अध्ययन संभव होगा। ग्रहण और अन्य खगोलीय घटनाएं भी इसमें खलल नहीं डालेंगी।
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आदित्य एल-1 को पीएसएलवी रॉकेट से लॉन्च किया जाएगा और यह चंद्रयान मिशन की तरह ही होगा। स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की निचली कक्षा में होगा और इसे एल1 की तरफ धकेला जाएगा। लॉन्च से एल1 की ओर इस यान की यात्रा चार महीने की होगी। इस मिशन में सात पेलोड होंगे। चार सूर्य की रिमोट सेंसिंग करेंगे और तीन उस पर होने वाली गतिविधियों पर नजर रखेंगे।
अमेरिका के साथ संयुक्त अभियान- निसार
नासा और इसरो का सार यानी निसार (NISAR) अभियान पृथ्वी के बदलते इकोसिस्टम का अध्ययन करेगा। भूजल के प्रवाह के साथ ही ज्वालामुखियों, ग्लेशियर के पिघलने की दर, पृथ्वी की सतह पर होने वाले बदलावों का अध्ययन करेगा। निसार दुनियाभर में सतह पर हो रहे बदलावों पर नजर रखेगा, जो अंतरिक्ष और समय की वजह से नहीं हो पाता। यह हर 12 दिन में डिफॉर्मेशन मैप बनाएगा और इसके लिए दो फ्रिक्वेंसी बैंड्स का इस्तेमाल करेगा। इससे भूकंप की आशंका वाले इलाकों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
इसकी लागत करीब 1.5 बिलियन डॉलर होगी और यह दुनिया का सबसे महंगा सैटेलाइट होगा। इसका लॉन्च जनवरी 2024 में प्रस्तावित है। 2800 किगलो का यह सैटेलाइट एल-बैंड और एस-बैंड सिंथेटिक अपर्चर रडार (एसएआर) उपकरणों से सुसज्जित होगा। इससे यह डुअल-फ्रिक्वेंसी इमेजिंग राडार सैटेलाइट बनेगा।
फिर मंगल फतह की कोशिश
भारत का दूसरा इंटर-प्लैनेटरी मिशन मंगलयान-2 भी प्रस्तावित है। इस बार हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरा और राडार भी ऑर्बिटल प्रोब में लगा होगा। इस मिशन के लिए लैंडर रद्द कर दिया गया है। भारत का पहला मंगल मिशन मंगलयान-1 सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में पहुंच गया था। लॉन्च व्हीकल, स्पेसक्राफ्ट और ग्राउंड सेग्मेंट की लागत 450 करोड़ रुपये आई थी, जो अब तक का सबसे किफायती मंगल मिशन था।
शुक्रयान भी है लाइन में
इसरो के मार्स ऑर्बिटर मिशन या मंगलयान-1 की सफलता के बाद इसरो की निगाहें शुक्र ग्रह पर जम गई हैं। अमेरिका, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और चीन ने भी शुक्र ग्रह के लिए अपने मिशन पर काम करना शुरू कर दिया है। भारत का मिशन वैसे तो 2024 के लिए नियोजित था, फिलहाल इसके 2031 से पहले पूरे होने के आसार नहीं हैं। सरकार से अब तक आवश्यक मंजूरियां तक नहीं मिली हैं।
स्पेडेक्स (स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट)
भारत भविष्य में अपना स्पेस स्टेशन बनाता है तो उसे अपने स्पेस डॉक की आवश्यकता होगी। इसके लिए स्वदेशी स्पेडेक्स बनाया जा रहा है। इसका लक्ष्य पृथ्वी की कक्षा में दो स्पेसक्राफ्ट को डॉक (पार्क) करने की तकनीक विकसित करना है। मल्टी-मॉड्यूल स्पेस स्टेशन बनाने के लिए यह अहम होता है। साथ ही इससे अन्य ग्रहों पर मनुष्यों को भेजने के मिशन और कक्षा में किसी स्पेसक्राफ्ट में ईंधन भरने में भी भारत महारत हासिल कर लेगा।
क्लाइमेट ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट
इसरो जल्द ही क्लाइमेट ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट -इनसैट-3डीएस लॉन्च करने वाला है। इसरो के अधिकारियों के मुताबिक, तैयारियां अंतिम रूप ले रही हैं। इसके अलावा आने वाले महीनों में कुछ रक्षा और पर्यावरणीय अध्ययन के सैटेलाइट्स भी लॉन्च होने वाले हैं।