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भुज की इन वीरांगनाओं को कभी नहीं भूल सकता देश

Sat, 16 Dec 2017 12:11 PM IST
अतुल सिन्हा/भुज
अतुल सिन्हा/भुज Updated Sat, 16 Dec 2017 12:11 PM IST
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vijay diwas Virangana Smarak bhuj ladies helped airforce in making airstrip
वीरांगना स्मारक

8 दिसंबर 1971...रात के अंधेरे में पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों की जबरदस्त बमबारी... गुजरात के कच्छ में सेना का मुख्यालय भुज.. साइरन की आवाज.. घरों में दुबके और सहमे लोग। भारतीय सैनिकों की जवाबी कार्रवाई.. लेकिन पाकिस्तान का मंसूबा बेहद खतरनाक। एक..दो..तीन..चार......साठ, इकसठ, बासठ। भुज के आर्मीबेस में बनी हवाई पट्टी पर एक के बाद एक साठ से ज्यादा बमों से हमला और पूरी की पूरी हवाई पट्टी ध्वस्त।

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भुज के एयरबेस को तबाह करके भारतीय वायुसेना को सकते में डालकर पाकिस्तान निश्चिन्त था। पाक को लगा कि उसने जो तबाही मचाई वो महीनों तक भारत को चैन से नहीं रहने देगी। लेकिन उसे ये नहीं पता था कि भुज के लोग कितने जाबांज हैं। आर्मीबेस के पास ही माधापर की महिलाएं अपने देश के लिए क्या कर सकती हैं। पाकिस्तान लगातार हवाई हमले कर रहा था लेकिन हमारे जहाज उड़ने में नाकाम थे। माधापुर के स्थानीय लोगों और खासकर यहां की महिलाओं ने मोर्चा संभाला और हवाई हमलों के बीच चुपचाप उन्होंने 72 घंटे तक जान पर खेलकर इस हवाई पट्टी को फिर से बना दिया।
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इन महिलाओं में देशभक्ति का वो जज्बा था कि हमारी सेना ने इन्हें दिल से सैल्यूट किया और फिर हमारे जाबांज जिस तरह यहां से उड़े और इतने बम बरसाए कि पाकिस्तान के हौसले पस्त हो गए। आखिरकार इन महिलाओं के जज़्बे ने इस मुश्किल वक्त में देशप्रेम की जो अनोखी मिसाल पेश की, उसे भुज ही नहीं देश की सेना हमेशा याद करती है।

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भूकंप में भी की थी मदद

vijay diwas Virangana Smarak bhuj ladies helped airforce in making airstrip
वीरांगना स्मारक
माधापर का नवावास वैसे भी भूकंप की तबाही के बाद खुद को फिर से अपने दम पर बसाने वाला एक अनोखा गांव तो है ही, लेकिन अपनी जाबांजी की कई दास्तान भी समेटे हुए है। 2001 के भूकंप में भी आर्मी का वो एयरबेस ही नहीं पूरा आर्मी कैंप तबाह हो गया था। बाहर से आने वाली राहत सामग्रियों के लिए यही एक ठिकाना था, लेकिन भूकंप के बाद कई दिनों तक यहां आवाजाही बंद रही। बाद में इसे फिर से बनाया गया और अब इस बेस को इतना मजबूत बना दिया गया है ताकि भूकंप या दुश्मन का कोई भी खतरा इसे नुकसान न पहुंचा सके।

1971 की जंग की इन वीरांगनाओं में से कुछ आज भी माधापर में रहती हैं। उन्हें इस बात का अफसोस था कि उन्हें पहचान नहीं मिली, उनकी वीरता के लिए कोई मदद नहीं मिली, यहां तक कि रेलवे में मुफ्त यात्रा की सुविधा भी नहीं मिली, लेकिन कुछ साल पहले उनकी वीरता को याद करते हुए माधापर के मुख्य द्वार पर जो वीरांगना स्मारक बनाया गया उससे उन्हें कुछ राहत जरूर मिली। 1971 की लड़ाई के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मानित किया था, तब 50 हजार रुपए का इनाम भी दिया था। अब इतने साल बाद 2014 में तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने इस वीरांगना स्मारक को आम लोगों को समर्पित किया। उसी साल एयरफोर्स दिवस के मौके पर उनमें से 70 वीरांगनाओं को सम्मानित किया गया।

आज जब आप भुज पहुंचेंगे तो शहर से पहले ही आपको ये शानदार स्मारक नजर आ जाएगी, वह आपको उन वीरांगनाओं की याद दिलाएगा जिन्होंने जान पर खेलकर देशभक्ति की शानदार मिसाल पेश की।
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