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आसान नहीं महागठबंधन की राह, पढ़ें भाजपा को किन समीकरणों से है उम्मीद
Mon, 14 Jan 2019 06:48 PM IST
Nilesh Kumar
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: Nilesh Kumar
Updated Mon, 14 Jan 2019 06:48 PM IST
सार
- नेतृत्व व लाभार्थियों के सहारे भाजपा की बंधी उम्मीद
- सपा और बसपा के बागियों पर होगी पार्टी की नजर
- गैर जाटव एससी–गैर यादव ओबीसी वोटबैंक अहम
- शिवपाल की खेमेबाजी से भाजपा को हो सकता है लाभ
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akhilesh, mayawati
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विस्तार
सपा-बसपा गठबंधन इस समय राजनीतिक हलके में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। लोकसभा चुनाव में इसे अखिलेश और मायावती का 1993 में आजमाया हुआ ट्रंप कार्ड माना जा रहा है। वहीं, जानकारों का मानना है कि मौजूदा समीकरणों में गठबंधन की राह इतनी भी आसान रहने वाली नहीं है।
कई कारण ऐसे हैं जो अखिलेश और मायावती को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं। भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसे ताकतवर नेता का होना, गरीब सवर्णों, अति पिछड़ों और महादलित जातियों का आरक्षण कार्ड, सपा-बसपा की राजनीति में स्थित कुछ अंतर्विरोध का होना और अंत में कांग्रेस का मैदान में अकेले कूदकर माहौल को त्रिकोणीय बनाना भाजपा के लिए माकूल जमीन तैयार करता है।
भाजपा को इस बात का भरोसा है कि सपा-बसपा का गठबंधन इतना सफल नहीं होने वाला जितना कि उसे प्रचारित किया जा रहा है। कारण है कि सामाजिक स्तर पर बसपा के जाटव वोटर और सपा के कोर यादव वोटर एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं।
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भाजपा नेता अवस्थी के मुताबिक़ 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान गैर जाटव दलितों, महादलितों और गैर जाटव ओबीसी जातियों को अपने साथ जोड़ने में अच्छी सफलता हासिल की थी। पार्टी इस बार भी अपने उन्हीं वोटों को मजबूती से अपने साथ बनाये रखने की कोशिश कर रही है।
शिवपाल की मजबूती भी सपा के दावे को कमजोर करेगी। संभल, एटा, मैनपुरी जैसे क्षेत्रों के आलावा जिन सीटों पर सपा की बजाय बसपा के उम्मीदवार उतरेंगे, वहां यादवों का झुकाव शिवपाल यादव की तरफ हो जाने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि ये समीकरण भाजपा के पक्ष में जा सकता है।
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कई कारण ऐसे हैं जो अखिलेश और मायावती को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं। भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसे ताकतवर नेता का होना, गरीब सवर्णों, अति पिछड़ों और महादलित जातियों का आरक्षण कार्ड, सपा-बसपा की राजनीति में स्थित कुछ अंतर्विरोध का होना और अंत में कांग्रेस का मैदान में अकेले कूदकर माहौल को त्रिकोणीय बनाना भाजपा के लिए माकूल जमीन तैयार करता है।
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भाजपा को इस बात का भरोसा है कि सपा-बसपा का गठबंधन इतना सफल नहीं होने वाला जितना कि उसे प्रचारित किया जा रहा है। कारण है कि सामाजिक स्तर पर बसपा के जाटव वोटर और सपा के कोर यादव वोटर एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं।
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आधी रह जाएगी सपा-बसपा के उम्मीदवारों की संख्या
उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता आलोक अवस्थी का कहना है कि सिर्फ नेताओं में गठबंधन होने से ये वोटबैंक में नहीं बदलेगा। यानी एक पार्टी के वोटों का गठबंधन के दूसरे सहयोगी उम्मीदवारों तक पहुंचाना आसान नहीं होगा। सपा-बसपा के उम्मीदवारों की संख्या भी पिछली बार के मुकाबले आधी रह जाएगी। ऐसे में जिन लोगों को टिकट नहीं मिलेगा, उनका रुख गठबंधन के पक्ष में न होने की सम्भावना भी काफी गुल खिला सकती है।भाजपा नेता अवस्थी के मुताबिक़ 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान गैर जाटव दलितों, महादलितों और गैर जाटव ओबीसी जातियों को अपने साथ जोड़ने में अच्छी सफलता हासिल की थी। पार्टी इस बार भी अपने उन्हीं वोटों को मजबूती से अपने साथ बनाये रखने की कोशिश कर रही है।
शिवपाल की मजबूती भी सपा के दावे को कमजोर करेगी। संभल, एटा, मैनपुरी जैसे क्षेत्रों के आलावा जिन सीटों पर सपा की बजाय बसपा के उम्मीदवार उतरेंगे, वहां यादवों का झुकाव शिवपाल यादव की तरफ हो जाने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि ये समीकरण भाजपा के पक्ष में जा सकता है।