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हम ‘राम लला’ के दावे का विरोध नहीं कर रहे, सुप्रीम कोर्ट में निर्मोही अखाड़े ने कहा
Tue, 27 Aug 2019 10:18 PM IST
आसिम खान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आसिम खान
Updated Tue, 27 Aug 2019 10:18 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
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निर्मोही अखाड़ा ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि वह अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि के स्वामित्व के लिए ‘राम लला’ के वाद का विरोध नहीं कर रहा है। अखाड़ा ने प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को इस रुख के बारे में बताया।
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उससे पूछा गया था कि क्या वह इस तथ्य के आलोक में राम लला की याचिका का विरोध कर रहा है कि ‘शबैत’ (उपासक) के तौर पर संपत्ति पर उसका अधिकार तभी हो सकता है जब ‘राम लला विराजमान’ के वाद को विचारार्थ स्वीकार किया जाए।
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निर्मोही अखाड़े की ओर से वरिष्ठ वकील सुशील जैन ने पीठ से कहा, ‘कल आपने जो कहा, उसके जवाब में निर्मोही अखाड़ा का रुख यह है कि वह वाद संख्या 5 (देवकी नंदन अग्रवाल के माध्यम से देवता द्वारा दाखिल) की विचारणीयता के मुद्दे पर जोर नहीं देगा बशर्ते कि देवता के वकील भी अखाड़ा के शबैत अधिकारों को चुनौती नहीं दें।’
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पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर भी शामिल हैं। पीठ ने जैन के इस लगातार दिए जा रहे रुख से इत्तेफाक नहीं जताया कि देवता का मुकदमा विचारणीय नहीं है क्योंकि शबैत के रूप में केवल अखाड़ा को देवता की तरफ से मुकदमा दायर करने का हक है।
पीठ ने अखाड़ा को उसका रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया। दशकों पुराने संवेदनशील मामले की 13वें दिन की सुनवाई में दलीलें पेश करते हुए जैन ने कहा कि 1934 से किसी मुस्लिम ने नियमित नमाज अदा करने के लिए विवादित इमारत में प्रवेश नहीं किया है और यह स्थान अखाड़े के कब्जे वाला मंदिर है। पीठ ने कहा, ‘आपने यह सब कल ही पढ़ा है। आप जो पढ़ चुके हैं, उसके आगे की बात करिए। दोहराइए मत।’
जैन ने कहा कि मुस्लिम पक्ष की इस दलील को नहीं माना जा सकता कि 1934 में सांप्रदायिक दंगे के बाद विवादित ढांचे की मरम्मत के लिए एक ठेकेदार को कहा गया था। इस बात पर इसलिए भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि राजस्व रिकार्ड अखाड़े का कब्जा दिखाते हैं। फिर वरिष्ठ वकील ने कहा कि मामले में मुस्लिम पक्षों का वाद निर्धारित कालावधि से बहुत बाद का है क्योंकि उन्होंने वाद हेतु कारण सामने आने के बाद समय पर अदालत का रुख नहीं किया।