आखिर क्यों एनकाउंटर को फर्जी साबित करना है मुश्किल, 3 साल में 74 जांच, सभी में यूपी पुलिस बरी
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उत्तर प्रदेश में एक और दुर्दांत अपराधी मारा जा चुका है। आठ पुलिसकर्मियों को मारने वाला विकास दुबे अब इतिहास हो चुका है। मध्य प्रदेश के उज्जैन से पकड़ा गया विकास दुबे जिस ढंग से मारा गया, उस पर काफी सवाल उठ रहे हैं।
एक अपराधी जिसे मंदिर में एक निहत्था गार्ड दबोच लेता है, वो हथियारबंद पुलिसकर्मियों की गिरफ्त से निकल पड़ता है। मध्य प्रदेश से चली पुलिस की गाड़ी यूपी में आने के बाद अचानक बारिश में फिसल जाती है। और विकास दुबे पुलिस की बंदूक छीनकर भागने का प्रयास करता है। आत्मरक्षा में पुलिस को उस पर गोली चलानी पड़ती है। अब यह सच है या कहानी...ये तो जांच के बाद ही पता चल सकता है।
मगर अब तक के एनकाउंटर की जांच के इतिहास पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि किसी एनकाउंटर को फर्जी साबित करना बहुत ही मुश्किल काम है। कई मामलों में तो दशकों तक सच सामने नहीं आ पाता। आखिर क्यों किसी मुठभेड़ को फर्जी साबित करना इतना मुश्किल है, आइए जानते हैं...
दशकों तक चलती रहती है जांच
- एनकाउंटर फर्जी है या नहीं, इसे लेकर लंबी कानूनी प्रक्रिया चलती रहती है। कई मामलों की जांच तो दशकों तक चलती रहती है।
- पंजाब के दो पुलिसकर्मियों को सजा दिलाने के लिए सीबीआई की विशेष अदालत को 26 साल की मशक्कत करनी पड़ी।
- 1992 में इन पुलिसकर्मियों ने 15 साल के लड़के को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था।
- इसी तरह यूपी के 17 पुलिसकर्मियों को सजा दिलाने में 20 साल का समय लग गया। इन्होंने 1992 में ही 24 साल के युवक का एनकाउंटर किया था।
- दिल्ली के कनॉट प्लेस में 1997 में एक कारोबारी का एनकाउंटर कर दिया गया था। 10 पुलिसकर्मियों को दोषी साबित करने में एक दशक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।
IPC की ये धाराएं पुलिस का बड़ा हथियार
- भारतीय दंड संहिता (IPC) में कहीं भी एनकाउंटर या न्यायिक हिरासत में मौत को लेकर उल्लेख नहीं किया गया है।
- मगर आईपीसी की 96 से 106 धाराएं पुलिसकर्मियों के लिए एक बड़ा हथियार साबित होती हैं। इसके जरिए वे एनकाउंटर को आत्मरक्षा में उठाया गया कदम दिखा देते हैं।
- ये धाराएं आत्मरक्षा में कदम उठाने का अधिकार देती हैं। यह धारा न सिर्फ पुलिस बल्कि आम लोगों पर भी लागू होती हैं।
- विकास दुबे से लेकर अधिकतर एनकाउंटर में पुलिस का बयान यही होता है कि उसने आत्मरक्षा में यह कदम उठाया।
स्पष्ट दिशानिर्देशों का अभाव
- साल 2014 में हालांकि तत्कालीन चीफ जस्टिस आर एम लोढ़ा ने मुंबई में 1995 से 1997 के बीच हुए 99 एनकाउंटर पर दिशानिर्देश बनाने के आदेश दिए थे।
- मुंबई में दो साल में हुए 99 एनकाउंटर में 135 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद अदालत ने एनकाउंटर और उसकी जांच के लिए 16 प्वाइंट के दिशानिर्देश जारी किए थे।
- इसमें पूरी प्रक्रिया को लिखित या इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में रिकॉर्ड करने की बात कही गई थी।
- मगर अक्सर जांच करने वाले भी सिस्टम का ही हिस्सा होते हैं। इस वजह से इन मामलों में सही तरह से निष्पक्ष जांच नहीं हो पाती है।
यूपी में तीन साल में 119 मौत
- योगी आदित्यनाथ मार्च, 2017 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। तब से तक अब तक राज्य में हुए एनकाउंटर में 119 मौतें हो चुकी हैं। विकास दुबे का नंबर 119 था।
- अब तक 74 मामलों की जांच हो चुकी है, जिनमें सभी में पुलिस को क्लीन चिट मिल चुकी है।
- इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 61 मामलों में तो क्लोजर रिपोर्ट भी जमा हो चुकी है, जिसे अदालत ने स्वीकार भी कर लिया है।
- रिकॉर्ड के मुताबिक 6145 आपरेशन किए गए, जिनमें 119 लोग मारे गए और 2258 घायल हुए हैं।
- इस दौरान 13 पुलिसकर्मी भी शहीद हुए, जिनमें से 8 तो कानपुर में ही मारे गए।
- पुलिस को जो भी खुफिया सूचना मिलती है, उसे वह केस डायरी में लिखे या फिर हो सके तो रिकॉर्ड करके रखे।
- जांच का जिम्मा सीआईडी या फिर दूसरे थाने की पुलिस को सौंपा जाए।
- मौत के सभी मामलों में धारा 176 के तहत मजिस्ट्रेट जांच तुरंत शुरू की जाए।
- मानवाधिकार आयोग की जांच की जब तक जरूरत नहीं है, तब तक यह आशंका न हो कि निष्पक्ष जांच नहीं की जा सकेगी।
मानवाधिकार आयोग के निर्देश
- अगर थाना प्रभारी को एनकाउंटर की सूचना मिलती है, तो वह इसे तुरंत उचित रजिस्टर में लिखे।
- इसके तुरंत बाद इसे संज्ञेय अपराध मानकर जांच शुरू कर देनी चाहिए।
- अगर पुलिस दोषी साबित होती है, तो मरने वाले के परिवार को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।