फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Visit Bhaktidham Shri Vrindavan with Amar Ujala on Krishna Janmashtami 2024

Janmashtami 2024: कृष्ण भक्ति का महासागर श्री वृंदावन धाम, अमर उजाला के साथ कीजिए भक्ति-भूमि की यात्रा

Mon, 26 Aug 2024 04:06 AM IST
शिव शुक्ला यतीश शर्मा
यतीश शर्मा Published by: शिव शुक्ला Updated Mon, 26 Aug 2024 04:06 AM IST
सार

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर अमर उजाला के साथ करें भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली व वृंदावन की यात्रा...जानें कान्हा की नगरी में स्थित विभिन्न संप्रदायचार्यों की ओर से स्थापित आस्था के केंद्रों के महत्व व पूजन पद्धति की रोचक जानकारी 

विज्ञापन
Visit Bhaktidham Shri Vrindavan with Amar Ujala on Krishna Janmashtami 2024
वृंदावन में श्रद्धालु। - फोटो : संवाद

विस्तार

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर श्री वृंदावन धाम के कण-कण में बसी भक्ति पूरे चरम पर है। वैसे तो देशभर के साथ-साथ विदेशों में भी जन्माष्टमी के पर्व की धूम है, लेकिन बात जब वृंदावन की हो, तो यहां श्रीकृष्ण की भक्ति का महासागर उमड़ पड़ता है। देश-विदेश के श्रद्धालुओं का यहां पहुंचने का क्रम हर क्षण बढ़ता जा रहा है। वृंदावन की गलियों में बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों, सभी के हृदय से उठने वाला राधे-राधे का स्वर एक नाद का स्वरूप लेता जा रहा है। कान्हा के जन्मोत्सव की तैयारियों में वृंदावन की रज, पताकाएं और हवाएं सभी भगवान श्रीकृष्ण भक्ति को नित नई ऊंचाइयां प्रदान कर रही हैं। कान्हा की जन्मस्थली और यहां के मंदिरों के वैभव से रूबरू करा रहे हैं यतीश शर्मा...
विज्ञापन


बांके बिहारीजी : रासलीला में विघ्न न हो, इसलिए साल में एक बार होती है मंगला आरती
धार्मिक नगरी वृंदावन और श्री बांके बिहारी जी मंदिर एक-दूसरे के पर्याय हैं। सबसे खास बात यह है कि हर मंदिर में मंगला आरती (सुबह चार बजे के बाद होने वाली आरती) अनिवार्य रूप से होती है, लेकिन श्री बांके बिहारी जी मंदिर में वर्ष में केवल एक बार ही मंगला आरती की जाती है, वह भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर। श्री बांके बिहारीजी मंदिर के प्रवक्ता श्रीनाथ गोस्वामी के अनुसार पांच दशक पहले तक यहां भी मंगला आरती होती थी, लेकिन उनके पूर्वजों ने यह निर्णय किया कि सुर-संगीत के आधार पर ही प्रभु का प्राकट्य हुआ है और भगवान श्रीकृष्ण निधि वन में राधा रानी, सखियों के साथ नियमित रूप से रास रचाते हैं। ऐसे में मंगला आरती के कारण भगवान को रासलीला छोड़कर बीच में ही मंदिर आने में कष्ट होता है। इसीलिए मंदिर में हर रोज होने वाली मंगला आरती बंद कर दी गई। 
विज्ञापन


प्रवक्ता गोस्वामी ने बताया कि श्री विष्णु स्वामी संप्रदाय (सखी) के स्वामी हरिदासजी ने भगवान श्रीकृष्ण की इस छवि को निधि वन में अनुभव किया। श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त और तानसेन व बैजू बावरा के गुरु रहे स्वामी हरिदासजी ने संगीत के स्वरों के आधार पर अपने आराध्य का प्राकट्य कराया। वर्ष 1860 में भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। निम्बार्क पंथ के स्वामी हरिदासजी ने भक्ति मार्ग में सुर-संगीत को अपनाया और प्रभु की प्राप्ति की। इसके बाद स्वामी हरिदासजी के अनुयायियों ने वर्ष 1921 में श्री बांके बिहारी जी मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। वंश परंपरा के तहत वर्तमान में यहां 18, 19 व 20वीं पीढ़ी के परिजन सेवा-सुश्रुषा कर रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


बांके बिहारी व निधि वन एक-दूसरे के पूरक 
बांके बिहारीजी मंदिर के प्रवक्ता के अनुसार पूरे वृंदावन में आधुनिकता का असर दिखाई दे रहा है, लेकिन एकमात्र निधि वन ही यहां अपने उस मूल स्वरूप में है, जो साढ़े पांच हजार साल पहले द्वापर युग में हुआ करता था। यह अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि निधि वन में भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। यहां की लता-पताएं भी गोपियों का रूप लेकर महारास में शामिल होती हैं। रास के बाद निधि वन परिसर में स्थापित रंग महल में प्रभु शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है, जो हर सुबह बिखरा हुआ मिलता है। 

महारास में गोिपयों के रूप में जाग्रत होती हैं लता-पताएं 
निधि वन में मौजूद लता-पताओं की ऊंचाई महज चार से साढ़े चार फुट ही है। इसके पीछे यह मान्यता भी है कि भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी जब यहां महारास रचाते हैं तो ये लता-पताएं गोिपयों के रूप में जाग्रत होती हैं। विशाल वृक्षों की अपेक्षा इनकी ऊंचाई इसलिए ही छोटी है, क्योंकि ये प्रभु के चरणों से उड़ने वाले रजकणों से स्वयं को पूरी तरह से सराबोर कर लेती हैं। 

अब चलते हैं कान्हा की जन्मस्थली...
वृंदावन से महज नौ किमी दूर स्थित मथुरा के कारागार के बाहर आज भी कंस के द्वारपालों के रूप में खड़े पुतले और मुख्य प्रवेश द्वार पर कड़ी सुरक्षा में तैनात सिपाहियों को गहनता से हर श्रद्धालु की जांच करते देखा जा सकता है। जन्मस्थली में सभी प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, मोबाइल और कैमरे ले जाना प्रतिबंधित है। इसलिए प्रवेशद्वार के बाहर ही निजी लॉकर्स की सुविधा है, जहां मात्र दो रुपये प्रति नग के हिसाब से शुल्क देकर श्रद्धालु अपनी सभी प्रकार की डिवाइस सुरक्षित रखवा सकते हैं। 

श्रीकृष्ण जन्मस्थली पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की जिज्ञासा और भक्ति के ज्वार के सामने परिक्रमा के बाद हुई थकान व अन्य बाधाएं उन्हें और उत्साहित करती हैं। उनके कदम स्वतः ही कारागार के उस कक्ष की ओर बढ़ते जाते हैं, जहां भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर रोहिणी नक्षत्र में रात्रि के 12 बजे माता देवकी और पिता वासुदेव की आठवीं संतान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।  

कान्हा के बाल स्वरूप को कष्ट न हो इसलिए दिन में मनाते हैं जन्मोत्सव
वृंदावन में 84 खम्मा गोकुल स्थित प्राचीन श्रीराधा दामोदर मंदिर का विशेष महत्व है, क्योंकि यहां जन्माष्टमी रात्रि में नहीं, बल्कि सुबह 10 से दोपहर 12:30 बजे के बीच मनाई जाती है। तर्क है कि मंदिर में श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप है और उन्हें रात्रि में जगाकर उत्सव मनाए जाने से कष्ट होता होगा। जन्माष्टमी पर यहां दो दिन तक प्रभु का अलौकिक शृंगार कर नंदोत्सव मनाया जाता है। छप्पनभोग की विशेष झांकी के साथ बधाईगान होता है। 

श्री राधा-दामोदर मंदिर के प्रधान सेवक कृष्णा गोस्वामी ने कान्हा का नाम दामोदर रखने का प्रसंग बताते हुए कहा कि माता यशोदा जब दही बिलो रहीं थीं, तो कान्हा वहां पहुंचे और माखन खाने की जिद करने लगे। माता ने मना कर दिया तो नटखट कान्हा ने लीलाएं दिखाईं और माता का ध्यान भटकाकर माखन चुरा लिया। माता लौटीं तो न माखन मिला न ही कान्हा। माता ने खोज-खबर ली तो वे सखाओं और वानरों संग छिपकर माखन खाते दिखे। क्रोधित माता ने उन्हें पकड़ लिया और ओखली से बांधने का प्रयास किया, पर हर बार रस्सी छोटी होती गई। अंत में माता का मन रखने के लिए कान्हा खुद ही ओखली से बंध गए। पेट के चारों ओर रस्सी बंधने के कारण उन्हें दामोदर भी कहा गया।  
 
संवत 1599 की माघ शुक्ल दशमी पर श्री गौड़यवैष्णव संप्रदाय, जिसकी स्थापना श्री चैतन्य महाप्रभुजी ने की थी, के श्रीरूप गोस्वामी ने राधा-दामोदरजी के विग्रहों की स्थापना की और सेवा का भार जीव गोस्वामी को सौंपा। मंदिर में श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा सेवित श्रीराधा छैल चिकनियांजी के श्रीविग्रह भी विराजमान हैं।


चार परिक्रमाएं गोवर्धन परिक्रमा के बराबर 
प्रधान सेवक गोस्वामी के अनुसार किवदंती है कि सनातन गोस्वामी नित्य गिरिराज की परिक्रमा करते थे। वृद्धावस्था में उनकी असमर्थता को देखकर भगवान ने बालक रूप में प्रकट होकर उन्हें श्याम रंग की डेढ़ हाथ लंबी वट पत्राकार गिरिराज शिला दी। उस पर भगवान के चरण चिह्न के साथ ही गाय के खुर का भी चिह्न हैं। भगवान ने गोस्वामीजी को आदेश दिया कि अब वे गिरिराज पर्वत के बजाय इसी शिला की परिक्रमा करें। गोस्वामीजी के देवलोक गमन के बाद शिला इसी मंदिर में स्थापित कर दी गई, तब से श्रद्धालुओं की ओर से मंदिर की चार परिक्रमा करने की परंपरा शुरू हुई। ऐसा कहा जाता है कि एक किमी से भी कम की चार परिक्रमाएं करने से श्रद्धालु गोवर्धन की सात कोस (25 किमी) लंबी परिक्रमा का पुण्य अर्जित कर लेते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed