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छुट्टी के दिन सुनवाई, फिर लाइसेंस रद्द: हाईकोर्ट की फटकार के बाद FDA ने फैसला पलटा, सिप्ला का क्या है मामला?
Sat, 29 Aug 2026 05:09 PM IST
राकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई।
Published by: राकेश कुमार
Updated Sat, 29 Aug 2026 05:09 PM IST
सार
लाइसेंस रद्द हुआ, लेकिन फैसला टिक नहीं पाया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एफडीए की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। अब सिप्ला को नए सिरे से जवाब देने का मौका मिलेगा। लाइसेंस पर अंतिम फैसला दोबारा कानूनी प्रक्रिया के बाद होगा। क्या है पूरा मामला? जानिए...
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सिप्ला लाइसेंस विवाद
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए ने सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड के पुणे स्थित सीएंडएफ केंद्र का दवा बिक्री लाइसेंस रद्द करने का आदेश वापस ले लिया है। यह फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद लिया गया। अदालत ने एफडीए की कार्रवाई को प्रथम दृष्टया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया और विभाग के रवैये को 'हाई-हैंडेड' यानी मनमाना करार दिया। अब एफडीए सिप्ला को नया कारण बताओ नोटिस जारी करेगा। इसके बाद कंपनी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा और फिर मामले में नए सिरे से फैसला लिया जाएगा।
छुट्टी के दिन सुनवाई को लेकर उठे सवाल
मामला सिप्ला की पुणे स्थित वडकी सुविधा से जुड़ा है। एफडीए ने 27 अगस्त से कंपनी के लाइसेंस रद्द करने का आदेश दिया था। यह कार्रवाई रिएक्टिन प्लस टैबलेट की पैकेजिंग, भंडारण और रिकॉल से जुड़ी कथित अनियमितताओं के आधार पर की गई थी। सिप्ला ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। कंपनी की ओर से वरिष्ठ वकील आबाद पोंडा ने अदालत को बताया कि एफडीए ने 26 अगस्त को सुनवाई के लिए कंपनी को बुलाया था। लेकिन 26 अगस्त राज्य सरकार द्वारा घोषित सार्वजनिक अवकाश था।
कंपनी ने सुनवाई टालने का अनुरोध किया क्योंकि उस दिन उसका कोई प्रतिनिधि उपलब्ध नहीं था। इसके बावजूद एफडीए ने उसी दिन लाइसेंस रद्द करने का आदेश जारी कर दिया। यहीं अदालत ने एफडीए की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ ने पूछा कि जब सुनवाई के लिए बुलाया गया दिन ही छुट्टी का था और कंपनी ने स्थगन मांगा था, तो उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिए बिना लाइसेंस कैसे रद्द किया गया?
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एफडीए ने क्या कहा?
एफडीए की ओर से दलील दी गई कि संबंधित कानून में सिप्ला को सुनवाई का विशेष अधिकार स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया है। हालांकि अदालत ने विभाग के इस रवैये को स्वीकार नहीं किया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की पीठ ने कहा कि एफडीए की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं दिखती। अदालत की आपत्ति के बाद एफडीए ने तत्काल लाइसेंस रद्द करने का आदेश वापस लेने पर सहमति जताई। अब विभाग नया कारण बताओ नोटिस जारी करेगा और पूरी प्रक्रिया के बाद कारणयुक्त आदेश पारित करेगा।
यह भी पढ़ें: कैब ड्राइवरों को बड़ी राहत: फडणवीस सरकार ने मराठी सीखने की समयसीमा बढ़ाई, बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका निपटाई
असल शिकायतें क्या थीं?
एफडीए की जांच में रिएक्टिन प्लस की पैकेजिंग पर कथित तौर पर ऐसे प्रचारात्मक शब्द पाए गए, जबकि यह शेड्यूल एच की प्रिस्क्रिप्शन दवा है।
इसके अलावा अधिकारियों ने भौतिक और डिजिटल स्टॉक रिकॉर्ड में अंतर, खरीद और बिक्री से जुड़े दस्तावेजों में कमी और रिकॉल निर्देशों के कथित पालन न होने जैसे मुद्दे भी बताए थे।
हालांकि सिप्ला ने कहा कि एफडीए की कार्रवाई उसके उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता या प्रभावशीलता को लेकर नहीं थी और इसमें मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं था। अब एफडीए को पूरी प्रक्रिया नए सिरे से करनी होगी। यानी लाइसेंस रद्द करने का अंतिम फैसला फिलहाल कायम नहीं है।
मामला क्या है?
एफडीए ने सिप्ला की पुणे वडकी सुविधा का लाइसेंस रद्द किया था। कार्रवाई रिएक्टिन प्लस की पैकेजिंग, स्टॉक और रिकॉल से जुड़ी कथित अनियमितताओं पर हुई। सिप्ला ने फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। कंपनी ने कहा कि सुनवाई 26 अगस्त की सार्वजनिक छुट्टी के दिन रखी गई थी। अब एफडीए नया कारण बताओ नोटिस जारी कर नए सिरे से फैसला करेगा।
इसका असर क्या होगा?
लाइसेंस रद्द करने का मौजूदा आदेश वापस हो गया है। सिप्ला को नए सिरे से अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। एफडीए को दोबारा पूरी प्रक्रिया अपनानी होगी। अंतिम निर्णय नए कारण बताओ नोटिस और सुनवाई के बाद होगा। सिप्ला ने कहा है कि मामले में मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं था।
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छुट्टी के दिन सुनवाई को लेकर उठे सवाल
मामला सिप्ला की पुणे स्थित वडकी सुविधा से जुड़ा है। एफडीए ने 27 अगस्त से कंपनी के लाइसेंस रद्द करने का आदेश दिया था। यह कार्रवाई रिएक्टिन प्लस टैबलेट की पैकेजिंग, भंडारण और रिकॉल से जुड़ी कथित अनियमितताओं के आधार पर की गई थी। सिप्ला ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। कंपनी की ओर से वरिष्ठ वकील आबाद पोंडा ने अदालत को बताया कि एफडीए ने 26 अगस्त को सुनवाई के लिए कंपनी को बुलाया था। लेकिन 26 अगस्त राज्य सरकार द्वारा घोषित सार्वजनिक अवकाश था।
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कंपनी ने सुनवाई टालने का अनुरोध किया क्योंकि उस दिन उसका कोई प्रतिनिधि उपलब्ध नहीं था। इसके बावजूद एफडीए ने उसी दिन लाइसेंस रद्द करने का आदेश जारी कर दिया। यहीं अदालत ने एफडीए की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ ने पूछा कि जब सुनवाई के लिए बुलाया गया दिन ही छुट्टी का था और कंपनी ने स्थगन मांगा था, तो उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिए बिना लाइसेंस कैसे रद्द किया गया?
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एफडीए ने क्या कहा?
एफडीए की ओर से दलील दी गई कि संबंधित कानून में सिप्ला को सुनवाई का विशेष अधिकार स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया है। हालांकि अदालत ने विभाग के इस रवैये को स्वीकार नहीं किया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की पीठ ने कहा कि एफडीए की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं दिखती। अदालत की आपत्ति के बाद एफडीए ने तत्काल लाइसेंस रद्द करने का आदेश वापस लेने पर सहमति जताई। अब विभाग नया कारण बताओ नोटिस जारी करेगा और पूरी प्रक्रिया के बाद कारणयुक्त आदेश पारित करेगा।
यह भी पढ़ें: कैब ड्राइवरों को बड़ी राहत: फडणवीस सरकार ने मराठी सीखने की समयसीमा बढ़ाई, बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका निपटाई
असल शिकायतें क्या थीं?
एफडीए की जांच में रिएक्टिन प्लस की पैकेजिंग पर कथित तौर पर ऐसे प्रचारात्मक शब्द पाए गए, जबकि यह शेड्यूल एच की प्रिस्क्रिप्शन दवा है।
इसके अलावा अधिकारियों ने भौतिक और डिजिटल स्टॉक रिकॉर्ड में अंतर, खरीद और बिक्री से जुड़े दस्तावेजों में कमी और रिकॉल निर्देशों के कथित पालन न होने जैसे मुद्दे भी बताए थे।
हालांकि सिप्ला ने कहा कि एफडीए की कार्रवाई उसके उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता या प्रभावशीलता को लेकर नहीं थी और इसमें मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं था। अब एफडीए को पूरी प्रक्रिया नए सिरे से करनी होगी। यानी लाइसेंस रद्द करने का अंतिम फैसला फिलहाल कायम नहीं है।
मामला क्या है?
एफडीए ने सिप्ला की पुणे वडकी सुविधा का लाइसेंस रद्द किया था। कार्रवाई रिएक्टिन प्लस की पैकेजिंग, स्टॉक और रिकॉल से जुड़ी कथित अनियमितताओं पर हुई। सिप्ला ने फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। कंपनी ने कहा कि सुनवाई 26 अगस्त की सार्वजनिक छुट्टी के दिन रखी गई थी। अब एफडीए नया कारण बताओ नोटिस जारी कर नए सिरे से फैसला करेगा।
इसका असर क्या होगा?
लाइसेंस रद्द करने का मौजूदा आदेश वापस हो गया है। सिप्ला को नए सिरे से अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। एफडीए को दोबारा पूरी प्रक्रिया अपनानी होगी। अंतिम निर्णय नए कारण बताओ नोटिस और सुनवाई के बाद होगा। सिप्ला ने कहा है कि मामले में मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं था।