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AI का नया शीत युद्ध: कैसे गठबंधन बनाकर मुकाबला कर रहे अमेरिका-चीन, पैक्स सिलिका बनाम वाइको से किसे मिली बढ़त?
Thu, 10 Sep 2026 07:57 AM IST
संकल्प प्रकाश सिंह
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: संकल्प प्रकाश सिंह
Updated Thu, 10 Sep 2026 07:57 AM IST
सार
दुनिया एक नए तकनीकी शीत युद्ध की ओर बढ़ रही है, जहां अमेरिका और चीन के बीच मुकाबला अब सिर्फ एआई मॉडल का नहीं बल्कि चिप, कंप्यूटिंग क्षमता, डाटा और वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला पर नियंत्रण का है।
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AI Race
- फोटो : Amar Ujala AI Generated
विस्तार
दुनिया एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां अगली बड़ी ताकत का फैसला सिर्फ मिसाइलों, लड़ाकू विमानों और सैनिकों से नहीं होगा। अब दुनिया की महाशक्तियों के बीच असली मुकाबला उन तकनीकों को लेकर है, जो आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था, युद्ध, उद्योग और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक को बदल सकती हैं। अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर एक नई होड़ शुरू हो चुकी है। इसे कई जानकार नए शीत युद्ध के रूप में देख रहे हैं।
ये लड़ाई हथियार या बंदूकों से नहीं बल्कि अत्याधुनिक चिप, विशाल कंप्यूटिंग क्षमता, सुपरकंप्यूटर, डाटा और अरबों डॉलर के निवेश से लड़ी जा रही है। अमेरिका की सबसे बड़ी लड़ाई इसको लेकर है कि सबसे उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर उसकी बढ़त बनी रहे। वहीं इसी होड़ में चीन भी लगा हुआ है।
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ये लड़ाई हथियार या बंदूकों से नहीं बल्कि अत्याधुनिक चिप, विशाल कंप्यूटिंग क्षमता, सुपरकंप्यूटर, डाटा और अरबों डॉलर के निवेश से लड़ी जा रही है। अमेरिका की सबसे बड़ी लड़ाई इसको लेकर है कि सबसे उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर उसकी बढ़त बनी रहे। वहीं इसी होड़ में चीन भी लगा हुआ है।
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अमेरिका का पैक्स सिलिका
- एआई की इस नई होड़ में दुनिया धीरे-धीरे अलग-अलग तकनीकी खेमों में बंटती दिखाई दे रही है।
- अमेरिका पैक्स सिलिका के जरिए उन देशों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा है, जो दुनिया की चिप आपूर्ति और तकनीकी ढांचे में अहम भूमिका निभाते हैं।
- इस संगठन का उद्देश्य सिर्फ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर नहीं है बल्कि उन सभी चीजों पर है जिनके बिना एआई की ताकत को जमीन पर उतारना मुश्किल है।
- इनमें अत्याधुनिक सेमिकंडक्टर चिप, कंप्यूटिंग ढांचा, रेयर अर्थ मिनरल आदि चीजें शामिल हैं।
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चीन का डब्ल्यू.ए.आई.सी.ओ
- वहीं दूसरी तरफ चीन डब्ल्यू.ए.आई.सी.ओ लेकर सामने आया है।
- जुलाई 2026 में 29 देशों ने इसके संस्थापक समझौते पर हस्ताक्षर किया।
- इसका उद्देश्य सुरक्षित और समान अवसर वाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए देशों के बीच सहयोग को बढ़ाना और वैश्विक स्तर पर एआई से जुड़े नियमों को मजबूत करना है।
- दोनों को देखने पर दुनिया की बदलती तस्वीर भी स्पष्ट तौर पर दिखाई दती है।
- पैक्स सिलिका में अमेरिका के साथ यूरोप और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की कई बड़ी तकनीकी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।
- वहीं डब्ल्यू.ए.आई.सी.ओ की पहुंच ग्लोबल साउथ के देशों में देखने को मिलती है।
- ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान और कई अफ्रीकी देश इसके साथ जुड़े हैं।
डब्ल्यू.ए.आई.सी.ओ के साथ चीन का बड़ा दांव
- हालांकि, आपको एक चीज समझनी काफी जरूरी है। पैक्स सिलिका मुख्य रूप से चिप और तकनीकी आपूर्ति व्यवस्था को सुरक्षित करने वाली साझेदारी है।
- वहीं डब्ल्यू.ए.आई.सी.ओ एक औपचारिक अंतरसरकारी संगठन है।
- इसका मुख्य उद्देश्य एआई सहयोग और उसके वैश्विक संचालन पर है।
- आपको यह समझना भी जरूरी है कि चीन के पास विकासशील देशों के लिए एक अलग तरह का प्रस्ताव भी है।
- वह बुनियादी ढांचा, तकनीकी प्रशिक्षण और तेजी से प्रतिस्पर्धी हो रहे ओपन एआई मॉडल उपलब्ध करा सकता है।
- यह चीज ग्लोबल साउथ के देशों के लिए आकर्षक हो सकती है, जो पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली तकनीकी संस्थाओं में खुद को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की अक्सर शिकायत करते हैं या किसी एक देश की तकनीक पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
AI Race
- फोटो : Amar Ujala AI Generated
एआई की जंग में बाकी देशों की भूमिका
- एआई की यह लड़ाई सिर्फ अमेरिका और चीन के बीच तक सीमित नहीं है।
- असली मुकाबला इस बात को लेकर भी हो रहा है कि दुनिया के बाकी देश भविष्य की तकनीकी व्यवस्था में किसके साथ खड़े होंगे और एआई की अगली वैश्विक व्यवस्था के नियम आखिर तय कौन करेगा?
पैक्स सिलिका और वाइको से क्यों जुड़ रहे हैं देश?
- अब सवाल यह है कि आखिर ये देश इन अलग-अलग तकनीकी खेमों का हिस्सा क्यों बन रहे हैं? इसकी वजह सिर्फ एआई नहीं है।
- असली वजह यह है कि आने वाले समय में जिस देश या समूह के पास अत्याधुनिक सेमिकंडक्टर चिप, कंप्यूटिंग क्षमता और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला का मजबूत नियंत्रण होगा उसके पास आर्थिक और रणनीतिक बढ़त भी होगी।
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की भूमिका
- अमेरिका के लिए सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनी तकनीकी कंपनियां ही नहीं हैं।
- उसके साथ जापान, दक्षिण कोरिया और नीदरलैंड जैसे देश भी जुड़े हुए हैं, जो चिप बनाने की पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का काम करते हैं।
- कोई चिप का डिजाइन तैयार करता है, कोई उसे बनाने वाली मशीनें उपलब्ध कराता है और कोई बड़े पैमाने पर उसका निर्माण करने का काम करता है।
- एक अत्याधुनिक चिप किसी एक देश की फैक्ट्री में तैयार होने वाला सामान भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई देशों से जुड़ी एक लंबी आपूर्ति श्रृंखला शामिल है।
भारत का रुख
- इस तकनीकी शीत युद्ध में भारत की भूमिका काफी संतुलित दिखती है।
- भारत ने अमेरिकी नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे उसे अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर तकनीक और वैश्विक चिप सप्लाई चेन से जुड़ने के नए अवसर मिल सकते हैं।
- हालांकि, भारत की रणनीति किसी एक तकनीकी खेमे पर पूरी तरह निर्भर रहने की नहीं है।
- वह ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ जैसे मंचों के जरिए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को भी बनाए रखना चाहता है।
- भारत का सबसे बड़ा लक्ष्य अपनी घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करना और भविष्य की तकनीकी दौड़ में अपनी स्वतंत्र क्षमता विकसित करना है।
एआई अब युद्ध का हिस्सा बन रहा है
- इस पूरी तकनीकी होड़ का सबसे गंभीर असर अब युद्ध के मैदान पर भी दिखने लगा है।
- अमेरिका और चीन दोनों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिर्फ आर्थिक बढ़त का साधन भर नहीं हैं बल्कि यह तकनीक सैन्य ताकत बढ़ाने का जरिया भी बन रही है।
- युद्ध में अब फैसला केवल इस बात से तय नहीं होगा कि किस देश के पास कितने सैनिक या कितने हथियार हैं बल्कि यह भी मायने रखेगा कि कौन अपने आंकड़ों को कितनी तेजी से समझ सकता है और उसके आधार पर कितनी जल्दी फैसला ले सकता है।
क्लॉड जैसे एआई मॉडल युद्ध में
- हाल ही में अमेरिकी सेनाओं द्वारा युद्ध की प्लानिंग और खुफिया जानकारी प्रोसेस करने के लिए एआई मॉडल्स (जैसे Claude) के इस्तेमाल की खबरें भी सामने निकलकर आईं।
- यह दिखाता है कि भविष्य में युद्ध मैदान के साथ-साथ एल्गोरिदम से जीते जाएंगे।
एआई हथियारों की बदलती तस्वीर
- किलर ड्रोन, रोबोटिक टैंक, गाइडेड मिसाइलें और ऐसे हथियार जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका बढ़ रही है वे पूरे युद्ध की तस्वीर बदल सकते हैं।
- इसके साथ ही एआई का इस्तेमाल खुफिया जानकारी को समझने, साइबर हमलों और सूचना युद्ध में भी बढ़ रहा है।
- ऐसे में यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि युद्ध का एक नया मोर्चा जमीन या समुद्र पर नहीं, बल्कि एल्गोरिदम और कंप्यूटिंग क्षमता के भीतर तैयार हो रहा है।
- इसी वजह से एआई पर नियंत्रण की होड़ भविष्य की सैन्य ताकत की होड़ भी बन चुकी है।