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West Bengal: बागी सांसदों पर फैसला परिसीमन की जंग जीतने के बाद, जानिए क्यों फंसी भाजपा

Fri, 12 Jun 2026 05:13 AM IST
Himanshu Mishr हिमांशु मिश्र
Updated Fri, 12 Jun 2026 05:13 AM IST
सार

कार्यकर्ताओं के गहरे आक्रोश और ताकत बढ़ाने की आकांक्षा के बीच भाजपा फंस गई है। भाजपा को अपने कमजोर संख्याबल और सहयोगी दलों पर निर्भरता की भी चिंता है। 

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टीएमसी में टूट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

संसद में मजबूत संख्या बल या कार्यकर्ताओं की भावना। पश्चिम बंगाल में तिनका-तिनका होकर बिखर रही तृणमूल कांग्रेस के लिए भावी निर्णय के मामले में भाजपा गहरे असमंजस में है। बिखरती तृणमूल कांग्रेस भाजपा के लिए संसद में अपनी संख्या बल मजबूत करने का बड़ा अवसर है, मगर यहां कार्यकर्ताओं की भावना पार्टी की भावी रणनीति पर भारी पड़ रही है। पार्टी नेतृत्व तय नहीं कर पा रहा है कि तृणमूल के बागी गुट का अलग अस्तित्व बरकरार रखा जाए या उसे खुद में समाहित कर संसद के दोनों सदनों में अपनी स्थिति मजबूत की जाए। माना जा रहा है कि कार्यकर्ताओं के आक्रोश के मद्देनजर भाजपा परिसीमन की जंग जीतने के बाद इस संबंध में निर्णय लेगी। 
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बुधवार देर रात केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बंगाल के सीएम शुभेंदु की उपस्थिति में तृणमूल के बागी सांसदों की बैठक में भी इस संबंध में अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका। सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में लंबी मशक्कत के बाद बस इतनी सहमति बनी कि फिलहाल तृणमूल में बचे अन्य सांसदों को साधने के बाद इस पर अंतिम निर्णय लिया जाए। पार्टी चाहती है कि अभिषेक बनर्जी, कीर्ति आजाद जैसे सांसदों को छोड़ कर अन्य ऐसे सांसदों से विरोधी गुट लगातार संपर्क जारी रखे।
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ये है नेतृत्व की रणनीति
भाजपा नेतृत्व को संसद में अपने कमजोर संख्याबल और सहयोगी दलों पर निर्भरता की भी चिंता है। कमजोर संख्याबल के कारण मोदी सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को अमली जामा नहीं पहना पाई। ऐसे में नेतृत्व का पूरा जोर जल्द से जल्द खासतौर से लोकसभा में दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा जुटा कर इस विधेयक को कानूनी रूप देने का है, जिससे लोकसभा की बढ़ी सीटें और महिला आरक्षण के दांव से चुनाव में उसकी स्थिति मजबूत रहे।
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अब आगे क्या?
भाजपा सूत्रों के मुताबिक पार्टी नेतृत्व पश्चिम बंगाल में कार्यकर्ताओं की भावनाओं की भी अनदेखी नहीं कर सकता। ऐसे में नेतृत्व की रणनीति कार्यकर्ताओं के आक्रोश में कमी आने का इंतजार करना है। ऐसे में नेतृत्व फिलहाल टीएमसी विरोधी गुट का इस्तेमाल संसद में अहम विधेयकों को पारित कराने में करेगा। फिर कार्यकर्ताओं का आक्रोश ठंडा होने पर लोकसभा के बागी सांसदों को पार्टी में शामिल करने का रोड मैप तैयार करेगा।


ये भी उलझन का कारण
विधायक दल में टूट के बाद यह धड़ा अब विधानसभा में विपक्ष की भूमिका निभाएगा। दूसरी ओर संसदीय दल में टूट के बाद यह धड़ा केंद्र में मोदी सरकार का समर्थन करेगा। इससे विरोधी गुट को ले कर उलझन की स्थिति और गहरी होगी।
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