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तकनीक: एआई से आसान हुआ काम, लेकिन क्या कमजोर हो रही इंसान की सोचने की क्षमता
Wed, 23 Sep 2026 11:25 PM IST
पवन पांडेय
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Wed, 23 Sep 2026 11:25 PM IST
सार
जनरेटिव एआई पढ़ाई और काम को आसान बनाता है, लेकिन विशेषज्ञों को चिंता है कि इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल सोचने और समस्या हल करने की क्षमता को कमजोर कर सकता है। शोध बताते हैं कि एआई से बेहतर प्रदर्शन हमेशा वास्तविक सीखने का संकेत नहीं है। सही इस्तेमाल में एआई सोचने में मददगार हो सकता है।
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एआई से आसान हुआ काम?
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जनरेटिव एआई ने पढ़ाई, शोध और रोजमर्रा के काम को तेज और आसान बना दिया है, लेकिन अब वैज्ञानिक और शिक्षा विशेषज्ञ एक अहम सवाल उठा रहे हैं क्या हर काम का जवाब एआई से लेने की आदत इंसान की सोचने, तर्क करने और समस्याओं को खुद हल करने की क्षमता को कमजोर कर सकती है? नेचर मे प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआती शोधों में ऐसे संकेत मिले हैं कि एआई का इस्तेमाल किस तरीके से किया जाता है, इसका सीखने और आलोचनात्मक सोच पर बड़ा असर पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी यह साबित नहीं हुआ है कि जनरेटिव एआई अपने आप में सीखने की क्षमता को नुकसान पहुंचाता है।
अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ कॉलेजेज एंड यूनिवर्सिटीज के 2025 के एक सर्वे में 1,000 से अधिक अमेरिकी शिक्षकों को शामिल किया गया था। इसमें 90% शिक्षकों ने कहा कि जनरेटिव एआई विद्यार्थियों की आलोचनात्मक सोच को कम कर सकता है।वहीं, इस साल 8,000 से अधिक लोगों को शामिल करने वाले एक वैश्विक सर्वे में एआई का इस्तेमाल करने वाले करीब 20% उच्च शिक्षा विद्यार्थियों ने कहा कि अब उन्हें एआई के बिना समस्याओं पर काम करना अधिक कठिन लगता है। इन आंकड़ों के बीच शिक्षा विशेषज्ञों की चिंता यह है कि विद्यार्थी अगर किसी समस्या को समझने, संभावित उत्तरों पर विचार करने और गलतियों से सीखने के बजाय सीधे एआई से समाधान लेने लगें तो सीखने की मूल प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है।
एआई पूरा कर सकता है विद्यार्थी का काम
चीन की सिंघुआ यूनिवर्सिटी में शिक्षा शोधकर्ता लिशियांग यान को एक ऑनलाइन पाठ्यक्रम तैयार करते समय इसका प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। उन्होंने एजेंटिक एआई का इस्तेमाल किया तो पाया कि एआई असाइनमेंट पूरे करने, सवालों के जवाब देने और ऑनलाइन चर्चाओं में भाग लेने जैसे कामज्ञखुद कर सकता है। समस्या यह थी कि विद्यार्थी इन गतिविधियों में सक्रिय रूप से सोचने के बजाय अपना काम एआई को सौंप सकते थे। यान के मुताबिक, इससे यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि शिक्षा में एआई का इस्तेमाल विद्यार्थियों की बौद्धिक भागीदारी बढ़ाने के लिए हो रहा है या उनकी जगह लेने के लिए।
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एआई हटने के बाद गणित में प्रदर्शन गिरा
एआई के प्रभाव को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन 2024 में सामने आया था। इसमें पाया गया कि जनरेटिव एआई की मदद मिलने पर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों ने गणित की समस्याएं बेहतर तरीके से हल कीं। लेकिन जब एआई की सुविधा हटा दी गई तो उनका प्रदर्शन उन विद्यार्थियों से भी खराब रहा, जिन्होंने एआई का इस्तेमाल नहीं किया था।यह परिणाम इस संभावना की ओर संकेत करता है कि एआई से तत्काल बेहतर प्रदर्शन हमेशा वास्तविक सीखने का प्रमाण नहीं होता। विद्यार्थी किसी समस्या का सही उत्तर पा सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह यह भी सीख ले कि अगली बार वही समस्या बिना तकनीकी सहायता के कैसे हल करनी है।
लेकिन एआई हमेशा नुकसान नहीं करता
शोधकर्ता इस मुद्दे पर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। नेचर की रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक हुए शोधों के नतीजे एक जैसे नहीं हैं। एआई अपेक्षाकृत नई तकनीक है और इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर बड़े और लंबे अध्ययन अभी सीमित हैं।कुछ शोधों में इसके सकारात्मक प्रभाव भी सामने आए हैं। अगर एआई सीधे तैयार उत्तर देने के बजाय विद्यार्थी को सवालों के जरिए सोचने, तर्क करने और समस्या का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करे तो यह सीखने में मदद कर सकता है। यानी फर्क केवल इस बात से नहीं पड़ता कि विद्यार्थी एआई का इस्तेमाल कर रहा है या नहीं, बल्कि इससे पड़ता है कि वह उसका इस्तेमाल सोचने में मदद लेने के लिए कर रहा है या सोचने का काम ही एआई को सौंप रहा है।
मानसिक मेहनत सीखने के लिए जरूरी
वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक डेनियल विलिंगहम के मुताबिक सीखना मानसिक प्रक्रिया का परिणाम है और यह प्रक्रिया सामान्य तौर पर मेहनत मांगती है। एआई जिस तेजी से उत्तर उपलब्ध कराता है, वह इसी मानसिक मेहनत को कम कर सकता है।प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक तानिया लोम्ब्रोजो का कहना है कि सीखने में कुछ हद तक कठिनाई उपयोगी होती है। खुद से किसी सवाल का जवाब तलाशना, जानकारी को याद से दोहराना, किसी विषय को अपने शब्दों में समझाना और अलग-अलग संभावनाओं पर विचार करना समझ को मजबूत कर सकता है।इसी को विशेषज्ञ मेटाकॉग्निशन यानी अपनी सीखने की प्रक्रिया के बारे में सोचना कहते हैं। शोधों के अनुसार, विद्यार्थियों को यह सिखाना कि वे अपनी सीखने की प्रक्रिया की योजना बनाएं, उसकी निगरानी करें और अपनी गलतियों की समीक्षा करें, सीखने के परिणामों को बेहतर कर सकता है।
इंटरनेट पर जानकारी मिलना और समझना अलग चीज
एआई के साथ एक दूसरी समस्या ‘समझ का भ्रम’ भी हो सकती है। नेचर की रिपोर्ट में 2023 के एक अध्ययन का उल्लेख किया गया है, जिसमें लोगों से लीप ईयर या जिपर जैसे विषयों की व्याख्या से जुड़े सवाल पूछे गए थे।जिन लोगों ने इंटरनेट पर खोज करके जानकारी हासिल की, वे अपनी समझ को लेकर ज्यादा आश्वस्त थे। लेकिन जब उन्हें वास्तव में उन अवधारणाओं को समझाने के लिए कहा गया तो उनके जवाब उन लोगों की तुलना में कम सटीक थे, जिन्होंने केवल जानकारी पढ़ी थी। इसका मतलब है कि जानकारी तक पहुंच जाना और उस जानकारी को वास्तव में समझ लेना एक ही बात नहीं है।
गलत जानकारी पहचानने के लिए भी जरूरी है आलोचनात्मक सोच
ऑनलाइन दुनिया में आलोचनात्मक सोच का महत्व सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक सूचनाओं की मौजूदगी के बीच यह समझना जरूरी है कि किसी दावे पर भरोसा करने से पहले उसकी पुष्टि कैसे की जाए।फिलीपींस में करीब 24,000 उच्च शिक्षा विद्यार्थियों पर हुए एक अध्ययन में 63% विद्यार्थियों ने कहा कि वे फर्जी खबर पहचानने को लेकर आश्वस्त हैं, लेकिन केवल 26% ही इसे विश्वसनीय रूप से पहचान सके।शोधकर्ता लेटरल रीडिंग को उपयोगी रणनीति मानते हैं। इसमें किसी वेबसाइट या दावे पर तुरंत भरोसा करने के बजाय उस पेज से बाहर निकलकर संबंधित संस्था, व्यक्ति या दावे के बारे में दूसरे विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी हासिल की जाती है।
एआई इस्तेमाल करने का सही तरीका क्या हो
शोधकर्ताओं के मुताबिक विद्यार्थियों और सामान्य उपयोगकर्ताओं के लिए एक आसान तरीका यह हो सकता है कि किसी सवाल पर पहले खुद विचार करें और अपना तर्क बनाएं, उसके बाद एआई की मदद लें।एआई से उत्तर मिलने के बाद यह जांचना भी जरूरी है कि उसका तर्क सही है या नहीं, उसके स्रोत क्या हैं और क्या कोई दूसरा संभावित निष्कर्ष हो सकता है। किसी विषय को समझने के बाद उसे अपने शब्दों में लिखना या किसी दूसरे व्यक्ति को समझाना भी यह पता लगाने में मदद करता है कि वास्तव में विषय समझ में आया है या सिर्फ उत्तर पढ़ लिया गया है।स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता थॉमस न्यग्रेन के मुताबिक, विद्यार्थियों को एआई से सवाल पूछने से पहले अपनी व्याख्या और तर्क पर विचार करना चाहिए, ताकि वे मशीन के उत्तर से तुरंत प्रभावित न हों
एआई से बचना नहीं, उसके इस्तेमाल का तरीका बदलना चुनौती
शोधकर्ताओं का मानना है कि एआई से पूरी तरह दूरी बनाना व्यावहारिक समाधान नहीं है। चुनौती यह है कि तकनीक इंसान की सोच का विकल्प न बने। शिक्षा में एआई का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए कि विद्यार्थी सवाल पूछे, तर्क करे, विकल्पों की तुलना करे और अंततः अपने निष्कर्ष तक पहुंचे।रिपोर्ट का व्यापक संदेश यही है कि एआई जितना आसान जवाब उपलब्ध कराएगा, इंसान के लिए खुद सोचने की आदत बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण होगा। तकनीक ज्ञान तक पहुंच को तेज कर सकती है, लेकिन किसी विषय को गहराई से समझने, तर्कों की जांच करने और अनिश्चितता के बीच निष्कर्ष तक पहुंचने की क्षमता अभी भी सक्रिय मानवीय सोच पर निर्भर करती है।
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अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ कॉलेजेज एंड यूनिवर्सिटीज के 2025 के एक सर्वे में 1,000 से अधिक अमेरिकी शिक्षकों को शामिल किया गया था। इसमें 90% शिक्षकों ने कहा कि जनरेटिव एआई विद्यार्थियों की आलोचनात्मक सोच को कम कर सकता है।वहीं, इस साल 8,000 से अधिक लोगों को शामिल करने वाले एक वैश्विक सर्वे में एआई का इस्तेमाल करने वाले करीब 20% उच्च शिक्षा विद्यार्थियों ने कहा कि अब उन्हें एआई के बिना समस्याओं पर काम करना अधिक कठिन लगता है। इन आंकड़ों के बीच शिक्षा विशेषज्ञों की चिंता यह है कि विद्यार्थी अगर किसी समस्या को समझने, संभावित उत्तरों पर विचार करने और गलतियों से सीखने के बजाय सीधे एआई से समाधान लेने लगें तो सीखने की मूल प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है।
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एआई पूरा कर सकता है विद्यार्थी का काम
चीन की सिंघुआ यूनिवर्सिटी में शिक्षा शोधकर्ता लिशियांग यान को एक ऑनलाइन पाठ्यक्रम तैयार करते समय इसका प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। उन्होंने एजेंटिक एआई का इस्तेमाल किया तो पाया कि एआई असाइनमेंट पूरे करने, सवालों के जवाब देने और ऑनलाइन चर्चाओं में भाग लेने जैसे कामज्ञखुद कर सकता है। समस्या यह थी कि विद्यार्थी इन गतिविधियों में सक्रिय रूप से सोचने के बजाय अपना काम एआई को सौंप सकते थे। यान के मुताबिक, इससे यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि शिक्षा में एआई का इस्तेमाल विद्यार्थियों की बौद्धिक भागीदारी बढ़ाने के लिए हो रहा है या उनकी जगह लेने के लिए।
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एआई हटने के बाद गणित में प्रदर्शन गिरा
एआई के प्रभाव को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन 2024 में सामने आया था। इसमें पाया गया कि जनरेटिव एआई की मदद मिलने पर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों ने गणित की समस्याएं बेहतर तरीके से हल कीं। लेकिन जब एआई की सुविधा हटा दी गई तो उनका प्रदर्शन उन विद्यार्थियों से भी खराब रहा, जिन्होंने एआई का इस्तेमाल नहीं किया था।यह परिणाम इस संभावना की ओर संकेत करता है कि एआई से तत्काल बेहतर प्रदर्शन हमेशा वास्तविक सीखने का प्रमाण नहीं होता। विद्यार्थी किसी समस्या का सही उत्तर पा सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह यह भी सीख ले कि अगली बार वही समस्या बिना तकनीकी सहायता के कैसे हल करनी है।
लेकिन एआई हमेशा नुकसान नहीं करता
शोधकर्ता इस मुद्दे पर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। नेचर की रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक हुए शोधों के नतीजे एक जैसे नहीं हैं। एआई अपेक्षाकृत नई तकनीक है और इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर बड़े और लंबे अध्ययन अभी सीमित हैं।कुछ शोधों में इसके सकारात्मक प्रभाव भी सामने आए हैं। अगर एआई सीधे तैयार उत्तर देने के बजाय विद्यार्थी को सवालों के जरिए सोचने, तर्क करने और समस्या का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करे तो यह सीखने में मदद कर सकता है। यानी फर्क केवल इस बात से नहीं पड़ता कि विद्यार्थी एआई का इस्तेमाल कर रहा है या नहीं, बल्कि इससे पड़ता है कि वह उसका इस्तेमाल सोचने में मदद लेने के लिए कर रहा है या सोचने का काम ही एआई को सौंप रहा है।
मानसिक मेहनत सीखने के लिए जरूरी
वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक डेनियल विलिंगहम के मुताबिक सीखना मानसिक प्रक्रिया का परिणाम है और यह प्रक्रिया सामान्य तौर पर मेहनत मांगती है। एआई जिस तेजी से उत्तर उपलब्ध कराता है, वह इसी मानसिक मेहनत को कम कर सकता है।प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक तानिया लोम्ब्रोजो का कहना है कि सीखने में कुछ हद तक कठिनाई उपयोगी होती है। खुद से किसी सवाल का जवाब तलाशना, जानकारी को याद से दोहराना, किसी विषय को अपने शब्दों में समझाना और अलग-अलग संभावनाओं पर विचार करना समझ को मजबूत कर सकता है।इसी को विशेषज्ञ मेटाकॉग्निशन यानी अपनी सीखने की प्रक्रिया के बारे में सोचना कहते हैं। शोधों के अनुसार, विद्यार्थियों को यह सिखाना कि वे अपनी सीखने की प्रक्रिया की योजना बनाएं, उसकी निगरानी करें और अपनी गलतियों की समीक्षा करें, सीखने के परिणामों को बेहतर कर सकता है।
इंटरनेट पर जानकारी मिलना और समझना अलग चीज
एआई के साथ एक दूसरी समस्या ‘समझ का भ्रम’ भी हो सकती है। नेचर की रिपोर्ट में 2023 के एक अध्ययन का उल्लेख किया गया है, जिसमें लोगों से लीप ईयर या जिपर जैसे विषयों की व्याख्या से जुड़े सवाल पूछे गए थे।जिन लोगों ने इंटरनेट पर खोज करके जानकारी हासिल की, वे अपनी समझ को लेकर ज्यादा आश्वस्त थे। लेकिन जब उन्हें वास्तव में उन अवधारणाओं को समझाने के लिए कहा गया तो उनके जवाब उन लोगों की तुलना में कम सटीक थे, जिन्होंने केवल जानकारी पढ़ी थी। इसका मतलब है कि जानकारी तक पहुंच जाना और उस जानकारी को वास्तव में समझ लेना एक ही बात नहीं है।
गलत जानकारी पहचानने के लिए भी जरूरी है आलोचनात्मक सोच
ऑनलाइन दुनिया में आलोचनात्मक सोच का महत्व सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक सूचनाओं की मौजूदगी के बीच यह समझना जरूरी है कि किसी दावे पर भरोसा करने से पहले उसकी पुष्टि कैसे की जाए।फिलीपींस में करीब 24,000 उच्च शिक्षा विद्यार्थियों पर हुए एक अध्ययन में 63% विद्यार्थियों ने कहा कि वे फर्जी खबर पहचानने को लेकर आश्वस्त हैं, लेकिन केवल 26% ही इसे विश्वसनीय रूप से पहचान सके।शोधकर्ता लेटरल रीडिंग को उपयोगी रणनीति मानते हैं। इसमें किसी वेबसाइट या दावे पर तुरंत भरोसा करने के बजाय उस पेज से बाहर निकलकर संबंधित संस्था, व्यक्ति या दावे के बारे में दूसरे विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी हासिल की जाती है।
एआई इस्तेमाल करने का सही तरीका क्या हो
शोधकर्ताओं के मुताबिक विद्यार्थियों और सामान्य उपयोगकर्ताओं के लिए एक आसान तरीका यह हो सकता है कि किसी सवाल पर पहले खुद विचार करें और अपना तर्क बनाएं, उसके बाद एआई की मदद लें।एआई से उत्तर मिलने के बाद यह जांचना भी जरूरी है कि उसका तर्क सही है या नहीं, उसके स्रोत क्या हैं और क्या कोई दूसरा संभावित निष्कर्ष हो सकता है। किसी विषय को समझने के बाद उसे अपने शब्दों में लिखना या किसी दूसरे व्यक्ति को समझाना भी यह पता लगाने में मदद करता है कि वास्तव में विषय समझ में आया है या सिर्फ उत्तर पढ़ लिया गया है।स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता थॉमस न्यग्रेन के मुताबिक, विद्यार्थियों को एआई से सवाल पूछने से पहले अपनी व्याख्या और तर्क पर विचार करना चाहिए, ताकि वे मशीन के उत्तर से तुरंत प्रभावित न हों
एआई से बचना नहीं, उसके इस्तेमाल का तरीका बदलना चुनौती
शोधकर्ताओं का मानना है कि एआई से पूरी तरह दूरी बनाना व्यावहारिक समाधान नहीं है। चुनौती यह है कि तकनीक इंसान की सोच का विकल्प न बने। शिक्षा में एआई का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए कि विद्यार्थी सवाल पूछे, तर्क करे, विकल्पों की तुलना करे और अंततः अपने निष्कर्ष तक पहुंचे।रिपोर्ट का व्यापक संदेश यही है कि एआई जितना आसान जवाब उपलब्ध कराएगा, इंसान के लिए खुद सोचने की आदत बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण होगा। तकनीक ज्ञान तक पहुंच को तेज कर सकती है, लेकिन किसी विषय को गहराई से समझने, तर्कों की जांच करने और अनिश्चितता के बीच निष्कर्ष तक पहुंचने की क्षमता अभी भी सक्रिय मानवीय सोच पर निर्भर करती है।