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UP Election 2022: यूपी की सेहत अभी तक चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं? क्या मतदाता खुद ही नहीं करते बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की मांग ?

Wed, 29 Dec 2021 02:04 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 29 Dec 2021 02:04 PM IST
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सार
विशेषज्ञ मानते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल में एक सकारात्मक अनुभव की कमी न केवल लोगों को निजी स्वास्थ्य सुविधाओं की ओर धकेलती है। बल्कि स्वास्थ्य के मुद्दे को राजनीतिक विचारों और नेताओं की प्राथमिकता की सूची से भी बाहर कर देती है। स्वास्थ्य मुद्दों पर अब तक कोई भी चुनाव न तो लड़ा गया और न ही जीता गया। क्या चुनावी के लिए तैयार हो रहे राज्यों में स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित मुद्दों पर चर्चा होगी? क्या लोग बेहतर स्वास्थ्य और पोषण की मांग करेंगे?
 
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uttar pradesh niti aayog health index is Healthcare political issue in UP election 2022, Don't voters themselves demand better health services in election
उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस - फोटो : PTI

विस्तार

आबादी के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में देश में सबसे फिसड्डी साबित हुआ है। केंद्र सरकार के थिंक टैंक माने जाने वाले नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स ने उत्तर प्रदेश को देश के सभी राज्यों में सबसे निचला स्थान दिया है। जबकि इसी इंडेक्स में केरल एक बार फिर अव्वल आया है। उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की बदाहली का मंजर लोगों ने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान भी देखा था।


अस्पतालों में बिस्तरों के लिए मारामारी, ऑक्सीजन की कमी से लोगों की सांसों पर आए संकट और गंगा किनारे तैरती लाशों की तस्वीरें अभी भी लोगों की जेहन में ताजा हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि उत्तर प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी से मौत की अनेक घटनाएं सामने आईं। इस हाल को देखकर इलाहाबाद हाईकोर्ट को यह टिप्पणी करनी पड़ी कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था राम भरोसे चल रही है। इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है। 


कोरोना काल की वजह से लोगों ने स्वास्थ्य सुविधाओं के महत्व और जरूरत को करीब से महसूस किया। चिकित्सा पर खर्च अब घरेलू बजट का हिस्सा बन गया है और यह लोगों के रोजमर्रा की जिंदगी में पहले एजेंडे पर है। नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स से पहले कोरोना काल के दौरान ही यूपी की स्वास्थ्य संबंधी सार्वजनिक नीतियां और स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा नीति निर्माताओं के बीच अक्सर चर्चा का विषय रहा है।

फिर भी कोरोना काल के बाद यूपी में हो रहे पहले चुनाव में भी अभी तक ‘सेहत’ राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाया है। क्या वजह है कि उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार या चिकित्सा विकास को चुनावी मुद्दा नहीं माना जाता है। जबकि इसी प्रदेश ने देश में सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए हैं। हालांकि 2004 से देश भर में प्रमुख दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में स्वास्थ्य का जिक्र करना शुरु किया है।
 

यूपी चुनाव 2017, सिद्धार्थनगर, वोटिंग
यूपी चुनाव 2017, सिद्धार्थनगर, वोटिंग - फोटो : SELF
आबादी के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन नहीं
इस बारे में पूछे जाने पर लखनऊ के पूर्व सीएमओ डॉ एस एन एस यादव ने कहा ‘चुनाव में स्वास्थ्य को मुद्दा क्यों नहीं बनाया जाता यह तो राजनीतिक पार्टियां ही बता पाएंगी लेकिन सियासी दलों के लिए यह समझना जरूरी है कि शिक्षा और स्वास्थ्य यह सब बेहद बुनियादी बातें हैं जो हर नागरिक का अधिकार है। यूपी की बात करें तो अभी भी हम आबादी के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय मानकों को पालन नहीं कर पा रहे हैं। जो अस्पताल 2012 से 2017 में बने थे उनमें से कई अभी तक ऑपरेट नहीं हो रहे हैं। आम आदमी परेशान है।

उनका कहना है, कोरोना की दूसरी लहर में इतने मरीज आ गए कि अस्पताल और डॉक्टर उन्हें संभाल नहीं पा रहे थे। इसकी मुख्य वजह यही थी कि हमारे पास संसाधनों और डॉक्टरों की कमी है और चुनावों में कभी इस पर बात नहीं की जाती। ग्रामीण इलाकों के लोगो को जो ज्यादातर सरकारी चिकित्सा व्यवस्थाओं पर ही निर्भर रहते हैं और वहां अच्छे डॉक्टर्स की कमी है। ग्रामीण इलाकों में जो डॉक्टर हैं उन्हें अच्छी सुविधाएं नहीं मिलती। जबकि उन्हें ग्रामीण इलाकों में रहने के लिए बुनियादी सुविधाएं, सुरक्षा और उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए’।   

डॉ एस एन एस यादव कहते हैं व्यवस्था में बड़े पैमाने पर सुधार की आवश्यकता है और यह सुधार तभी हो सकता है जब चुनाव में स्वास्थ्य को मुद्दा बनाया जाए। केवल घोषणापत्र में स्वास्थ्य को शामिल कर लेना भर काफी नहीं, इसे पूरा करने की भी जरूरत है। 
 

यूपी चुनाव
यूपी चुनाव - फोटो : Amar Ujala Digital
लोगों को नीतियों-कार्यक्रमकों के बजाए धर्म-जाति से गोलबंद किया जा रहा
उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं आप आम लोगों से बात करें तो वे रोजगार, महंगाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा व्यवस्था ही मुख्य समस्या बताते हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के अंदर इन विषयों पर सोचने, नीतियां एवं कार्यक्रम बनाने वाले संक्षम लोग नहीं हैं। आर्थिक उदारीकरण में यह सब बाजार के हवाले कर दिया गया है। अब लोगों को विचारधारा, नीतियों कार्यक्रम के बजाय सम्प्रदाय और जातीय घृणा फैलाकर गोलबंद किया जा रहा है। वे कहते हैं प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को मंदिर निर्माण के बजाय सुशासन और जन कल्याणकारी काम पर ध्यान देना चाहिए।

क्या मतदाताओं के लिए चुनाव में स्वास्थ्य मुद्दा है
यह मानना गलत होगा कि नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाओं की परवाह नहीं है। कोरोना महामारी से पहले 2019 में लोकनीति-सीएसडीएस ने 'दक्षिण एशिया में लोकतंत्र की स्थिति' के अपने एक अध्ययन  में पाया गया कि लोग उम्मीद करते हैं कि सरकार बुनियादी चिकित्सा देने की अधिकतम जिम्मेदारी लेगी। लेकिन जैसे ही मतदान की बारी आती है  तो स्वास्थ्य कभी भी मतदाताओं के लिए चुनावी मुद्दा नहीं बनता है। न ही राजनीतिक दल आमतौर पर अपने घोषणापत्र या अभियान में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को ज्यादा तवज्जो देते हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव 2020
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 - फोटो : ANI
क्या लोग स्वास्थ्य के मुद्दे पर वोट डालते हैं? 
हालांकि जब यह माना गया कि महामारी की दूसरी लहर और इसके मौजूद रहने के दौरान मतदाता स्वास्थ्य को चुनावी मुद्दे के रूप में सबसे ज्यादा प्राथमिकता देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। लोकनीति-सीएसडीएस ने 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद किए अपने अध्ययन में यह पाया कि  एक फीसदी से भी कम मतदाताओं ने कहा है कि मतदान करते उनके दिमाग में बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था का ख्याल था। स्वास्थ्य और अस्पताल की सुविधाओं को केवल 0.3 फीसदी मतदाताओं ने एक प्रमुख मुद्दा माना। 2014 के सर्वेक्षण में भी ऐसे ही परिणाम सामने आए थे, जिसमें सेहत को महज 0.4 प्रतिशत लोगों ने प्राथमिकता दी थी। 

बिहार में भी ऐसा ही हुआ
2020 में बिहार विधानसभा चुनाव कोरोना की पहली लहर के ठीक बाद हुए थे। इस चुनाव में विकास, रोजगार, 10 लाख नौकरी और महंगाई मतदाताओं के लिए प्रमुख मुद्दे थे। यहां भी महज 0.3 प्रतिशत लोगों के लिए स्वास्थ्य महत्वपूर्ण था। लोगों का यह जवाब बिहार में 2015 में हुए पिछले चुनाव से बहुत अलग नहीं था।  लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वेक्षण के मुताबिक 2021 की शुरुआत में, जब भारत को दूसरी लहर का सामना करना पड़ा, उससे पहले चार राज्यों में चुनाव हुए। यहां भी, एक फीसदी से भी कम मतदाताओं ने स्वास्थ्य को चुनावी मुद्दा बताया। 

यूपी में कोरोना (फाइल फोटो)
यूपी में कोरोना (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
मंदिर-मस्जिद आगे-आगे, स्वास्थ्य के मुद्दे पीछे,
लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति और सामाजिक कार्यकर्ता रूप रेखा वर्मा का कहना है कि हमारे समाज में कुछ चीजों की चेतनाएं कम है। शिक्षा व्यवस्था के कारण सूचनाएं तो दी जाती है लेकिन जिंदगी के असल मुद्दों के प्रति चेतना और  जागरुकता नहीं है। पूरा सरकारी तंत्र इस कदर नकारा है कि उन्हें भी कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी हो पा रही हैं या नहीं। कोरोना काल में हमने अपनी आंखों से अस्पतालों के बाहर ऑक्सीजन के लिए लोगों को दर-दर भटकते और उनकी जान जाते देखा है। कोरोना काल के समय एक विशेष तरह के स्वास्थ्य सुविधा की जरूरत थी, लेकिन इस सरकार ने ध्यान नहीं दिया।

वे कहती हैं यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि यूपी में हिंदू-मुसलमान और मंदिर मस्जिद के अलावा कोई मुद्दा नहीं बनता। ऐसे में स्वास्थ्य के मुद्दे पीछे रहते हैं, जो आवाज उठाते हैं उनकी सुनी नहीं जाती। सियासी दल आसानी से लोगों को इधर-उधर के मुद्दे पर बरगला देती है और बेचारी जनता उनके भरोसे रह जाती है। 
 

यूपी में कोरोना (फाइल फोटो)
यूपी में कोरोना (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
नागरिक पहले खुद अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें
उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग से ही जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि एक अनुमान के मुताबिक 70 प्रतिशत मरीज बेहतर इलाज के लिए निजी क्षेत्र की तरफ भाग रहे हैं। 80 प्रतिशत एंबुलेंस सेवा निजी हाथों में है। भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1.3 प्रतिशत ही सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है। इससे निजी सेवाओं पर निर्भरता बढ़ रही है। निजी स्वास्थ्य सेवा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की तुलना में चार गुना अधिक महंगा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नागरिक खुद ही स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं दे रहे और ना ही वे इसकी चुनावी मांग करते हैं, इसलिए  सियासी दल भी इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते हैं। जरूरत है कि नागरिक खुद पहले अपनी सेहत को प्राथमिकता दें तो राजनीतिक दल भी इसे चुनावी एजेंडा बनाने के लिए मजबूर होंगे। 
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