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मिसाल: कोल्हापुर के हेरवाड़ गांव की पहल, पति की मौत के बाद होने वाली इस कुप्रथा को किया खत्म

Sun, 08 May 2022 04:38 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुम्बई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुम्बई Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sun, 08 May 2022 04:38 PM IST
सार

सोलापुर की करमाला तहसील में महात्मा फुले समाज सेवा मंडल के संस्थापक और अध्यक्ष प्रमोद ज़िंजादे ने इसके लिए पहल की थी। उन्होंने ग्राम पंचायत को एक महिला के साथ होने वाली इस 'अपमानजनक' परंपरा पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक प्रस्ताव पारित करने के लिए प्रोत्साहित किया।

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village in Kolhapur passes resolution to ban widow rituals in death centenary year of Shahu Maharaj
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media

विस्तार

महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के एक गांव ने छत्रपति शाहू महाराज के मृत्यु शताब्दी वर्ष में एक अच्छी पहल की है। इस गांव ने पति की मृत्यु के बाद 'विधवा अनुष्ठान' पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित किया है। यहां की  शिरोल तहसील के हेरवाड़ गांव ने 4 मई को पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री  के चूड़ियां तोड़ने, माथे से 'कुमकुम' (सिंदूर) पोंछने और मंगलसूत्र को हटाने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। ग्राम पंचायत सरपंच सुरगोंडा पाटिल ने इसकी जानकारी दी। 

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उन्होंने बताया कि सोलापुर की करमाला तहसील में महात्मा फुले समाज सेवा मंडल के संस्थापक और अध्यक्ष प्रमोद ज़िंजादे ने इसके लिए पहल की थी। उन्होंने ग्राम पंचायत को एक महिला के साथ होने वाली इस 'अपमानजनक' परंपरा पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक प्रस्ताव पारित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
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पाटिल ने कहा कि जब हम शाहू महाराज की 100 वीं पुण्यतिथि मना रहे हैं, जिन्होंने महिलाओं की मुक्ति के लिए काम किया। तब हमें अपने इस प्रस्ताव पर बहुत गर्व महसूस होता है क्योंकि इसने हेरवाड़ को अन्य ग्राम पंचायतों के लिए एक मशाल वाहक बना दिया है। 
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इस पहल को लेकर महात्मा फुले समाज सेवा मंडल के संस्थापक और अध्यक्ष प्रमोद ज़िंजादे ने कहा कि कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान हमारे एक सहयोगी की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई थी। उनके अंतिम संस्कार के दौरान  मैंने देखा कि कैसे उनकी पत्नी को चूड़ियों को तोड़ने, मंगलसूत्र को हटाने और पोंछने के लिए मजबूर किया गया। उस समय दब ये सब हो रहा था तब दृश्य हृदयविदारक था।  इसने महिला के दुख को बढ़ा दिया था। ये देखकर मैने इस तरह की प्रथा को रोकने का फैसला करते हुए इसको लेकर गांव के नेताओं और पंचायतों से संपर्क किया। 

ज़िंजादे ने बताया कि उदाहरण स्थापित करने के लिए सबसे पहले मैने स्टाम्प पेपर पर घोषणा की कि मेरी मृत्यु के बाद, मेरी पत्नी को इस प्रथा के अधीन नहीं किया जाना चाहिए। इसके बाद 20 से ज्यादा पुरुषों ने मेरी घोषणा का समर्थन किया। इसके बाद हेरवाड़ ग्राम पंचायत ने मुझसे संपर्क किया। तब मैनें प्रस्तावित किया कि वे इसको लेकर एक प्रस्ताव पारित करें।  जिंजादे ने बताया कि उनके इस कदम का लोग समर्थन कर रहे हैं। इतना ही नहीं इसका प्रचार प्रसार करने के लिए एक बहु-आयामी कार्यक्रम भी बनाया गया है।


हेरवाड़ से लगभग 21 किलोमीटर दूर अर्जुनवाड़ गांव की रहने वाली अंजलि पेलवान (35) जो 2020 में अपने पति को खो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि हमने राज्य मंत्री राजेंद्र यद्राकर को विधवाओं के हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन दिया है, जिसमें इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाने की मांग की गई है।

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